संदर्भ:
मतदान के अधिकार को एक मूल अधिकार के रूप में मान्यता देने संबंधी चर्चा एक बार फिर आरंभ हो गई है, जिसमें यह तर्क दिया जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के बदलते न्यायिक निर्णयों ने उत्तरोत्तर चुनावी प्रक्रिया को संवैधानिक रूप प्रदान किया है, जबकि इसके इतर मतदान के कार्य को अभी भी केवल एक वैधानिक अधिकार के रूप में वर्गीकृत किया जाना जारी है।
वर्तमान विधिक स्थिति:
- पारंपरिक न्यायिक दृष्टिकोण: सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना है कि मतदान का अधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार मूल अधिकार या सामान्य विधिक अधिकार नहीं हैं, बल्कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियमों द्वारा बनाए गए वैधानिक अधिकार हैं।
- न्यायिक उदाहरण:
- एन.पी. पोन्नुस्वामी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर (1952) मामले में, न्यायालय ने माना कि मतदान करना और चुनाव लड़ना वैधानिक अधिकार हैं।
- इस दृष्टिकोण की पुष्टि, ज्योति बसु बनाम देबी घोषाल (1982) मामले में की गई थी, जहाँ न्यायालय ने देखा कि हालाँकि मतदान लोकतंत्र के लिए मूलभूत है, फिर भी यह विशुद्ध रूप से एक वैधानिक अधिकार बना हुआ है।
- कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006) मामले की संवैधानिक पीठ ने आगे यह माना, कि हालाँकि लोकतंत्र मूल संरचना का हिस्सा है, लेकिन व्यक्तिगत मतदान का अधिकार मुख्य रूप से जनप्रतिनिधित्व अधिनियमों से प्राप्त होता है।
- संवैधानिक तर्क: चूँकि संविधान स्पष्ट रूप से मतदान के अधिकार को मूल अधिकार के रूप में मान्यता नहीं देता है, इसलिए संसद के पास चुनावी योग्यताएँ, अयोग्यताएँ और प्रक्रियाएँ निर्धारित करने का अधिकार सुरक्षित है।
चुनावी न्यायशास्त्र का विकास:
- चुनावी प्रक्रिया का संवैधानीकरण: 2000 के दशक की शुरुआत से, सर्वोच्च न्यायालय ने मतदान के विभिन्न पहलुओं तक संवैधानिक संरक्षण का विस्तार करके मतदाता को एक निष्क्रिय वैधानिक नागरिक से एक सक्रिय संवैधानिक अभिकर्ता में बदल दिया।
- जानने का अधिकार: भारत संघ बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (2002) मामले में, न्यायालय ने अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास, शैक्षिक योग्यता और वित्तीय संपत्ति के विषय में जानकारी प्राप्त करने संबंधी मतदाताओं के अधिकार को मान्यता दी, और यह भी माना कि सार्थक लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए जागरूक मतदाताओं का होना आवश्यक है।
- एक सूचित विकल्प चुनने की स्वतंत्रता: पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) बनाम भारत संघ (2003) वाद में, न्यायालय ने मतदान के अधिकार (जो वैधानिक बना हुआ है) और वोट देने की स्वतंत्रता (यानी एक सूचित चुनावी विकल्प चुनने की स्वतंत्रता, जो अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित है) के मध्य अंतर स्पष्ट किया।
- नोटा (NOTA) की मान्यता: नोटा निर्णय (2013) में, न्यायालय ने सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार (नोटा) को अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित राजनीतिक अभिव्यक्ति के एक रूप के रूप में मान्यता दी तथा मतपत्र की गोपनीयता का विस्तार उन मतदाताओं तक किया जो नोटा चुनते हैं।
- उभरता हुआ न्यायिक परिवर्तन: अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) वाद में, न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी ने अपने पृथक विचार में मतदान को एक मूल अधिकार के रूप में मान्यता देने का पक्ष लिया। हालाँकि इस विचार को बहुमत नहीं मिला, लेकिन संविधान पीठ ने बार-बार मतदान को एक संवैधानिक अधिकार के रूप में संदर्भित किया, जो विगत संकीर्ण वैधानिक दृष्टिकोण से बढ़कर एक क्रमिक परिवर्तन का संकेत देता है।
संवैधानिक विरोधाभास:
- असंगत संवैधानिक संरक्षण: जानने का अधिकार, एक सूचित विकल्प चुनने की स्वतंत्रता, मतपत्र की गोपनीयता और सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का अधिकार (नोटा) पहले से ही संवैधानिक संरक्षण के अधीन हैं, जबकि मतदान केवल एक वैधानिक अधिकार बना हुआ है।
- मुख्य संवैधानिक प्रश्न: यदि संविधान प्रत्येक उम्मीदवार को खारिज करने के अधिकार की रक्षा करता है, तो किसी एक को चुनने के अधिकार को समान संवैधानिक संरक्षण देने से इनकार करना तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता है।
मतदान के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण की आवश्यकता, क्यों?
- मूल संरचना का सिद्धांत: केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) वाद में लोकतंत्र को मूल संरचना के हिस्से के रूप में मान्यता दी गई, जबकि इंद्रा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) मामले में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को लोकतंत्र की एक अनिवार्य विशेषता के रूप में मान्यता दी गई थी।
- लोकतांत्रिक वैधता की नींव: लोकतंत्र चुनावों के माध्यम से संचालित होता है, और चुनावों को वैधता मतपत्र के माध्यम से भाग लेने वाले नागरिकों से मिलती है। मतदान का अधिकार वह साधन है, जिसके माध्यम से लोकप्रिय संप्रभुता का प्रयोग किया जाता है और सरकारों को जवाबदेह ठहराया जाता है।
- अनुच्छेद 326 के तहत संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 326 सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है, जिससे 18 वर्ष से अधिक आयु का प्रत्येक नागरिक संवैधानिक रूप से एक मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हकदार बनता है, जो केवल सीमित संवैधानिक अयोग्यता के अधीन है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम केवल इस संवैधानिक आदेश को क्रियान्वित करते हैं।
- मनमाने ढंग से मताधिकार से वंचित करने के खिलाफ सुरक्षा: चूँकि एक मतदाता बनने का अधिकार सीधे अनुच्छेद 326 से प्राप्त होता है, इसलिए मतदाता सूची से मनमाना निष्कासन केवल एक वैधानिक पात्रता को प्रभावित करने की बजाय एक संवैधानिक गारंटी पर आघात करता है।
आगे की राह:
- विनियामक लचीलापन बनाए रखना: मतदान के अधिकार को संवैधानिक या मूल अधिकार के रूप में मान्यता देने से चुनाव को विनियमित करने की संसद की शक्ति कम नहीं होनी चाहिए। स्वतंत्र, निष्पक्ष और व्यवस्थित चुनाव सुनिश्चित करने के लिए इसे योग्यता, अयोग्यता, मतदाता सूची, निवास आवश्यकताओं, भ्रष्ट प्रथाओं तथा अन्य प्रक्रियात्मक पहलुओं को निर्धारित करना जारी रखना चाहिए।
- केवल मुख्य लोकतांत्रिक पात्रता की रक्षा करना: संवैधानिक मान्यता प्रत्येक पात्र नागरिक के वोट डालने के मुख्य अधिकार तक ही सीमित होनी चाहिए, जबकि चुनावी प्रशासन के तौर-तरीकों को वैधानिक विनियमन पर छोड़ देना चाहिए। यह संस्थागत लचीलेपन के साथ व्यक्तिगत लोकतांत्रिक अधिकारों को संतुलित करता है।
- न्यायिक स्पष्टीकरण: एक संवैधानिक पीठ यह स्पष्ट कर सकती है, कि क्या प्रत्येक पात्र नागरिक के मुख्य मतदान अधिकार को, बिना चुनावी प्रक्रियाओं के वैधानिक विनियमन से मुक्त किए अनुच्छेद 326 और मूल संरचना से प्राप्त होने वाले संवैधानिक अधिकार के रूप में माना जाना चाहिए।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः लोकप्रिय संप्रभुता और स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनावों पर आधारित एक संवैधानिक लोकतंत्र में, संसद की विनियामक शक्तियों को बनाए रखते हुए मतदान के अधिकार को एक संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता देना लोकतांत्रिक भागीदारी तथा संवैधानिक शासन को सुदृढ़ करेगा।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: “सर्वोच्च न्यायालय के न्यायशास्त्र ने उत्तरोत्तर मतदान के विभिन्न पहलुओं को संवैधानिक रूप दिया है, फिर भी मतदान के कार्य को एक मात्र वैधानिक अधिकार के रूप में देखा जाता है।” हालिया निर्णयों और मूल संरचना के सिद्धांत के आलोक में इस विरोधाभास का परीक्षण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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