Q. द्वीपीय विकास परियोजनाओं में रणनीतिक अनिवार्यताओं और स्वदेशी अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। न्यायसंगत और सतत परिणामों को सुनिश्चित करने के लिए एक रूपरेखा सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • रणनीतिक आवश्यकताओं और स्वदेशी अधिकारों के संतुलन की चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
  • विकास और स्वदेशी अधिकारों के बीच असंतुलन के प्रभावों को स्पष्ट कीजिए।
  • समानतापूर्ण एवं सतत् द्वीप विकास की रूपरेखा सुझाइए।

उत्तर

ग्रेट निकोबार द्वीप जैसे विकास परियोजनाएँ रणनीतिक आवश्यकताओं और स्वदेशी (जनजातीय) अधिकारों के बीच उत्पन्न तनाव को दर्शाती हैं। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है, ताकि पर्यावरणीय संतुलन और जनजातीय आजीविकाओं को प्रभावित किए बिना सतत् विकास सुनिश्चित किया जा सके।

मुख्य भाग

रणनीतिक आवश्यकताओं और स्वदेशी अधिकारों के संतुलन की चुनौतियाँ

  • रणनीतिक प्राथमिकता: राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यापारिक हित अक्सर स्थानीय चिंताओं पर हावी हो जाते हैं।
    • उदाहरण: इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थिति का उपयोग वैश्विक व्यापार के लिए करना चाहता है।
  • विस्थापन का जोखिम: जनजातीय समुदायों को स्थानांतरण और आजीविका के नुकसान का सामना करना पड़ता है।
    • उदाहरण: निकोबारी और शोम्पेन जनजातियों के संभावित पुनर्वास के प्रस्ताव।
  • पर्यावरणीय समझौते: अवसंरचना परियोजनाएँ संवेदनशील द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती हैं।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्वीकृति के बावजूद जैव विविधता हानि को लेकर चिंताएँ।
  • कमजोर परामर्श: सीमित या अस्पष्ट जनभागीदारी से परियोजनाओं की वैधता पर प्रश्न उठते हैं।
    • उदाहरण: प्रारूप योजना में परामर्श की समय-सीमा स्पष्ट नहीं है।
  • विधायी संघर्ष: विभिन्न स्वीकृतियों का ओवरलैप और लंबित मुकदमे अनिश्चितता उत्पन्न करते हैं।

विकास और स्वदेशी अधिकारों के बीच असंतुलन के प्रभाव

  • सामाजिक हाशियाकरण: जनजातीय समुदायों को सांस्कृतिक विस्थापन और पारंपरिक आजीविकाओं से वंचित होने का खतरा रहता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2022 से चल रहे विरोधों में पारंपरिक वन अधिकारों के खोने की आशंका व्यक्त की गई।
  • पर्यावरणीय क्षरण: बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाएँ जैव विविधता और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को दीर्घकालिक तथा अपरिवर्तनीय क्षति पहुँचा सकती हैं।
    • उदाहरण: परियोजना से द्वीप की पारिस्थितिकी में स्थायी परिवर्तन की आशंका।
  • जनसंख्या दबाव: तीव्र जनसंख्या वृद्धि स्थानीय संसाधनों और वहन क्षमता पर अत्यधिक दबाव डालती है।
    • उदाहरण: जनसंख्या 10,000 से बढ़कर वर्ष 2055 तक 3.36 लाख होने का अनुमान।
  • शासन में कमी: सहमति और सहभागी योजना के अभाव से नीतियों की वैधता और स्वीकृति कमजोर होती है।
  • रणनीतिक प्रतिकूल प्रभाव: अपर्याप्त योजना से आर्थिक लक्ष्यों और रणनीतिक उद्देश्यों दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
    • उदाहरण: विशेषज्ञों द्वारा परियोजना की व्यावसायिक और नौसैनिक व्यवहार्यता पर प्रश्न उठाए गए हैं।

समानतापूर्ण एवं सतत् द्वीप विकास का ढाँचा

  • समावेशी परामर्श: सभी हितधारकों के साथ निरंतर, पारदर्शी और सार्थक संवाद सुनिश्चित किया जाए।
    • उदाहरण: परामर्श को केवल सीमित प्रारूप अधिसूचना अवधि तक न रखकर विस्तारित किया जाए।
  • अधिकारों का संरक्षण: विकास या नियामक स्वीकृतियों से पहले जनजातीय और वन अधिकारों की मान्यता और संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए।
    • उदाहरण: स्वीकृति से पूर्व वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का पूर्ण कार्यान्वयन।
  • पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय: संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा हेतु कठोर पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और न्यूनीकरण उपाय अपनाए जाएँ।
    • उदाहरण: विकास योजना में जैव विविधता क्षेत्रों का संरक्षण।
  • चरणबद्ध विकास: प्रभावों का मूल्यांकन और नीतिगत सुधार के लिए क्रमिक और चरणबद्ध कार्यान्वयन अपनाया जाए।
    • उदाहरण: द्वीप का एक साथ बड़े पैमाने पर रूपांतरण करने से बचना।
  • संस्थागत समन्वय: न्यायपालिका, कार्यपालिका और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय सुनिश्चित कर संतुलित और उत्तरदायी निर्णय-निर्माण किया जाए।

निष्कर्ष

सहमति, पर्यावरणीय विवेक और अधिकार-आधारित शासन पर आधारित संतुलित दृष्टिकोण अत्यंत आवश्यक है। सतत् द्वीप विकास को रणनीतिक उद्देश्यों और जनजातीय गरिमा के मध्य समन्वय स्थापित करना होगा, ताकि दीर्घकालिक स्थिरता, वैधता और समावेशी विकास सुनिश्चित हो सके, विशेषकर इन संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्रों में।

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