प्रश्न की मुख्य माँग
- बताइए कि कैसे अपर्याप्त दिव्यांग संवेदनशीलता के कारण दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम का सीमित प्रभाव पड़ा है।
- प्रभावी कार्यान्वयन और प्रगति के साक्ष्यों का वर्णन कीजिए।
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उत्तर
दिव्यांगजन अधिकार (RPWD) अधिनियम, 2016 को दिव्यांग व्यक्तियों को समान अधिकार, सुरक्षा और अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किया गया था। यह अधिनियम सुलभता, भेदभाव-निषेध और सामाजिक समावेशन को अनिवार्य बनाता है। हालाँकि, व्यापक जागरूकता और संवेदनशीलता की कमी के कारण इसका प्रभाव सीमित रह जाता है, जिससे यह केवल एक कानूनी ढाँचा बनकर रह जाता है, न कि वास्तविक परिवर्तन का प्रभावी साधन।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016: अपर्याप्त दिव्यांग संवेदनशीलता के कारण सीमित प्रभाव
- आधिकारिक उदासीनता: सरकारी अधिकारियों में दिव्यांग अधिकारों के प्रति व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी के कारण प्रावधानों का कमजोर क्रियान्वयन होता है।
- उदाहरण: संसदीय स्थायी समिति (2023) ने विभिन्न मंत्रालयों में सुगम्यता मानकों के खराब अनुपालन को उजागर किया।
- सामाजिक पूर्वाग्रह: समाज में मौजूद कलंक और नकारात्मक दृष्टिकोण शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक स्थानों पर दिव्यांग व्यक्तियों के समावेशन को सीमित करते हैं।
- उदाहरण: राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (NSSO) के अनुसार, लगभग 34% कार्यबल भागीदारी यह दर्शाती है कि कानूनी प्रावधानों के बावजूद सामाजिक बाधाएँ बनी हुई हैं।
- अपर्याप्त सुलभता: सार्वजनिक अवसंरचना अब भी सुगम्यता मानकों का उल्लंघन करती है, जिसका मुख्य कारण कमजोर निगरानी है।
- उदाहरण: सुगम्य भारत अभियान के लक्ष्य बार-बार पूरे नहीं हो पाए; कई रेलवे स्टेशन और सरकारी भवन अब भी मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं (सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की रिपोर्ट)।
- कम कानूनी जागरूकता: दिव्यांग व्यक्तियों को अधिनियम के तहत उपलब्ध शिकायत निवारण तंत्र की पर्याप्त जानकारी नहीं होती।
- उदाहरण: दिव्यांग व्यक्तियों के मुख्य आयुक्त के समक्ष मामलों की संख्या, वास्तविक उल्लंघनों की तुलना में बहुत कम है।
- वित्तीय कमी: अपर्याप्त और असंगत बजट आवंटन प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा डालता है।
- उदाहरण: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों में सुगम्य भारत अभियान की परियोजनाओं में विलंब और धन के कम उपयोग की बात सामने आई है।
प्रभावी क्रियान्वयन और प्रगति के साक्ष्य
- कानूनी प्रवर्तन: इस अधिनियम ने अधिकार-आधारित प्रवर्तन को मजबूत किया है, विशेषकर न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से।
- उदाहरण: न्यायालयों ने पदोन्नति में आरक्षण और सुगम्यता मानकों के अनुपालन के संबंध में निर्देश दिए हैं।
- संस्थागत तंत्र: समर्पित संस्थाएँ क्रियान्वयन की निगरानी और शिकायतों के निवारण में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
- उदाहरण: दिव्यांग व्यक्तियों के मुख्य आयुक्त नियमित रूप से मामलों की सुनवाई करते हैं और संबंधित प्राधिकरणों को निर्देश जारी करते हैं।
- सुगम्यता में प्रगति: सार्वजनिक अवसंरचना में सुगमता बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाए गए हैं।
- उदाहरण: सुगम्य भारत अभियान के तहत हवाई अड्डों, सरकारी भवनों और सार्वजनिक परिवहन में पहुँच में सुधार हुआ है।
- नीतिगत समावेशन: दिव्यांग समावेशन को व्यापक शासन ढाँचे में धीरे-धीरे शामिल किया जा रहा है।
- उदाहरण: राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में समावेशी शिक्षा पर बल दिया गया है तथा विभिन्न योजनाओं में सुगम्यता मानकों को अनिवार्य किया गया है।
- डिजिटल समावेशन: प्रौद्योगिकी-आधारित शासन से सुगम्यता और जागरूकता में वृद्धि हो रही है।
- उदाहरण: सरकारी वेबसाइटों में सुगम्यता मानकों को अपनाया जा रहा है तथा सेवाओं में सहायक तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है।
निष्कर्ष
यद्यपि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ने कानूनी प्रवर्तन और नीतिगत समावेशन के माध्यम से मात्र प्रतीकात्मकता से आगे बढ़ने का प्रयास किया है, फिर भी इसकी परिवर्तनकारी क्षमता कमजोर संवेदनशीलता और कार्यान्वयन की खामियों के कारण सीमित बनी हुई है। इस अंतर को पाटने के लिए निरंतर जागरूकता, क्षमता निर्माण और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि कानूनी अधिकार वास्तविक जीवन में व्यावहारिक रूप से लागू हो सकें।
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