ब्रिक्स में वैज्ञानिक सहयोग

18 Mar 2026

संदर्भ

ब्रिक्स एक उभरता हुआ वैश्विक समूह है, जो बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देता है। इसमें विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार (STI) आर्थिक सहयोग के साथ एक प्रमुख स्तंभ के रूप में उभर रहे हैं।

संबंधित तथ्य 

  • समय के साथ, ब्रिक्स ने प्रारंभिक संयुक्त अनुसंधान पहलों (जो मूलभूत विज्ञान पर केंद्रित थीं) से आगे बढ़ते हुए अब नवाचार और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को प्राथमिकता देना शुरू किया है।

ब्रिक्स के बारे में

  • उद्गम: ‘BRIC’ शब्द वर्ष 2001 में ब्रिटिश अर्थशास्त्री जिम ओ’नील द्वारा गढ़ा गया था, जो ब्राजील, रूस, भारत और चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है।
  • उद्देश्य: वैश्विक शासन प्रणाली में सुधार करना तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी पश्चिम-प्रधान संस्थाओं के विकल्प प्रस्तुत करना।
  • प्रकृति: ब्रिक्स एक अनौपचारिक समन्वय तंत्र बना हुआ है, जिसमें अध्यक्षता सदस्य देशों के बीच प्रतिवर्ष क्रमिक रूप से परिवर्तित रहती है।
  • सहयोग के स्तंभ: ब्रिक्स की संदर्भ शर्तों के  अनुसार, इसकी साझेदारी तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित है:
    • राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग
    • आर्थिक और वित्तीय सहयोग
    • जन-से-जन (P2P) या नागरिक समाज सहयोग।
  • सदस्य देश
    • प्रारंभिक सदस्य (BRICS): ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका।
    • नए सदस्य (BRICS+): मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE)।
    • ब्रिक्स साझेदार देश: वर्ष 2024 के कजान शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स ने “ब्रिक्स पार्टनर कंट्रीज” नामक एक नई श्रेणी प्रस्तुत की।
      • बेलारूस, बोलीविया, कजाखस्तान, नाइजीरिया, मलेशिया, थाईलैंड, क्यूबा, वियतनाम, युगांडा, उज्बेकिस्तान।
    • सदस्यता और साझेदारी में रुचि: वर्ष 2024 के दौरान, 30 से अधिक देशों ने ब्रिक्स में सदस्य या साझेदार के रूप में शामिल होने में रुचि व्यक्त की।

विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार में ब्रिक्स सहयोग: एक अवलोकन

  • वर्ष 2011: ब्रिक्स में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सहयोग को वर्ष 2011 में औपचारिक मान्यता दी गई। इसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों तथा संबंधित मंत्रियों की बैठकों के माध्यम से इसे और सुदृढ़ किया गया।
  • वर्ष 2015: वर्ष 2015 के एक समझौता ज्ञापन के माध्यम से इसे एक मुख्य रणनीतिक स्तंभ के रूप में स्थापित किया गया, जिससे सहयोगात्मक अनुसंधान और क्षमता निर्माण के लिए आवश्यक संस्थागत ढाँचा विकसित हुआ।
    • इस ढाँचे ने सहयोग के दायरे को विस्तारित किया है, जिससे सदस्य देशों को साझा विकास चुनौतियों का समाधान करने और अत्याधुनिक विज्ञानों को आगे बढ़ाने के लिए अपनी पूरक शक्तियों का लाभ उठाने का अवसर मिला है।
  • वर्ष 2017-2020: नवाचार सहयोग के लिए पहली ब्रिक्स कार्य योजना (2017-2020) ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार और उद्यमिता साझेदारी (STIP) कार्य समूह को विभिन्न कार्यक्रमों को लागू करने का कार्य सौंपा।
  • वर्ष 2021–2024: इस कार्ययोजना का मुख्य ध्यान संपर्क-संवर्द्धन और विषयगत ढाँचे के निर्माण पर रहा। इसके बाद की योजनाओं में परियोजनाओं के विस्तार और प्रभाव बढ़ाने पर बल दिया गया, विशेष रूप से जैव प्रौद्योगिकी, जलवायु प्रौद्योगिकी, औद्योगिक नवाचार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्रों में।
  • वर्ष 2025 की कृत्रिम बुद्धिमत्ता घोषणा: वर्ष 2025 के कृत्रिम बुद्धिमत्ता घोषणा ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता को एक उप-विषय से बहुपक्षीय शासन के एक केंद्रीय स्तंभ के रूप में स्थापित किया।  
    • यह घोषणा कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन के लिए एक ऐसे दृष्टिकोण की रूपरेखा प्रस्तुत करती है, जो न्यायसंगत, समावेशी और विकासोन्मुखी है, और साझेदारी को प्रत्यक्ष आर्थिक तथा सामाजिक प्रासंगिकता वाले रणनीतिक सहयोग की ओर ले जाती है।
  • वर्ष 2026: भारत की वर्ष 2026 की अध्यक्षता में, ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता का निर्माण’ विषय के साथ, ब्रिक्स समूह अपने वैज्ञानिक साझेदारी को और गहरा करने की दिशा में अग्रसर है।
    • लक्ष्य: विस्तारित सदस्यता का लाभ उठाकर क्षमताओं को सुदृढ़ करना तथा डिजिटल असमानता, जन स्वास्थ्य संकट और जलवायु लचीलापन जैसी चुनौतियों का समाधान करना।

ब्रिक्स का संस्थागत ढाँचा

  • विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार मंत्रियों की बैठक: ब्रिक्स के विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार मंत्री वर्ष में एक बार बैठक करते हैं, जिसमें रणनीतिक दस्तावेजों को स्वीकृति और हस्ताक्षर प्रदान किए जाते हैं। प्रत्येक सदस्य देश में एक या दो प्रमुख एजेंसियाँ इन गतिविधियों का समन्वय करती हैं, प्रस्ताव आमंत्रित करती हैं तथा परियोजनाओं की सूची तैयार करती हैं, जिन्हें संबंधित देश की अध्यक्षता के दौरान अनुमोदित किया जाता है।
    • उदाहरण के लिए, भारत की अध्यक्षता के दौरान वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) और जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) प्रमुख एजेंसियों के रूप में कार्य करते हैं।
  • iBRICS: यह एक नेटवर्क है, जो ब्रिक्स देशों के बीच नवाचार, अनुसंधान सहयोग और ज्ञान आदान-प्रदान को बढ़ावा देता है।
  • ब्रिक्स प्रौद्योगिकी हस्तांतरण केंद्र (TTC): यह सीमापार प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण, नीतिगत ढाँचे और संस्थागत संपर्कों को सुदृढ़ करने में सहायक है।
  • ब्रिक्स भविष्य नेटवर्क संस्थान: यह उन्नत सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी तथा उच्च क्षमता संगणना के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास पर केंद्रित है।
    • साथ ही, यह ब्रिक्स देशों के बीच अगली पीढ़ी के संचार नेटवर्क में सहयोग को बढ़ावा देता है।
  • चीन-ब्रिक्स नवीन गुणवत्ता उत्पादक शक्तियों पर अनुसंधान केंद्र: इसका हाल ही में बीजिंग में उद्घाटन किया गया।
    • यह केंद्र शैक्षणिक आदान-प्रदान और प्रौद्योगिकी अनुसंधान के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में कार्य करता है।

चुनौतियाँ

  • कमजोर राष्ट्रीय नवाचार प्रणाली: ब्रिक्स देशों की राष्ट्रीय नवाचार प्रणालियाँ दक्षिण कोरिया जैसे देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कमजोर हैं। चीन को छोड़कर अधिकांश देशों में अनुसंधान एवं विकास व्यय कम है।
  • सदस्यों के भिन्न हित: नए सदस्यों की आर्थिक विकास और वैज्ञानिक क्षमता में विविधता के कारण उनके हितों में समन्वय स्थापित करना कठिन हो जाता है।
    • इस कारण BRICS+ को विशिष्ट देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग संबंध विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना पड़ सकता है।
  • स्थायी तंत्र का अभाव: विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सहयोग के प्रबंधन के लिए कोई स्थायी संस्थागत तंत्र उपलब्ध नहीं है। 
    • वर्तमान व्यवस्था, जिसमें नेतृत्व प्रतिवर्ष अध्यक्षता के साथ परिवर्तित रहता है, दीर्घकालिक आवश्यकताओं के लिए उपयुक्त नहीं है।
  • ढाँचे का अभाव: ब्रिक्स देशों के बीच विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सहयोग पर अनुसंधान सीमित है। मौजूदा तंत्र में नियमित अध्ययन और आँकड़ा-आधारित सुझाव प्रदान करने के लिए एक व्यवस्थित ढाँचे की कमी है।

ब्रिक्स में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार का महत्त्व

  • वैश्विक नेतृत्व में भूमिका: बढ़ते भू-राजनैतिक तनाव, तकनीकी राष्ट्रवाद और निर्यात नियंत्रण के बीच, ब्रिक्स समावेशी वैश्विक सहयोग को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • तकनीकी निर्भरता में कमी: ब्रिक्स+ की शुरुआत ने एक अधिक समावेशी वैश्विक दक्षिण मंच की दिशा में परिवर्तन को दर्शाया, जिसका उद्देश्य विकास सहयोग, राजनीतिक समन्वय को बढ़ाना और तकनीकी निर्भरता को कम करना है।
  • आत्मनिर्भरता को बढ़ावा: यह प्रौद्योगिकी आधारित आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करता है, जिससे पश्चिमी तकनीकों पर निर्भरता कम होती है, जैसे कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अर्द्धचालक अनुसंधान में सहयोग।

आगे की राह

  • यूरोपीय संघ से सीख: ब्रिक्स, यूरोपीय संघ के विविध विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार कार्यक्रमों से सीख ले सकता है, क्योंकि वर्तमान में इसके पास सीमित विकल्प और उच्च प्रतिस्पर्द्धा के बावजूद अपेक्षाकृत कम वित्तीय संसाधन हैं।
    • ब्रिक्स, यूरोपीय संघ के होराइजन कार्यक्रम की तर्ज पर एक केंद्रीय तंत्र विकसित कर सकता है, जिसमें एक सचिवालय स्थापित किया जाए, जो वित्त प्रबंधन, प्रस्ताव आमंत्रण, प्रगति की निगरानी और परिणामों का मूल्यांकन करे।
  • मेगा-विज्ञान परियोजनाओं की शुरुआत: कुछ दीर्घकालिक मेगा-विज्ञान परियोजनाओं का विकास, गहन सहयोग को बढ़ावा दे सकता है।
    • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (STI) सहयोग के ढाँचे का विस्तार अंततः विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परियोजनाओं के वित्तपोषण तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए; इसे STI के शासन और उभरती प्रौद्योगिकियों के BRICS+ देशों पर पड़ने वाले प्रभाव पर शोध को बढ़ावा देना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण एवं व्यावसायीकरण (TTC) को सुदृढ़ बनाना: अनुसंधान और बाजार अनुप्रयोगों के बीच अंतर को पाटने के लिए टीटीसी की भूमिका का विस्तार करना।
  • समावेशी ब्रिक्स+ सहयोग को बढ़ावा देना: ज्ञान साझाकरण, वित्तीय सहायता और संयुक्त अनुसंधान के माध्यम से नए सदस्यों की क्षमता का निर्माण करना।

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