संदर्भ
“स्टील फ्रेम” (Steel Frame) शब्द का उपयोग सरदार पटेल ने भारत की सिविल सेवाओं के लिए किया था। हालाँकि आज यह ढाँचा प्रणालीगत समस्याओं और नैतिक मानकों में गिरावट के कारण कमजोर हो रहा है।
- ऐतिहासिक रूप से, इस ढाँचे का उद्देश्य निर्भीक और निष्पक्ष सेवा के माध्यम से भारत को एकजुट रखना था, लेकिन आधुनिक चुनौतियाँ इस दृष्टि को कमजोर कर रही हैं।
भ्रष्टाचार और लालच में वृद्धि
- करियर की शुरुआत में ही भ्रष्टाचार: पहले जहाँ सेवा के शुरुआती वर्षों में अधिकारी भ्रष्टाचार से दूर रहते थे, अब कई नए अधिकारी नियुक्ति के तुरंत बाद ही भ्रष्ट गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं।
- धन का संचय: नौकरशाहों पर छापों में अक्सर भारी मात्रा में नकदी और आभूषण बरामद होते हैं, जो यह दर्शाता है कि लालच ने सामाजिक सुधार के उद्देश्य को पीछे छोड़ दिया है।
- अक्षमता पर ध्यान: कई अधिकारी प्रशासनिक दक्षता या सकारात्मक बदलाव लाने के बजाय पैसा कमाने को प्राथमिकता देते हैं।
नौकरशाही की स्वायत्तता और संस्थागत अखंडता के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ:
- राजनीतिक–नौकरशाही गठजोड़: राजनीति में गिरते नैतिक मानकों ने एक ऐसा सांठगांठ वाला संबंध विकसित कर लिया है, जिसमें नौकरशाह और राजनेता आपसी लाभ के लिए एक-दूसरे के साथ जुड़ जाते हैं, जिससे संस्थागत अखंडता कमजोर होती है।
- अनुकरणात्मक भ्रष्ट व्यवहार: राजनीतिक अधिकारियों द्वारा खुलेआम दंडहीनता और लाभ-साधन की प्रवृत्तियाँ नौकरशाहों को इन प्रथाओं की नकल करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, जिससे भ्रष्टाचार सामान्य हो जाता है और सिविल सेवा के मूल्यों को बनाए रखने के बजाय इसे कमजोर किया जाता है।
- भय और अधीनता की संस्कृति: बढ़ते राजनीतिक दबाव ने नौकरशाही की स्वतंत्रता को कमजोर कर दिया है तथा सिद्धांत आधारित निर्णयों की जगह अब “हाँ में हाँ” मिलाने की संस्कृति विकसित हो गई है।
- प्रशासनिक स्वायत्तता का ह्रास: वरिष्ठ अधिकारियों में गैर-कानूनी आदेशों को अस्वीकार करने की संस्थागत शक्ति और नैतिक साहस की कमी बढ़ती जा रही है, जिससे कार्यपालिका के भीतर नियंत्रण कमजोर हो रहे हैं।
- भय-प्रेरित अनुपालन: मनमाने तबादलों, झूठी जाँच और दबावपूर्ण कार्रवाइयों की धमकियों के कारण अधिकारी संवैधानिक कर्तव्य की बजाय अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा को प्राथमिकता देने के लिए मजबूर होते हैं।
- ऊपर से नीचे तक संस्थागत गिरावट: ऊँचे स्तर पर अधीनस्थ व्यवहार पदानुक्रम में नीचे तक विस्तारित हो जाते है, जिससे सभी स्तरों पर पेशेवरिता और जवाबदेही का प्रणालीगत क्षरण होता है।
- जवाबदेही और सुधार प्रक्रिया विद्यमान में विफलताएँ:
- न्यायिक देरी और कमजोर निवारक प्रभाव: लंबे समय तक चलने वाले मुकदमे और प्रक्रियात्मक देरी जवाबदेही को कमजोर कर देते हैं, जबकि निगरानी संस्थाओं में भ्रष्टाचार निवारक प्रभाव को और कम करता है।
- प्रणालीगत खामियों का दुरुपयोग: सत्यापन और निगरानी की कमी के कारण आरक्षण और पात्रता प्रावधानों (जैसे नकली दिव्यांगता या EWS दावे) का दुरुपयोग होता है, जो प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।
- जन उदासीनता: आम जनता भ्रष्टाचार के प्रति असंवेदनशील हो गई है और इसे सामान्य मानने लगी है।
आगे की राह
- राजनीतिक सुधार: व्यापक परिवर्तन के लिए राजनीतिक सफाई आवश्यक है, लेकिन आत्म-सुधार के लिए प्रोत्साहन की कमी प्रभावशीलता को सीमित करती है।
- न्यायिक कार्रवाई: अदालतें जवाबदेही सुनिश्चित कर सकती हैं, लेकिन न्यायिक प्रक्रियाओं में देरी समयबद्ध न्याय और निवारण को कमजोर करती है।
- जन आंदोलन: मजबूत नागरिक-नेतृत्व वाले आंदोलन प्रणाली पर दबाव डाल सकते हैं और सुधार को बढ़ावा दे सकते हैं।
- उदाहरण: वर्ष 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन लोकपाल बहस को गति देने वाला उत्प्रेरक बना।
निष्कर्ष
सिविल सेवकों के कठोर चयन और उच्च स्तरीय प्रशिक्षण के बावजूद, राजनीतिक–नौकरशाही गठजोड़, नेतृत्व के साहस में गिरावट और करियर की शुरुआत में बढ़ता लालच भारत की प्रशासनिक “स्टील फ्रेम” को खोखला कर रहा है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत में सिविल सेवाओं के नैतिक मानकों और स्वतंत्रता में गिरावट के लिए उत्तरदायी कारकों की चर्चा कीजिए। साथ ही सुधारात्मक उपाय सुझाइए।
(10 अंक, 150 शब्द)
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