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विकेंद्रीकृत जैव-ऊर्जा प्रणालियाँ

20 May 2026

संदर्भ

भारत ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और अपशिष्ट को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य स्वच्छ ऊर्जा में बदलने के लिए विकेंद्रीकृत जैव ऊर्जा प्रणालियों पर तेजी से ध्यान केंद्रित कर रहा है।

भारत के ऊर्जा क्षेत्र और अपशिष्ट के संबंध में मुख्य चिंताएँ

  • आयात पर उच्च निर्भरता: भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85% आयात करता है, जिससे अर्थव्यवस्था वैश्विक मूल्य झटकों और रूस-यूक्रेन संघर्ष व पश्चिम एशिया संघर्ष जैसे भू-राजनीतिक व्यवधानों के प्रति संवेदनशील हो जाती है।
  • जीवाश्म ईंधन का प्रभुत्व: कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस भारत के ऊर्जा मिश्रण में प्रभावी बने हुए हैं, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और वायु प्रदूषण में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।
  • ऊर्जा की बढ़ती माँग: तीव्र औद्योगीकरण, शहरीकरण और EV (इलेक्ट्रिक वाहन) का विस्तार विद्युत की माँग को बढ़ा रहा है, जिससे ग्रिड बुनियादी ढाँचे और ईंधन आपूर्ति पर दबाव पड़ रहा है।
  • अपशिष्ट प्रबंधन संकट: भारत सालाना लगभग 750 मिलियन टन कृषि बायोमास उत्पन्न करता है, फिर भी बड़ी मात्रा में इसे जलाया या डंप किया जाता है, जिससे प्रदूषण और आर्थिक नुकसान होता है।

जैव ऊर्जा प्रणालियों के बारे में

जैव ऊर्जा प्रणालियाँ जैविक या तापीय तकनीकों के माध्यम से फसल अवशेष, सीवेज कीचड़, पशु अपशिष्ट और खाद्य अपशिष्ट जैसे कार्बनिक अपशिष्ट को उपयोगी ऊर्जा में परिवर्तित करती हैं।

जैव ऊर्जा प्रणालियों के प्रकार

  • गैसीकरण (Gasification): उच्च तापमान पर आंशिक दहन के माध्यम से भूसा, फसल अवशेष और लकड़ी के अपशिष्ट जैसे सूखे बायोमास को सिनगैस में परिवर्तित करता है।
    • सिनगैस कार्बन मोनऑक्साइड, हाइड्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड और कम मात्रा में मेथेन व अन्य गैसों से बनी होती है।
  • अवायवीय पाचन (Anaerobic Digestion): बायोगैस का उत्पादन करने के लिए ऑक्सीजन-मुक्त परिस्थितियों में सीवेज, खाद और खाद्य अपशिष्ट जैसे गीले कार्बनिक अपशिष्ट को तोड़ता है।
    • बायोगैस में मुख्य रूप से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड शामिल होती है।
    • यह प्रक्रिया पोषक तत्त्वों से भरपूर पाचक अवशेष भी उत्पन्न करती है, जिसका यदि प्रभावी ढंग से प्रबंधन किया जाए, तो मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के लिए उपयोग किया जा सकता है।

जैव ऊर्जा प्रणालियों की प्रमुख विशेषताएँ

  • अपशिष्ट से धन का सृजन: जैव ऊर्जा कृषि अवशेषों और शहरी कार्बनिक अपशिष्ट को व्यावसायिक रूप से उपयोगी ईंधन और विद्युत में बदल देती है।
  • नवीकरणीय और कम कार्बन वाला स्रोत: जैव ऊर्जा जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करती है और पेरिस समझौते के तहत भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं का समर्थन करती है।
  • बहु-उपयोगिता ऊर्जा उत्पादन: जैव ऊर्जा प्रणालियाँ विभिन्न फीडस्टॉक (कच्चे माल) से विद्युत, गर्मी, हाइड्रोजन, बायोचार, एथेनॉल और नवीकरणीय मेथेन का उत्पादन कर सकती हैं।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था का समर्थन: पाचक अवशेष और बायोचार जैसे उप-उत्पाद मृदा की उर्वरता में सुधार करते हैं और सतत् कृषि प्रथाओं को बढ़ावा देते हैं।

विकेंद्रीकृत जैव ऊर्जा प्रणालियों की क्षमता

  • ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाना: भारत की अधिशेष बायोमास क्षमता आयातित जीवाश्म ईंधन के एक बड़े हिस्से को प्रतिस्थापित कर सकती है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम कर सकती है।
  • पराली दहन और प्रदूषण को कम करना: फसल अवशेषों का जैव ऊर्जा के रूप में उपयोग पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं को कम कर सकता है, जिससे उत्तर भारत में हवा की गुणवत्ता में सुधार होगा।
  • ग्रामीण औद्योगीकरण को बढ़ावा देना: छोटे पैमाने के जैव ऊर्जा संयंत्र स्थानीय ऊर्जा उत्पादन के माध्यम से MSMEs, कृषि-प्रसंस्करण समूहों और ग्रामीण उद्योगों को सहायता प्रदान कर सकते हैं।
  • अपशिष्ट प्रबंधन में सुधार: विकेंद्रीकृत प्रणालियाँ लैंडफिल (अपशिष्ट के ढेरों) के दबाव को कम करते हुए सीवेज, खाद्य अपशिष्ट और शहरी कार्बनिक अपशिष्ट को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने में मदद करती हैं।
  • जलवायु और कार्बन लक्ष्यों का समर्थन: जैव ऊर्जा प्रणालियाँ अपशिष्ट से होने वाले मेथेन उत्सर्जन को कम करती हैं और बायोचार व कार्बन-क्रेडिट बाजारों के माध्यम से कार्बन सोखने (carbon sequestration) के अवसर उत्पन्न करती हैं।

जैव ऊर्जा प्रणालियों को बढ़ावा देने के लिए सरकारी पहल

  • सतत् (SATAT) योजना (2018): ‘सस्टेनेबल अल्टरनेटिव टुवर्ड्स अफोर्डेबल ट्रांसपोर्टेशन’ पहल कृषि और कार्बनिक अपशिष्ट से संपीडित बायोगैस (CBG) के उत्पादन को बढ़ावा देती है।
  • राष्ट्रीय जैव ऊर्जा कार्यक्रम (National Bioenergy Programme) (2022): यह कार्यक्रम नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन और ग्रामीण ऊर्जा पहुँच के लिए बायोमास, बायोगैस और अपशिष्ट से ऊर्जा परियोजनाओं का समर्थन करता है।
  • गोबर-धन योजना (GOBAR-Dhan Scheme) (2018): ‘गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन’ योजना मवेशियों के गोबर और जैविक अपशिष्ट को बायोगैस तथा जैविक खाद में बदलने को प्रोत्साहित करती है।
  • एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम: यह कार्यक्रम कच्चे तेल के आयात को कम करने और स्वच्छ ईंधन परिवर्तन का समर्थन करने के लिए पेट्रोल के साथ एथेनॉल के सम्मिश्रण को बढ़ावा देता है।
    • E100 पहल (2026) व्यावसायिक ऑटोमोटिव ईंधन के रूप में शुद्ध (100%) एथेनॉल को मंजूरी देने और वितरित करने का एक रोडमैप है।
  • पीएम-कुसुम योजना (2019): सौर और जैव ऊर्जा आधारित समाधानों के माध्यम से कृषि के लिए विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन का समर्थन करती है।

निष्कर्ष

विकेंद्रीकृत जैव ऊर्जा प्रणालियाँ टिकाऊ स्थानीयकृत स्वच्छ-ऊर्जा समाधानों के माध्यम से भारत की ऊर्जा असुरक्षा, अपशिष्ट-प्रबंधन संकट और जलवायु लक्ष्यों को एक साथ संबोधित कर सकती हैं।

विकेंद्रीकृत जैव-ऊर्जा प्रणालियाँ

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