संदर्भ:
‘UNEP खाद्य अपशिष्ट सूचकांक रिपोर्ट, 2024′ एक गंभीर अंतर्विरोध को उजागर करती है: विश्व में 2022 में 1.05 बिलियन टन भोजन का अपव्यय किया गया, जबकि 783 मिलियन लोगों ने भुखमरी की समस्या का सामना किया। भारत खाद्य अपशिष्ट (भोजन अपव्यय/बर्बादी) में वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर है, जहाँ वार्षिक 78-80 मिलियन टन (₹1.55 लाख करोड़ मूल्य का) भोजन नष्ट हो जाता है।
संकट का पैमाना:
- अपशिष्ट का वैश्विक वितरण: 60% खाद्य अपशिष्ट के लिए घरेलू परिवार जिम्मेदार हैं, उसके बाद खाद्य सेवाएँ (28%) और खुदरा क्षेत्र (12%) का स्थान आता है।
- भारत का विरोधाभास: जबकि भारत का प्रति व्यक्ति घरेलू अपशिष्ट (55 किलोग्राम) अमेरिका (73 किलोग्राम) की तुलना में कम है, लेकिन देश ‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ में 125 में से 111वें स्थान पर है।
- पंजाब की चुनौती: एक प्रमुख उत्पादक के रूप में, पंजाब को उच्च खाद्य अपव्यय दर का सामना करना पड़ता है। 2019-2024 के बीच अकेले पंजाब में FCI सुविधाओं में 8,200 टन से अधिक खाद्यान्न खराब हो गया—जो भारत में सबसे अधिक है।
- पर्यावरणीय प्रभाव: वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में खाद्य अपशिष्ट का हिस्सा 8-10% है। यदि खाद्य अपशिष्ट एक देश होता, तो यह चीन और अमेरिका के बाद तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक होता।
प्रणालीगत अक्षमताएँ- भोजन क्यों नष्ट होता है?
- कटाई के बाद प्रबंधन : अपर्याप्त भंडारण, ग्रेडिंग की कमी और अवैज्ञानिक पैकेजिंग से बड़े पैमाने पर हानि होती है, विशेष रूप से फलों और सब्जियों में (पंजाब में लगभग 20% की हानि)।
- बुनियादी ढाँचे की कमी: भारत अपनी उपज का केवल 8% संसाधित (process) करता है, जबकि अमेरिका में यह 65% और चीन में 23% है।
- भंडारण नीतियाँ: ‘जूट पैकेजिंग सामग्री अधिनियम’ जूट की बोरियों में अनाज भंडारण को अनिवार्य करता है, जो कृन्तकों (Rodents) और नमी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं।
- लॉजिस्टिक्स अंतराल: कोल्ड-चेन बुनियादी ढाँचे में कम निवेश उपज को खराब होने से पहले दूर के बाजारों तक पहुँचने से रोकता है।
पारिस्थितिक और मानवीय लागत:
- संसाधन की कमी: भोजन का अपव्यय, उसका उत्पादन करने के लिए प्रयोग किए गए पानी, जमीन और ईंधन को बर्बाद करने के बराबर है। उदाहरण के लिए, 1 किलोग्राम चावल का उत्पादन करने के लिए 5,000 लीटर जल की आवश्यकता होती है; इसके अपव्यय से भूजल की कमी में वृद्धि होती है।
- मीथेन उत्सर्जन: लैंडफिल में सड़ने वाला भोजन मीथेन का उत्सर्जन करता है, जो एक ग्रीनहाउस गैस है और CO2 की तुलना में अधिक शक्तिशाली है।
- आर्थिक हानि: ₹1.55 लाख करोड़ का वार्षिक अपव्यय किसान की कठोर मेहनत और देश की अर्थव्यवस्था के लिए सीधी हानि है।
जीरो वेस्ट (Zero Waste) संबंधी चुनौतियाँ:
- अपर्याप्त डेटाबेस: भारत में खुदरा, आतिथ्य और संस्थागत स्तरों पर खाद्य अपशिष्ट को ट्रैक करने के लिए एक समेकित राष्ट्रीय डेटाबेस की कमी है।
- नीतिगत अंतराल: वर्तमान में खाद्य बैंकों को अधिशेष खाद्य सामग्री के पुनर्वितरण को सुनिश्चित करने के लिए कोई राष्ट्रीय जनादेश या कानून नहीं है।
- उपभोग संस्कृति: शहरी उपभोग प्रतिरूप ने प्रचुरता की एक स्वीकार्य लागत के रूप में भोजन को फेंकने को सामान्य बना दिया है।
आगे की राह:
- कोल्ड चेन का निर्माण: कोल्ड-चेन बुनियादी ढाँचे को आवश्यक खाद्य सुरक्षा बुनियादी ढाँचे के रूप में मानें। प्रसंस्करण को 8% से वैश्विक मानकों तक ले जाने के लिए एक राष्ट्रीय मिशन की आवश्यकता है।
- साझा योग्य कानून: यूरोपीय देशों (जैसे- फ्रांस) के मॉडल पर कानून बनाएँ, ताकि सुपरमार्केट के लिए न बिकने वाले खाद्य योग्य भोजन को नष्ट करना अवैध हो, और इसके बजाय खाद्य बैंकों को दान देना अनिवार्य हो।
- “फर्स्ट माइल” को सशक्त बनाना: किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को फसलों को सुखाने की मशीनों, हेर्मेटिक स्टोरेज बैग और मोबाइल कोल्ड यूनिट से युक्त करें। आधुनिक भंडारण समाधानों की अनुमति देने के लिए जूट पैकेजिंग सामग्री अधिनियम की समीक्षा करें।
- दृश्यता और पुरस्कार: अपशिष्ट को ट्रैक करने और कम करने के लिए, बड़े व्यवसायों (होटल, वेडिंग कैटरर्स) के लिए अनिवार्य खाद्य अपशिष्ट माप तथा रिपोर्टिंग प्रारंभ करें।
- ‘अन्न’ नैतिकता को पुनर्जीवित करना: भोजन को पवित्र (अन्न ब्रह्म) मानने वाले सांस्कृतिक दर्शन को पुनः बढ़ावा दें। स्कूलों और नागरिक संस्थानों को भोजन के सम्मान को एक नागरिक उत्तरदायित्व के रूप में बढ़ावा देना चाहिए।
निष्कर्ष
खाद्य अपशिष्ट को समाप्त करना एक मानवीय तथा पारिस्थितिक आवश्यकता है। राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं में खाद्य हानि का एकीकरण तथा आपूर्ति श्रृंखला प्रोत्साहनों को पुन: व्यवस्थित करके, भारत उदासीनता की संस्कृति से दक्षता की संस्कृति में संक्रमण कर सकता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि किसान द्वारा उत्पादित प्रचुरता गरीब की थाली तक पहुँच सके।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. विश्व स्तर पर एक अरब टन खाद्य अपशिष्ट और एक अरब भूखे पेट का सह-अस्तित्व कोई विडंबना नहीं है, बल्कि प्रणालीगत अक्षमता का एक दोषारोपण है। वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत की रैंकिंग के संदर्भ में, खाद्य अपशिष्ट के कारणों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए, तथा एक शून्य-अपशिष्ट खाद्य पारिस्थितिक तंत्र बनाने के लिए व्यापक उपाय सुझाइए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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