दत्तक माताओं के लिए मातृत्व अवकाश

19 Mar 2026

संदर्भ

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हमसानंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ मामले में दत्तक माताओं को बच्चे की आयु की परवाह किए बिना 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश प्रदान किया और सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4) को सीमित रूप से व्याख्यायित किया।

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की मूल धारा 60(4)

  • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4) दत्तक और कमीशनिंग माताओं के लिए मातृत्व लाभ से संबंधित है।
  • इसमें प्रावधान था कि:
    • दत्तक माताएँ 12 सप्ताह के मातृत्व लाभ की पात्र होंगी, केवल तब जब दत्तक लिया गया बच्चा 3 महीने से कम आयु का हो।
    • कमीशनिंग मदर (सरोगेसी व्यवस्था में) भी बच्चे के सौंपे जाने की तिथि से 12 सप्ताह के मातृत्व लाभ की पात्र होंगी।

  • “परिवार केवल जैविक कारकों द्वारा परिभाषित नहीं होता है। मातृत्व अवकाश का संरक्षण एक बुनियादी मानव अधिकार है, जो यह सुनिश्चित करता है कि मातृत्व कार्यस्थल पर बहिष्कार का कारण न बने।” — भारत का सर्वोच्च न्यायालय (2026)

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के प्रमुख बिंदु

  • आयु के आधार पर निरंकुश वर्गीकरण समाप्त करना: न्यायालय ने कहा कि दत्तक बच्चे की आयु के आधार पर मातृत्व लाभ को सीमित करना स्पष्ट रूप से मनमाना और असंवैधानिक है, क्योंकि यह अनुच्छेद-14 और 21 के अंतर्गत युक्तिसंगत वर्गीकरण की शर्त को पूरा नहीं करता है।
    • न्यायालय ने पाया कि ऐसा भेद मातृत्व संरक्षण के उद्देश्य से तार्किक रूप से जुड़ा नहीं है।
  • जैविक प्रक्रियाओं से परे मातृत्व की मान्यता: निर्णय में स्पष्ट किया गया कि मातृत्व केवल प्रसव तक सीमित नहीं है, बल्कि देखभाल, भावनात्मक जुड़ाव और पालन-पोषण की जिम्मेदारियों में निहित है।
    • इसलिए, दत्तक माताएँ भी अभिभावकीय दायित्वों के संदर्भ में जैविक माताओं के समान स्थिति में हैं।
  • धारा 60(4) का सीमित व्याख्यायन: न्यायालय ने प्रावधान की पुनर्व्याख्या करते हुए कहा कि:
    • कोई भी महिला जो विधिक रूप से बच्चे को गोद लेती है या ‘कमीशनिंग मदर’ है, वह बच्चे के सौंपे जाने की तिथि से 12 सप्ताह के मातृत्व अवकाश की पात्र होगी, चाहे बच्चे की आयु कुछ भी हो।
    • यह व्याख्या सुनिश्चित करती है कि कानून संवैधानिक नैतिकता और सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप हो।
  • मातृत्व अवकाश एक मानव अधिकार और सामाजिक सुरक्षा: न्यायालय ने जोर दिया कि मातृत्व लाभ केवल वैधानिक अधिकार नहीं हैं, बल्कि गरिमा, स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा से जुड़े एक मूलभूत मानव अधिकार हैं।
    • यह संरक्षण सुनिश्चित करता है कि महिलाओं को रोजगार और मातृत्व के बीच चयन करने के लिए बाध्य न होना पड़े।
  • अनुच्छेद-21 के अंतर्गत प्रजनन स्वायत्तता का विस्तार: दत्तक ग्रहण को परिवार निर्माण के एक वैध माध्यम के रूप में मान्यता देकर न्यायालय ने प्रजनन और निर्णयात्मक स्वायत्तता के दायरे का विस्तार किया।
    • इसने कहा कि अभिभावक बनने का अधिकार दत्तक लेने के विकल्प को भी शामिल करता है और इसे अनुच्छेद-21 के अंतर्गत संरक्षित किया जाना चाहिए।
  • प्रारंभिक अभिभावकीय जुड़ाव का महत्त्व: न्यायालय ने कहा कि अभिभावकीय देखभाल, जुड़ाव और भावनात्मक एकीकरण की आवश्यकता बच्चे की आयु के साथ कम नहीं होती।
    • दत्तक बच्चे, चाहे उनकी आयु कुछ भी हो, परिवार में समायोजन के लिए समय, स्थिरता और पोषणात्मक सहयोग की आवश्यकता रखते हैं।
  • पितृत्व अवकाश के लिए सशक्त पक्षसमर्थन: न्यायालय ने यह महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की कि पितृत्व अवकाश की अनुपस्थिति पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं को सुदृढ़ करती है, जहाँ देखभाल का कार्य असमान रूप से महिलाओं पर डाल दिया जाता है।
    • इसने सरकार से पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा अधिकार के रूप में मान्यता देने का आग्रह किया और यह रेखांकित किया कि प्रारंभिक बाल देखभाल में पिता की भागीदारी अनिवार्य है और इसे टाला नहीं जा सकता।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का महत्त्व

  • “मातृत्व केवल जैविक नहीं है”: न्यायालय ने कहा कि 3 महीने की आयु सीमा असंवैधानिक है और यह अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) तथा अनुच्छेद-21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करती है।
    • इसने विधिक ध्यान को जन्म देने की प्रक्रिया से हटाकर पालन-पोषण की प्रक्रिया पर केंद्रित किया। न्यायालय ने कहा कि “मातृत्व लाभ का उद्देश्य प्रसव की प्रक्रिया से नहीं, बल्कि मातृत्व की प्रक्रिया से जुड़ा है।”
  • “भ्रामक” लाभों को समाप्त करना: न्यायालय ने कहा कि भारत के दत्तक ग्रहण कानूनों (केंद्रीय दत्तक संसाधन प्राधिकरण-CARA) के अंतर्गत 3 महीने से कम आयु के बच्चे के लिए विधिक प्रक्रिया को पूरा करना व्यवहार में लगभग असंभव है।
    • इस प्रकार, पूर्व कानून ऐसा लाभ प्रदान करता था, जो कागज पर तो मौजूद था, परंतु व्यवहार में शायद ही उपयोग किया जा सकता था।
    • नया प्रावधान: अब सभी दत्तक माताएँ बच्चे की आयु की परवाह किए बिना 12 सप्ताह के अवकाश की पात्र होंगी, जो बच्चे के सौंपे जाने की तिथि से लागू होगा।

CARA के बारे में

  • यह महिला और बाल विकास मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय है।
  • यह भारत में अनाथ, परित्यक्त और समर्पित बच्चों के दत्तक ग्रहण के लिए नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है।
  • यह देश के भीतर तथा अंतर-देशीय दत्तक ग्रहण दोनों को विनियमित करता है।

  • प्रजनन स्वायत्तता और समानता: निर्णय ने दत्तक ग्रहण को प्रजनन स्वायत्तता के समान प्रयोग के रूप में मान्यता दी।
    • दत्तक और जैविक माताओं के साथ भिन्न व्यवहार करके कानून एक “मनमाना वर्गीकरण” उत्पन्न कर रहा था, जिसका कोई तार्किक उद्देश्य नहीं था।
    • इसने यह भी रेखांकित किया कि अधिक आयु के दत्तक बच्चों को भावनात्मक जुड़ाव और नए पारिवारिक वातावरण में समायोजन के लिए अधिक समय की आवश्यकता होती है।

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  • रणनीतिक महत्त्व
    • संवैधानिक नैतिकता: यह निर्णय इस बात का प्रमुख उदाहरण है कि न्यायपालिका ने “संवैधानिक नैतिकता” का उपयोग करते हुए संकीर्ण वैधानिक प्रावधानों को निरस्त किया।
      • यह सुनिश्चित करता है कि “परिवार” की बदलती सामाजिक परिभाषाओं के साथ कानून भी विकसित हो।
    • सामाजिक सुरक्षा का विस्तार: न्यायालय ने इस अवसर का उपयोग करते हुए केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश पर कानून बनाने का आग्रह भी किया, यह बताते हुए कि बच्चे के जीवन के प्रारंभिक चरण में पिता की अनुपस्थिति, हानिकारक लैंगिक भूमिकाओं को सुदृढ़ करती है।

भारत में मातृत्व अवकाश नीति के बारे में

  • संदर्भ: मातृत्व अवकाश एक प्रकार का अनिवार्य दीर्घकालिक सवेतन अवकाश है, जो किसी कर्मचारी को प्रसव से पूर्व या बाद में अथवा बच्चे के विधिक दत्तक ग्रहण के समय प्रदान किया जाता है।
  • संवैधानिक स्थिति: मातृत्व अवकाश को राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद-42 के माध्यम से आधार प्राप्त है, जो राज्य को न्यायसंगत और मानवीय कार्य-परिस्थितियाँ तथा मातृत्व राहत सुनिश्चित करने का निर्देश देता है।
  • विधिक प्रावधान: यह नीति मुख्यतः मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (जिसमें वर्ष 2017 में महत्त्वपूर्ण संशोधन किया गया) के अंतर्गत परिभाषित है और अब इसे सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में समाहित किया गया है।
  • उद्देश्य: महिला कर्मचारियों को अपने तथा अपने बच्चों की देखभाल करते समय नौकरी की सुरक्षा प्रदान करना, ताकि उन्हें कॅरियर और मातृत्व के बीच चयन करने के लिए बाध्य न होना पड़े।

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  • पात्रता एवं दायरा: यह सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के संगठनों में कार्यरत महिलाओं पर लागू होती है।
    • यह वर्तमान में स्वरोजगार में संलग्न महिलाओं या 10 से कम कर्मचारियों वाली संस्थाओं पर लागू नहीं होती है।
  • प्रमुख प्रावधान
    • अवधि: प्रथम और द्वितीय संतान के लिए 26 सप्ताह का अवकाश (जिसमें से अधिकतम 8 सप्ताह प्रसव-पूर्व लिया जा सकता है)।
    • अन्य संतान: तीसरी या उससे अधिक गर्भावस्था के लिए 12 सप्ताह का अवकाश।
    • दत्तक/कमीशनिंग: 12 सप्ताह का अवकाश (मार्च 2026 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने बच्चे की आयु 3 महीने से कम होने की शर्त को समाप्त कर दिया)।
    • चिकित्सीय परिस्थितियाँ: चिकित्सीय गर्भसमापन या आकस्मिक गर्भपात की स्थिति में 12 सप्ताह का अवकाश।
    • घर से कार्य: कार्य की प्रकृति संबंधी अनुमति देने पर प्रोत्साहित किया जाता है; पारस्परिक अनुबंध के माध्यम से अवकाश के बाद भी बढ़ाया जा सकता है।
    • क्रेच सुविधाओं तक पहुँच: 50 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले संगठनों के लिए अनिवार्य; माताओं को दिन में चार बार क्रेच जाने की अनुमति होती है।
    • नौकरी की सुरक्षा: नियोक्ताओं को अवकाश के दौरान कर्मचारी को सेवा से हटाने की अनुमति नहीं है और उन्हें समान पद पर पुनः नियुक्त करना अनिवार्य है।

प्रजनन अधिकारों के बारे में

  • प्रजनन अधिकार महिलाओं को अस्वस्थता से संरक्षण प्रदान करने और यौन एवं प्रजनन कल्याण को बढ़ावा देने हेतु सुनिश्चित मानव अधिकारों का एक समुच्चय है।
  • मान्यता प्राप्त मानव अधिकार: ये अधिकार अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विधि के साथ अंतर्संबंधित हैं, जिनमें स्वास्थ्य का अधिकार, गोपनीयता का अधिकार, समानता का अधिकार और गरिमा का अधिकार शामिल हैं।
  • अधिकारों का वर्गीकरण
    • प्रजनन आत्म-निर्णय: बच्चों की संख्या, अंतराल और समय निर्धारण करने का अधिकार।
    • स्वास्थ्य सेवाएँ और जानकारी: गर्भनिरोध, प्रजनन उपचार और प्रजनन स्वास्थ्य शिक्षा तक पहुँच।
    • समानता और भेदभाव-रहितता: यह सुनिश्चित करना कि प्रजनन विकल्प सामाजिक या आर्थिक बहिष्कार का कारण न बनें।
  • न्यायिक दृष्टिकोण: सर्वोच्च न्यायालय ने पुष्टि की कि दत्तक ग्रहण अनुच्छेद-21 के अंतर्गत प्रजनन और निर्णयात्मक स्वायत्तता का समान प्रयोग है।
  • “प्रथम 1,000 दिन” और सतत् विकास लक्ष्य 2: चिकित्सीय अनुसंधान यह पुष्टि करता है कि पहले 1,000 दिनों के दौरान अभिभावकीय उपस्थिति अवरुद्ध वृद्धि और क्षीणता को रोकने के लिए सबसे किफायती हस्तक्षेप है।
    • यह सीधे मातृत्व अवकाश को सतत् विकास लक्ष्य 2 (शून्य भुखमरी) और भविष्य के कार्यबल के स्वास्थ्य से जोड़ता है।
  • अनुच्छेद-15(3) – संरक्षात्मक भेदभाव: यह निर्णय अनुच्छेद-15(3) का एक शास्त्रीय अनुप्रयोग है, जो राज्य को “महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान” बनाने की अनुमति देता है।
    • यह सुनिश्चित करता है कि जैविक या सामाजिक विकल्प (जैसे दत्तक ग्रहण) आर्थिक हानि का कारण न बनें।

मातृत्व अवकाश क्यों आवश्यक है?

  • स्वास्थ्य और पुनर्प्राप्ति
    • शारीरिक पुनर्स्थापन: सामान्य उपचार से आगे बढ़कर, विश्व बैंक (2025) के अनुसार सवेतन अवकाश शिशु मृत्यु दर और मातृ अवसाद को कम करने का सबसे प्रभावी साधन है।
    • “चौथा त्रैमास”: बच्चे के जीवन के पहले 1,000 दिन अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं। अवकाश से विशेष स्तनपान संभव होता है, जिसे NFHS-5 और हालिया नीति आयोग के पत्रों ने दीर्घकालिक राष्ट्रीय उत्पादकता से जोड़ा है।
  • आर्थिक विकास और प्रतिधारण
    • बढ़ती भागीदारी: भारत की महिला श्रम बल भागीदारी दर वर्ष 2023-24 में 41.7% तक पहुँच गई है (PIB के आँकड़ों के अनुसार) और वर्ष 2025 तक इसमें वृद्धि की प्रवृत्ति जारी है।
    • “लीकेज” को रोकना: नीति आयोग (2025) के अनुसार, “देखभाल भार” के कारण अभी भी लाखों महिलाएँ कार्यबल छोड़ देती हैं। वैधानिक अवकाश स्थायी निकास को अस्थायी विराम में परिवर्तित करता है, जिससे अर्थव्यवस्था को मानव पूँजी के बिना संचालित होने से अरबों की बचत होती है।

महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ और अंतराल

  • “मातृत्व दंड”: वर्ष 2025 के एक अध्ययन के अनुसार, जहाँ 92% सरकारी कर्मचारी अवकाश का उपयोग करते हैं, वहीं निजी क्षेत्र की केवल 75% महिलाएँ ही ऐसा कर पाती हैं, प्रायः नौकरी खोने के डर या नियोक्ता द्वारा अस्वीकार के कारण।
  • अनौपचारिक क्षेत्र का विभाजन: भारत की 90% महिला कार्यबल असंगठित क्षेत्र में है। यद्यपि सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 सहायता का उद्देश्य रखती है, परंतु क्रियान्वयन की कमियाँ घरेलू और कृषि श्रमिकों को वास्तविक नकद लाभ से वंचित रखती हैं।
  • असंतुलित देखभाल (पितृत्व अंतर): वर्ष 2025 के आँकड़ों के अनुसार, केवल लगभग 14% भारतीय कंपनियों में औपचारिक पितृत्व अवकाश नीतियाँ हैं। इससे यह धारणा सुदृढ़ होती है कि “बाल देखभाल महिलाओं का कार्य है”, जिससे भर्ती में पक्षपात उत्पन्न होता है।
  • “10-कर्मचारी” सीमा: सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020) की एक प्रमुख सीमा यह है कि यह मुख्यतः 10 या अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों पर लागू होती है। इससे सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों, स्टार्ट-अप्स और छोटे दुकानों में कार्यरत लाखों महिलाएँ सुरक्षा दायरे से बाहर रह जाती हैं।
  • गिग श्रमिकों के लिए अस्पष्टता: यद्यपि वर्ष 2020 की संहिता में “गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों” का उल्लेख है, परंतु वितरण भागीदारों या कैब चालकों के लिए सवेतन मातृत्व लाभ प्राप्त करने का स्पष्ट तंत्र नहीं है, जिससे आधुनिक अर्थव्यवस्था में “संरक्षण शून्य” उत्पन्न होता है।
  • “मातृत्व दंड” बनाम “पितृत्व संबंधी लाभ”: वर्ष 2025 के आँकड़ों से संकेत मिलता है कि जहाँ महिलाओं को बच्चों के बाद वेतन कटौती या कॅरियर में ठहराव का सामना करना पड़ता है (मातृत्व दंड), वहीं पुरुषों को प्रायः विश्वसनीयता और वेतन में वृद्धि का लाभ मिलता है (पितृत्व संबंधी लाभ)। इस पक्षपात को समाप्त करने का एकमात्र उपाय अनिवार्य पितृत्व अवकाश है।

आगे की राह

  • सामाजिक बीमा मॉडल: “नियोक्ता-भुगतान” से हटकर सरकारी-नेतृत्व वाले सामाजिक सुरक्षा कोष की ओर बढ़ना। विश्व बैंक (2026) के अनुसार, यह कंपनियों पर “वित्तीय बोझ” को कम करता है, जिससे वे महिलाओं को नियुक्त करने के लिए अधिक इच्छुक होती हैं।
  • डिजिटल समावेशन (ई-श्रम एवं प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना): असंगठित श्रमिकों की पहचान के लिए ई-श्रम पोर्टल का उपयोग तथा प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से प्रत्यक्ष लाभ अंतरण द्वारा त्वरित वित्तीय सहायता प्रदान करना।
  • विधिक समावेशन (ऐतिहासिक सर्वोच्च न्यायालय निर्णय)
    • दत्तक माताएँ: हमसानंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने “3 महीने की आयु सीमा” को निरस्त करते हुए निर्णय दिया कि सभी दत्तक माताएँ बच्चे की आयु की परवाह किए बिना 12 सप्ताह के अवकाश की पात्र हैं।
    • पितृत्व अवकाश: न्यायालय ने हाल ही में केंद्र से पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने का आग्रह किया, यह कहते हुए कि “अभिभावकत्व एक एकाकी कार्य नहीं है।”
  • प्रत्यास्थ कार्य (श्रम संहिताएँ): नई श्रम संहिताएँ मातृत्व अवकाश के बाद “वर्क फ्रॉम होम” को प्रोत्साहित करती हैं और 50 से अधिक कर्मचारियों वाले कार्यालयों में क्रेच सुविधाएँ अनिवार्य करती हैं, ताकि कार्य पर वापसी को समर्थन मिल सके।
  • नॉर्डिक मॉडल (स्वीडन/नॉर्वे): भारत को “अभिभावकीय अवकाश” मॉडल की ओर देखना चाहिए, जहाँ अवकाश दोनों अभिभावकों के बीच साझा किया जाता है। इससे नियोक्ता केवल महिला उम्मीदवारों को “वित्तीय जोखिम” के रूप में नहीं देखते हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन अभिसमय संख्या 183: भारत को इस अभिसमय के अनुरूप अपने वित्तपोषण को संरेखित करते हुए पूर्ण रूप से “सामाजिक बीमा मॉडल” की ओर स्थानांतरित होना चाहिए। यदि अवकाश के दौरान वेतन का भुगतान सरकार/राज्य कोष से किया जाए, तो निजी क्षेत्र में महिलाओं के विरुद्ध भर्ती भेदभाव में उल्लेखनीय कमी आएगी।
  • क्रेच-एज-ए-सर्विस: प्रत्येक छोटे कार्यालय को क्रेच बनाने के लिए बाध्य करने के बजाय, सरकार को वाणिज्यिक समूहों में सामुदायिक क्रेच केंद्रों को बढ़ावा देना चाहिए, जिन्हें सामाजिक सुरक्षा उपकर के माध्यम से वित्तपोषित किया जाए।
  • लैंगिक-तटस्थ नीति भाषा: आधिकारिक दस्तावेजों में “मातृत्व अवकाश” से “देखभालकर्ता अवकाश” की ओर धीरे-धीरे परिवर्तन करना, ताकि राष्ट्रीय मानसिकता में “बाल देखभाल” को लैंगिकता से अलग किया जा सके।

निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय ने मातृत्व संरक्षण को अनुच्छेद-21 (जीवन का अधिकार) के अंतर्गत “मूलभूत मानव अधिकार” घोषित किया है। भारत को वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनने के लिए देखभाल को साझा सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में देखना होगा। माताओं को समर्थन और पिताओं की भागीदारी सुनिश्चित करके हम ऐसा कार्यस्थल निर्मित कर सकते हैं, जो समानता, गरिमा और आर्थिक तर्कसंगतता पर आधारित हो।

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