प्रश्न की मुख्य माँग
- विशिष्ट जनसांख्यिकीय संरचना, प्रवासी-प्रेरित प्रेषण अर्थव्यवस्था तथा पारिस्थितिकी सीमाओं के प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
- जनसांख्यिकीय प्रोफ़ाइल, प्रेषण-आधारित अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी सीमाओं से उत्पन्न चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
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उत्तर
केरल एक विकासात्मक विरोधाभास का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ लगभग सार्वभौमिक साक्षरता, उच्च जीवन प्रत्याशा और वैश्विक प्रवासन जैसी उपलब्धियाँ पारिस्थितिकी संवेदनशीलता तथा सीमित औद्योगीकरण के साथ सह-अस्तित्व रखती हैं। इसका जनसांख्यिकीय संक्रमण, ₹1.3 लाख करोड़ की प्रेषण-आधारित अर्थव्यवस्था तथा जैव-विविधता से समृद्ध किंतु भू-संकटग्रस्त भूगोल ने भारत के भीतर एक विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक पथ को आकार दिया है, जो सतत् विकास के लिए नवाचारी मार्गों की अपेक्षा करता है।
विशिष्ट जनसांख्यिकीय संरचना, प्रवासी-प्रेरित प्रेषण अर्थव्यवस्था तथा पारिस्थितिकी सीमाओं का प्रभाव
- संरचनात्मक निर्धारक के रूप में वृद्ध होती जनसंख्या: बढ़ती आयु संरचना स्वास्थ्य देखभाल और पेंशन संबंधी व्ययों का दबाव बढ़ाती है तथा कार्यबल की भागीदारी को घटाती है।
- उदाहरण: केरल की जनसांख्यिकीय स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव डालती है, लेकिन वृद्धावस्था देखभाल और सहायक जीवन यापन क्षेत्रों में अवसर भी प्रदान करती है।
- उच्च साक्षरता और मानव पूँजी की बढ़त: 96.2% साक्षरता दर के साथ उन्नत मानव पूँजी विकास को भारी उद्योगों के स्थान पर ज्ञान-आधारित और सेवा क्षेत्रों की ओर उन्मुख करती है।
- उदाहरण: विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र जैसे संस्थान “भारहीन अर्थव्यवस्था” मॉडल को समर्थन देते हैं।
- उपभोग-आधारित विकास मॉडल: प्रतिवर्ष लगभग ₹1.3 लाख करोड़ की प्रेषण राशि घरेलू माँग और अचल संपत्ति क्षेत्र को सुदृढ़ करती है।
- वित्तीय वैश्वीकरण और कौशल गतिशीलता: खाड़ी और पश्चिमी देशों में प्रवासी उपस्थिति वैश्विक नेटवर्क और वित्तीय साक्षरता को बढ़ाती है।
- भूमि की कमी और उच्च जनसंख्या घनत्व: नीदरलैंड के तुलनीय घनत्व (लगभग 901 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर) के कारण व्यापक औद्योगीकरण पारिस्थितिकी दृष्टि से अव्यावहारिक है।
- जैव-विविधता और जलवायु संवेदनशीलता: विश्व के प्रमुख जैव-विविधता हॉटस्पॉट में से एक होने (5,679 पुष्पीय पौध प्रजातियाँ) के कारण संरक्षण नीति-निर्माण को प्रभावित करता है।
जनसांख्यिकीय संरचना, प्रेषण-आधारित अर्थव्यवस्था तथा पारिस्थितिक सीमाओं से उत्पन्न चुनौतियाँ
- बढ़ता आश्रित अनुपात: वृद्ध होती जनसंख्या के कारण कल्याणकारी व्ययों पर राजकोषीय दबाव बढ़ता है।
- उदाहरण: राज्य की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के अंतर्गत बढ़ती प्रतिबद्धताएँ।
- युवा जनसंख्या का बाह्य प्रवासन: बड़े पैमाने पर प्रवासन से घरेलू उत्पादक क्षमता घटती है और स्थानीय औद्योगिक विस्तार सीमित होता है।
- बाह्य अर्थव्यवस्थाओं पर संरचनात्मक निर्भरता: आर्थिक स्थिरता खाड़ी देशों के श्रम बाजार में उतार-चढ़ाव पर निर्भर हो जाती है।
- उदाहरण: केरल प्रवासन सर्वेक्षण में खाड़ी प्रेषण पर उच्च निर्भरता का उल्लेख।
- उत्पादक निवेश की कमी: प्रेषण राशि का बड़ा भाग आवास और उपभोग में निवेशित होता है, नवाचार या विनिर्माण में अपेक्षाकृत कम।
- जलवायु आपदाओं के प्रति संवेदनशीलता: बाढ़ और भूस्खलन अवसंरचना तथा विकास को बाधित करते हैं।
- उदाहरण: वर्ष 2018 के बाद से केरल में बार-बार आई बाढ़, जैसा कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की प्रतिवेदनों में उल्लिखित है।
- औद्योगिक विस्तार की सीमाएँ: पारिस्थितिक संवेदनशीलता के कारण भारी उद्योगों का विस्तार प्रतिबंधित रहता है।
निष्कर्ष
केरल को प्रेषण-निर्भरता से आगे बढ़कर नवाचार-प्रेरित और ज्ञान-प्रधान विकास मॉडल की ओर अग्रसर होना चाहिए, साथ ही वृद्ध होती जनसंख्या, समृद्ध जैव-विविधता और वैश्विक नेटवर्कों का रणनीतिक उपयोग करना चाहिए। चिकित्सा-प्रौद्योगिकी, समुद्री अर्थव्यवस्था, सतत् कृषि तथा अंतरिक्ष-प्रौद्योगिकी समूहों में निवेश के माध्यम से राज्य अपनी संरचनात्मक सीमाओं को प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ में परिवर्तित कर सकता है और वैश्विक रूप से एकीकृत विकास मॉडल के अंतर्गत सतत् प्रगति सुनिश्चित कर सकता है।
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