संदर्भ:
सरकार के विधायी संबंधी उद्देश्य को एक बड़ा झटका देते हुए, एकजुट विपक्ष ने 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को निरस्त कर दिया।
- इस विधेयक का उद्देश्य सीटों के पुनर्वितरण पर लगे 50 वर्षों के रोक को समाप्त करना तथा वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनः आवंटन करना था, ताकि महिला आरक्षण को तेजी से लागू किया जा सके।
विधायी विफलता और संवैधानिक सुरक्षा उपाय
- विशेष बहुमत की आवश्यकता: यह संवैधानिक संशोधन विधेयक इसलिए निरस्त हो गया क्योंकि यह विशेष बहुमत प्राप्त करने में विफल रहा, जिसके लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई के साथ-साथ सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत आवश्यक होता है।
- मतदान परिणाम: 528 सदस्यों की उपस्थिति में, विधेयक को 352 मतों की आवश्यकता थी, लेकिन इसके पक्ष में केवल 298 मत ही प्राप्त हुए, जिससे यह आवश्यक सीमा को पूरा करने में असफल रहा।
- संविधान निर्माताओं की दूरदृष्टि: इसमें यह रेखांकित किया गया है कि प्रारूप समिति के अध्यक्ष ने यह उच्च मानक इसलिए निर्धारित किया था ताकि अल्प बहुमत वाली सरकार एकतरफा बदलाव न कर सके और उसे राजनीतिक सहमति प्राप्त करने के लिए बाध्य होना पड़े।
परस्पर जुड़े विधेयक और सरकार की रणनीति
- संबंधित विधेयकों की वापसी: विधेयक के निरस्त होने के बाद केंद्र सरकार ने परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े दो अन्य विधेयकों को यह कहते हुए वापस ले लिया कि तीनों आपस में जुड़े हुए थे।
- राजनीतिक रणनीति: लेखक का सुझाव है कि सरकार ने विपक्ष को भ्रमित करने के लिए इन मुद्दों को आपस में जोड़ा हो सकता है। मतदान के लिए मजबूर करके सरकार का उद्देश्य यह था कि यदि विपक्ष इस विधेयक के विरुद्ध वोट दे, तो उसे महिला विरोधी के रूप में चित्रित किया जा सके।
- विश्वास का अभाव: सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच गहरा अविश्वास है। लेखक के अनुसार, विपक्ष मौखिक आश्वासनों पर भरोसा करने से इनकार करता है और यह मांग करता है कि सभी आश्वासन विधेयक में स्पष्ट रूप से लिखित रूप में शामिल की जाएँ।
उत्तर-दक्षिण परिसीमन बहस
- जनसांख्यिकीय दंड: दक्षिणी राज्यों को अपनी राजनीतिक शक्ति कम होने का डर है। यदि परिसीमन वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर होता है, तो जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई है, उनकी सीटों में कमी हो सकती है, जबकि उत्तरी राज्यों को लाभ मिलेगा।
- कार्यपालिका का आश्वासन: गृह मंत्री ने मौखिक रूप से आश्वासन दिया है कि सभी राज्यों में समान रूप से 50% सीटें बढ़ाई जाएंगी ताकि संतुलन बना रहे।
- कानूनी महत्व: लेखक का तर्क है कि सदन में दिए गए मौखिक आश्वासनों का न्यायालय में कोई महत्व नहीं होता, इसलिए इन्हें कानून का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
विपक्ष के तर्क और चिंताएँ
- जनगणना विवाद: विपक्ष को संदेह है कि सरकार जाति जनगणना से बचने के लिए वर्ष 2011 की जनगणना का उपयोग कर रही है।
- मुद्दों को अलग करना: आलोचकों का कहना है कि महिला आरक्षण विधेयक को तुरंत लागू किया जाना चाहिए और इसे परिसीमन प्रक्रिया से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
आगे की राह
यह पराजय कुछ के लिए “लोकतंत्र की जीत” है और कुछ के लिए “खोया हुआ अवसर”। गतिरोध को समाप्त करने के लिए विशेषज्ञ निम्नलिखित सुझाव देते हैं:
- मुद्दों को अलग करना: मौजूदा 543 सीटों पर तुरंत महिला आरक्षण लागू किया जाए।
- जनगणना 2026: अद्यतन और विश्वसनीय आंकड़ों के लिए वर्ष 2026 की जनगणना को प्राथमिकता दी जाए।
- संसदीय समिति: सीट-साझाकरण फार्मूले को संयुक्त संसदीय समिति को संदर्भित करना, ताकि एक वास्तविक और लिखित सहमति बनाई जा सके, जो बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों के हितों की रक्षा करते हुए उत्तर भारत को भी उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे।
निष्कर्ष
131वें संशोधन की विफलता यह दर्शाती है कि भारत जैसे विविध संघीय ढाँचे में संवैधानिक नैतिकता साधारण बहुमत से कहीं अधिक की मांग करती है। अंतर-राज्यीय संघीय सौहार्द और लैंगिक न्याय को बनाए रखने के लिए सरकार और विपक्ष को केवल कार्यपालिका के मौखिक आश्वासनों के बजाय पारदर्शी और विधिक रूप से संहिताबद्ध गारंटियों के माध्यम से विश्वास की कमी को दूर करना होगा।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: 131वें संशोधन विधेयक का निरस्त होना संघीय व्यवस्था में जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के बीच गहरे तनाव को उजागर करती है। प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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