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परमाणु अप्रसार (Nuclear Non-Proliferation) और ईरान का परमाणु मुद्दा

Lokesh Pal July 16, 2026 05:15 9 0

संदर्भ

हाल ही में ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्य बढ़ते तनाव तथा ईरान के यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) कार्यक्रम को लेकर जारी मतभेदों ने एक बार फिर परमाणु अप्रसार (Nuclear Non-Proliferation) के मुद्दे को वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। वर्तमान वार्ताएँ वैश्विक सुरक्षा, राज्य की संप्रभुता तथा अंतरराष्ट्रीय अप्रसार व्यवस्था की प्रभावशीलता के मध्य संतुलन स्थापित करने की व्यापक चुनौती को दर्शाती हैं।

परमाणु अप्रसार क्या है?

परमाणु अप्रसार से आशय उन वैश्विक प्रयासों से है जिनका उद्देश्य—

  • परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना,
  • परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना, तथा
  • क्रमिक एवं पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण (Nuclear Disarmament) को सुनिश्चित करना है।

यह व्यवस्था मुख्यतः परमाणु अप्रसार संधि (Treaty on the Non-Proliferation of Nuclear Weapons—NPT) द्वारा संचालित होती है, जिसका उद्देश्य परमाणु संघर्ष के जोखिम को कम करना तथा शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग को प्रोत्साहित करना है।

परमाणु अप्रसार संधि (NPT), 1968

NPT के उद्देश्य

  • अतिरिक्त देशों में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना।
  • अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा उपायों (Safeguards) के अंतर्गत परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना।
  • परमाणु हथियार संपन्न देशों को भविष्य की वार्ताओं के माध्यम से परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में प्रयास करने के लिए प्रतिबद्ध करना।

मुख्य विशेषताएँ

  • संधि केवल पाँच देशों—संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और चीन—को परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र (Nuclear Weapon States—NWS) के रूप में मान्यता देती है, क्योंकि इनके पास 1 जनवरी, 1967 से पहले से ही परमाणु हथियार थे।
  • गैर-परमाणु हथियार संपन्न देश परमाणु हथियार प्राप्त न करने तथा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) द्वारा संचालित सुरक्षा उपायों को स्वीकार करने पर सहमत होते हैं।
  • इसके बदले उन्हें अंतरराष्ट्रीय निगरानी में शांतिपूर्ण एवं असैनिक (Civilian) उद्देश्यों के लिए परमाणु प्रौद्योगिकी तक पहुँच प्रदान की जाती है।

NPT पर भारत का दृष्टिकोण

भारत ने NPT पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए?

  • भारत इस संधि को भेदभावपूर्ण (Discriminatory) मानता है क्योंकि यह देशों को स्थायी रूप से “परमाणु संपन्न” (Haves) और “परमाणु-विहीन” (Have-nots) श्रेणियों में विभाजित करती है।
  • यह संधि परमाणु हथियार संपन्न देशों पर अपने परमाणु भंडार समाप्त करने का कोई समयबद्ध दायित्व नहीं सौपती है ।
  • भारत का मानना है कि वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण सार्वभौमिक (Universal), भेदभाव-रहित (Non-discriminatory) तथा सत्यापन योग्य (Verifiable) होना चाहिए।

भारत का उत्तरदायी परमाणु रिकॉर्ड

  • NPT से बाहर रहने के बावजूद भारत ने विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता की नीति अपनाई है।
  • भारत पहले प्रयोग न करने (No First Use—NFU) के सिद्धांत का पालन करता है तथा परमाणु सामग्रियों के निर्यात पर कड़े नियंत्रण बनाए रखता है।
  • वर्ष 2008 में भारत को न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) से विशेष छूट (Waiver) प्राप्त हुई, जिससे NPT का हस्ताक्षरकर्ता न होने के बावजूद भारत को अंतरराष्ट्रीय असैनिक परमाणु सहयोग प्राप्त हुआ।

ईरान का परमाणु मुद्दा

ईरान का पक्ष

  • ईरान का तर्क है कि शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम संवर्धन करना NPT के तहत उसका संप्रभु अधिकार है।
  • उसका कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम ऊर्जा उत्पादन, वैज्ञानिक अनुसंधान और अन्य असैनिक उद्देश्यों के लिए है, न कि परमाणु हथियार विकसित करने के लिए।

पश्चिमी देशों की चिंताएँ

  • संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों का मानना है कि उच्च स्तर का यूरेनियम संवर्धन ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की क्षमता प्रदान कर सकता है।
  • इसलिए वे अंतरराष्ट्रीय समझौतों एवं निरीक्षणों के माध्यम से ईरान के संवर्धन कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाने की वकालत करते हैं।

संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA), 2015

प्रमुख प्रावधान

  • ईरान ने यूरेनियम संवर्धन को 3.67% तक सीमित करने, संवर्धित यूरेनियम के भंडार को कम करने तथा IAEA द्वारा व्यापक निरीक्षण की अनुमति देने पर सहमति व्यक्त की।
  • इसके बदले ईरान पर लगाए गए अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों में उल्लेखनीय ढील दी गई।

समझौते का विघटन

  • वर्ष 2018 में संयुक्त राज्य अमेरिका JCPOA से बाहर हो गया तथा ईरान पर पुनः आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए।
  • इसके प्रत्युत्तर में ईरान ने धीरे-धीरे अपने यूरेनियम संवर्धन का स्तर लगभग 60% तक बढ़ा दिया, जिससे संभावित परमाणु हथियारीकरण (Weaponisation) को लेकर वैश्विक चिंताएँ बढ़ गईं।

वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था की चुनौतियाँ

  • दोहरे मानदंड
    • NPT पाँच मान्यता प्राप्त परमाणु शक्तियों को परमाणु हथियार रखने की अनुमति देती है, जबकि अन्य देशों पर प्रतिबंध लगाती है।
    • इससे असमानता एवं भेदभाव की धारणा उत्पन्न होती है।
    • अनेक देशों का मानना है कि संधि का सभी देशों पर समान रूप से अनुपालन नहीं किया गया है।
  • परमाणु निरस्त्रीकरण में धीमी प्रगति
    • यद्यपि परमाणु हथियार संपन्न देशों ने निरस्त्रीकरण का वादा किया था, फिर भी विश्व में बड़े परमाणु शस्त्रागार आज भी मौजूद हैं।
    • इससे अंतरराष्ट्रीय अप्रसार व्यवस्था की विश्वसनीयता कमजोर होती है।
  • विश्वास का संकट 
    • JCPOA से अमेरिका के हटने के बाद दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर विश्वास कम हुआ है ।
    • बार-बार होने वाले नीतिगत परिवर्तन भविष्य की कूटनीतिक प्रतिबद्धताओं को लेकर अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न करते हैं।
  • सुरक्षा संकट 
    • अनेक देश बाह्य खतरों से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए परमाणु क्षमता विकसित करना आवश्यक समझते हैं।
    • परिणामस्वरूप, एक देश की सुरक्षा बढ़ाने का प्रयास दूसरे देशों की असुरक्षा को बढ़ा देता है, जिससे हथियारों की प्रतिस्पर्धा तेज होती है।

मुख्य अवधारणाएँ (UPSC मुख्य परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण)

  • परमाणु प्रतिरोधक क्षमता 
    • परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का अर्थ है—ऐसी सैन्य क्षमता बनाए रखना जिससे किसी संभावित आक्रमणकारी को अस्वीकार्य क्षति पहुँचाने की क्षमता के कारण वह हमला करने से पीछे हट जाए।
    • अनेक देश परमाणु हथियारों को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने का महत्त्वपूर्ण साधन मानते हैं।
  • रसेल–आइंस्टीन घोषणापत्र (Russell–Einstein Manifesto), 1955
    • रसेल–आइंस्टीन घोषणापत्र ने चेतावनी दी थी कि मानवता को परमाणु निरस्त्रीकरण और वैश्विक विनाश में से एक का चयन करना होगा।
    • इसने परमाणु हथियारों से उत्पन्न अस्तित्वगत (Existential) खतरे की पहचान की तथा शांतिपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आह्वान किया।

आगे की राह 

  • NPT व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना: अंतरराष्ट्रीय समुदाय को परमाणु अप्रसार व्यवस्था को अधिक निष्पक्ष, पारदर्शी तथा सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य बनाने की दिशा में कार्य करना चाहिए।
  • समयबद्ध परमाणु निरस्त्रीकरण: परमाणु हथियार संपन्न देशों को NPT के अनुच्छेद VI के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हुए चरणबद्ध एवं समयबद्ध निरस्त्रीकरण का विश्वसनीय रोडमैप अपनाना चाहिए।
  • कूटनीतिक संवाद को पुनर्जीवित करना: JCPOA जैसे वार्ता आधारित समझौतों को पुनः सक्रिय किया जाना चाहिए ताकि परमाणु प्रसार संबंधी चिंताओं का समाधान करते हुए शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रमों के वैध अधिकारों का सम्मान किया जा सके।
  • IAEA की भूमिका को मजबूत करना: अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को स्वतंत्र, विश्वसनीय एवं पारदर्शी निरीक्षण जारी रखने चाहिए ताकि वैश्विक विश्वास को सुदृढ़ किया जा सके।
  • सार्वभौमिक परमाणु सुरक्षा को बढ़ावा देना: देश को परमाणु सुरक्षा, निर्यात नियंत्रण, अप्रसार मानकों तथा विश्वास-निर्माण जैसे उपायों को मजबूत करने के लिए सहयोग करना चाहिए, जिससे वैश्विक परमाणु जोखिमों को कम किया जा सके।

निष्कर्ष

अर्थात परमाणु अप्रसार की सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय सुरक्षा, राज्य की संप्रभुता तथा वैश्विक शांति के मध्य संतुलन स्थापित करना है। यद्यपि परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना अत्यंत आवश्यक है, किंतु दीर्घकालिक स्थिरता तभी संभव है जब अंतरराष्ट्रीय नियम भेदभाव-रहित, परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रयास विश्वसनीय तथा कूटनीतिक संवाद निरंतर बने रहें। एक न्यायसंगत, नियम-आधारित और समावेशी वैश्विक परमाणु व्यवस्था ही दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की आधारशिला सिद्ध होगी।

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