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Lokesh Pal
April 21, 2026 05:00
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हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में अवैध रेत खनन पर नियंत्रण करने संबंधी चेतावनी जारी की है; अन्यथा अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती की जा सकती है।
चंबल नदी एक विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र है, जहाँ रेत पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में दोहरी भूमिका निभाते है:
यह संकट लगभग 500 करोड़ रुपये की भूमिगत अर्थव्यवस्था द्वारा संचालित है, जिसे गहरे जड़ें जमाए हुए राजनेता–नौकरशाह–अपराधी गठजोड़ द्वारा कायम रखा जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने 11 मई तक लागू किए जाने हेतु एक तकनीकी और अंतर-राज्यीय सुरक्षा तंत्र (Firewall) की रूपरेखा प्रस्तुत की है:
हालाँकि संरक्षण के लिए बनाया गया ढाँचा कागज़ों पर मजबूत है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका क्रियान्वयन कमजोर कड़ी बना हुआ है:
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि अल्पकालिक लाभ और लालच कानून के शासन (Rule of Law) को दरकिनार नहीं कर सकते।
न्यायालय का हस्तक्षेप यह पुनः स्थापित करता है कि पर्यावरण संरक्षण कानून के शासन का अभिन्न हिस्सा है; अर्धसैनिक बलों की तैनाती की चेतावनी प्रशासनिक विफलता को दर्शाती है, और चंबल को पुनर्स्थापित करने के लिए खनन गठजोड़ को समाप्त करने तथा पारिस्थितिक स्थिरता को प्राथमिकता देने हेतु मजबूत संस्थागत इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।
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