Q. अवैध रेत खनन न केवल एक पर्यावरणीय खतरा है, बल्कि यह राजनीतिक-नौकरशाही-आपराधिक गठजोड़ द्वारा पोषित शासन की विफलता भी है। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। गौण खनिजों के सतत प्रबंधन के लिए किन संस्थागत उपायों की आवश्यकता है? (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • राजनीतिक-नौकरशाही-आपराधिक गठजोड़ का उल्लेख कीजिए।
  • अवैध रेत खनन में योगदान देने वाले अन्य कारकों की चर्चा कीजिए।
  • आगे की राह सुझाइए। 

उत्तर

भारत में अवैध रेत खनन केवल पारिस्थितिकी गिरावट को ही नहीं दर्शाता, बल्कि यह एक गहरी शासन विफलता है, जहाँ कमजोर प्रवर्तन, प्रशासनिक चूक और निहित स्वार्थ विनियमन को कमजोर करते हैं, जैसा कि राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन के मामले में उजागर हुआ है।

राजनीतिक–प्रशासनिक–आपराधिक गठजोड़

  • राज्य की विफलता: राज्य प्राधिकरणों द्वारा प्रशासनिक निष्क्रियता और कमजोर प्रवर्तन के कारण अवैध रेत खनन जारी रहता है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान, मध्य प्रदेश, और उत्तर प्रदेश की पूर्ण विफलता की आलोचना की, जो राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में खनन को नियंत्रित करने में असफल रहे।
  • मिलीभगत तंत्र: राजनीतिक प्रतिनिधियों, स्थानीय अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच गहरे संबंधों के कारण अवैध खनन निरंतर चलता रहता है।
    • उदाहरण: संरक्षित क्षेत्र होने के बावजूद राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में जारी खनन प्रणालीगत मिलीभगत को दर्शाता है।
  • प्रवर्तन की खामियाँ: निगरानी और पर्यवेक्षण तंत्र की कमी से अवैध खनन बिना रोक-टोक चलता है।
    • उदाहरण: खनन मार्गों पर वाई-फाई युक्त सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए न्यायालय का निर्देश, पूर्व में प्रभावी निगरानी के अभाव को दर्शाता है।
  • कमजोर निवारक प्रभाव: जाँच और अभियोजन की कमजोरी से अपराधियों में कानूनी भय कम हो जाता है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वाहनों की जब्ती और अभियोजन शुरू करने के निर्देश यह दर्शाते हैं कि पहले प्रवर्तन ढीला था।
  • संसाधनों का दोहन: सार्वजनिक प्राकृतिक संसाधनों का निजी लाभ के लिए शोषण संरक्षण प्रयासों को कमजोर करता है।
    • उदाहरण: चंबल में अवैध खनन ने घड़ियाल संरक्षण परियोजना को खतरे में डाल दिया है, जबकि यह एक राज्य समर्थित पारिस्थितिकी पहल है।

अवैध रेत खनन के अन्य कारण

  • माँग में वृद्धि: तीव्र शहरीकरण और अवसंरचना विकास के कारण रेत की माँग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे नियमन कठिन हो जाता है।
    • उदाहरण: आवास और शहरी कार्य मंत्रालय के आँकड़े शहरी योजनाओं के तहत बढ़ती निर्माण गतिविधियों को दर्शाते हैं, जिससे रेत की खपत बढ़ती है।
  • आपूर्ति की कमी: विशेषकर पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों में वैध खनन पर प्रतिबंध से आपूर्ति घटती है, जिससे अवैध खनन को बढ़ावा मिलता है।
  • जीविका पर निर्भरता: स्थानीय समुदायों के लिए रेत खनन अक्सर आय का प्रमुख स्रोत होता है, क्योंकि वैकल्पिक रोजगार के अवसर सीमित होते हैं।
  • नियामक जटिलता: विभिन्न राज्यों और एजेंसियों के मध्य अधिकार-क्षेत्र का ओवरलैप प्रभावी शासन और प्रवर्तन को जटिल बनाता है।
    • उदाहरण: चंबल क्षेत्र का राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला होना समन्वय चुनौतियाँ उत्पन्न करता है।
  • निगरानी की कठिनाइयाँ: विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र और नदीय भू-भाग के कारण निरंतर निगरानी और प्रवर्तन करना कठिन होता है।

संस्थागत उपाय

  • प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी: डिजिटल साधनों के माध्यम से वास्तविक समय निगरानी को अपनाया जाए।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च-रिजॉल्यूशन सीसीटीवी कैमरे लगाने और उनके सीधे प्रसारण को पुलिस एवं वन अधिकारियों के नियंत्रण में रखने का निर्देश दिया।
  • अंतर-राज्यीय समन्वय: साझा पारिस्थितिकी तंत्रों में सहकारी संघवाद को मजबूत किया जाए।
    • उदाहरण: चंबल अभयारण्य के लिए तीनों राज्यों के बीच समन्वित कार्रवाई आवश्यक है।
  • कठोर प्रवर्तन: त्वरित जब्ती, दंड और अभियोजन सुनिश्चित किया जाए, ताकि निवारक प्रभाव बढ़े।
  • पारदर्शी नीलामी: वैध खनन के लिए जवाबदेह आवंटन तंत्र विकसित किया जाए।
    • उदाहरण: राज्य खनन नीतियों के अंतर्गत ई-नीलामी प्रणाली से मनमानी में कमी आती है।
  • वैकल्पिक सामग्री का प्रोत्साहन: नदियों पर दबाव कम करने के लिए M-सैंड (निर्मित रेत) जैसे विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए।

निष्कर्ष

अवैध रेत खनन से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए गहरे गठजोड़ तंत्र को प्रौद्योगिकी, समन्वय और जवाबदेही के माध्यम से समाप्त करना आवश्यक है। सतत् विकास लक्ष्य 15 (स्थलीय जीवन) और सतत् विकास लक्ष्य 16 (मजबूत संस्थाएँ) के अनुरूप एक सतत् दृष्टिकोण अपनाकर पारिस्थितिकी संरक्षण और उत्तरदायी संसाधन प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सकता है।

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