दहेज प्रथा और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा

दहेज प्रथा और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा 29 May 2026

संदर्भ:

वर्ष 1961 से प्रतिबंधित होने के बावजूद, दहेज प्रथा भारत में एक “सभ्यतागत विरोधाभास” बनी हुई है, जहाँ एक ओर देवियों की पूजा की जाती है, वहीं दूसरी ओर बेटियों को मूल्य नकद धन, कार और मकान जैसे भौतिक संसाधनों के आधार पर आँका जाता है।

  • इस चर्चा में यह रेखांकित किया गया है कि दहेज, जो मूलतः “स्त्रीधन” (पुत्री की सुरक्षा हेतु स्वेच्छा से दिए गए उपहार) के रूप में प्रचलित था, समय के साथ पति के परिवार द्वारा की जाने वाली शोषणकारी मांग में परिवर्तित हो गया है।

भारतीय समाज का सामाजिक विरोधाभास

  • सभ्यतागत विरोधाभास: लेख भारतीय समाज के एक बड़े सभ्यतागत विरोधाभास” को उजागर करता है, जहाँ लोग एक ओर लक्ष्मी और सरस्वती जैसी देवियों की पूजा करते हैं, जबकि दूसरी ओर बेटियों का मूल्यांकन अक्सर दहेज के रूप में नकदी, कारों और फ्लैटों जैसी भौतिक वस्तुओं के आधार पर किया जाता है।

स्त्रीधन और दहेज के बीच अंतर

स्त्रीधन

  • स्त्रीधन (Stridhan) से आशय उन स्वैच्छिक उपहारों से है जो माता-पिता एवं रिश्तेदारों द्वारा पुत्री को उसकी आर्थिक सुरक्षा, गरिमा और सशक्तिकरण के लिए दिए जाते हैं। विधिक रूप से यह स्त्री की विशिष्ट एवं पूर्ण संपत्ति माना जाता है, जिस पर केवल उसी का अधिकार होता है।

दहेज 

  • इसके विपरीत, दहेज वर पक्ष द्वारा की जाने वाली एक मांग है, जिसे अक्सर उनके अधिकार के रूप में देखा जाता है। यह प्रथा अनेक मामलों में महिलाओं के आर्थिक शोषण, दबाव, उत्पीड़न तथा हिंसा का प्रमुख कारण बन जाती है।

दहेज धीरे-धीरे हिंसा में कैसे बदल जाता है?

  • मांगों से उत्पीड़न तक: दहेज से संबंधित हिंसा प्रायः छोटी या अप्रत्यक्ष मांगों से शुरू होती है, जो धीरे-धीरे आर्थिक दबाव, भावनात्मक शोषण, मानसिक उत्पीड़न तथा शारीरिक हिंसा का रूप ले लेती हैं। कई गंभीर मामलों में यह स्थिति आत्महत्या या दहेज हत्या जैसी दुखद घटनाओं तक पहुँच जाती है।

दहेज: लैंगिक समानता का उल्लंघन

  • SDG-5 का उल्लंघन: दहेज से संबंधित हिंसा सतत विकास लक्ष्य 5 (SDG-5) का प्रत्यक्ष उल्लंघन है, जिसका उद्देश्य लैंगिक समानता प्राप्त करना तथा महिलाओं को सशक्त बनाना है।
  • पुरुषत्व का अवमूल्यन: लेख यह भी तर्क देता है कि जब कोई पुरुष दहेज की मांग करता है, तो वह वस्तुतः स्वयं पर एक मूल्य-टैग (Price Tag)” लगा देता है। इससे उसकी गरिमा, आत्मसम्मान, आत्म-मूल्य तथा वास्तविक पुरुषत्व कमजोर पड़ता है, क्योंकि उसका मूल्य उसके व्यक्तित्व, चरित्र और उपलब्धियों के बजाय धन एवं भौतिक लाभों से आँका जाने लगता है।

दहेज के विरुद्ध कानूनी ढाँचा

  • दहेज निषेध अधिनियम, 1961: दहेज प्रथा पर रोक लगाने के लिए बनाया गया यह पहला प्रमुख कानून था, जिसके तहत भारत में दहेज देने, लेने तथा उसकी मांग करने को दंडनीय अपराध घोषित किया गया।
  • भारतीय न्याय संहिता (BNS) – धारा 80: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 80 दहेज मृत्यु से संबंधित है। इसके अंतर्गत दोषी पाए जाने पर न्यूनतम सात वर्ष के कारावास से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान किया गया है।
  • भारतीय न्याय संहिता (BNS) – धारा 85: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के प्रति की जाने वाली क्रूरता से संबंधित है। इसमें दहेज की मांग के संबंध में महिला को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करना, उत्पीड़न करना अथवा उसे कष्ट पहुँचाना शामिल है।

न्यायिक घटनाक्रम

  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय (2026): इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि दहेज से जुड़े जघन्य अपराधों का निपटारा निजी समझौतों या न्यायालय के बाहर किए गए समझौतों (out-of-court settlements) के माध्यम से नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसे अपराधों के गंभीर सामाजिक प्रभाव होते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय – अजमल बेग मामला (2025): अजमल बेग मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि दहेज हिंसा केवल एक सामाजिक बुराई ही नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और महिलाओं की गरिमा का भी उल्लंघन है।

दहेज उन्मूलन हेतु “चार-P” (Four-P Framework)

  • रोकथाम (Prevention): प्रभावी रोकथाम के लिए महिलाओं की शिक्षा, रोजगार के अवसरों तथा आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देना आवश्यक है। साथ ही, समाज में दहेज प्रथा के प्रति शून्य-सहनशीलता (Zero Tolerance) का दृष्टिकोण अपनाकर इसके विरुद्ध कठोर सामाजिक एवं कानूनी वातावरण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • संरक्षण (Protection): दहेज उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को सहायता प्रदान करने के लिए 24×7 हेल्पलाइन, त्वरित पुलिस प्रतिक्रिया प्रणाली तथा सुरक्षित एवं गोपनीय शिकायत-रिपोर्टिंग तंत्र जैसे मजबूत संरक्षण तंत्र अत्यंत आवश्यक हैं।
  • अभियोजन (Prosecution ): दहेज से जुड़े अपराधों के प्रति निवारण को मज़बूत करने के लिए, दहेज-विरोधी कानूनों को उचित रूप से लागू करने के साथ-साथ त्वरित सुनवाई और दोषसिद्धि की उच्च दर की आवश्यकता है।
  • संकट सहायता (Crisis Support): पीड़ित महिलाओं को पुनर्वास एवं संकट की परिस्थितियों में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापक मानसिक स्वास्थ्य सहायता, निःशुल्क विधिक सहायता, परामर्श सेवाएँ तथा आश्रय गृह उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

दहेज कानूनों के दुरुपयोग पर बहस

  • दुरुपयोग संबंधी चिंताएँ: चर्चा में यह भी स्वीकार किया गया कि कुछ मामलों में दहेज-संबंधी कानूनी प्रावधानों के कथित दुरुपयोग को लेकर चिंताएँ व्यक्त की जाती हैं, जिसके कारण प्रक्रिया की निष्पक्षता (Procedural Fairness) तथा न्यायसंगत कानूनी प्रक्रिया पर बहस उत्पन्न होती है।
  • सामाजिक प्राथमिकताएँ एवं भौतिकवादी प्रवृत्ति: यह भी देखा गया कि कुछ परिवार आज भी आर्थिक रूप से संपन्न वरों तथा समृद्ध परिवारों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से दहेज की अपेक्षाओं को बढ़ावा मिलता है और यह कुप्रथा समाज में बनी रहती है।
  • संतुलित क्रियान्वयन की आवश्यकता: अतः दहेज के विरुद्ध कठोर कार्रवाई आवश्यक होने के साथ-साथ निष्पक्ष जाँच, संतुलित विमर्श तथा कानूनों के सावधानीपूर्वक और न्यायसंगत क्रियान्वयन की भी आवश्यकता है, ताकि मामले से जुड़े सभी पक्षों की न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: भारत में दहेज अब केवल एक सामाजिक बुराई नहीं रह गया है, बल्कि यह हिंसा की एक सतत प्रक्रिया का रूप ले चुका है, जो अंततः स्त्रीहत्या तक पहुँच सकती है। वर्तमान कानूनी ढाँचे के आलोक में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए तथा इसके उन्मूलन हेतु एक व्यापक रणनीति सुझाइए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

दहेज प्रथा और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा

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