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माउंटबेटन योजना के 79 वर्ष: कैसे 3 जून की घोषणा ने उपमहाद्वीप की सीमाओं को पुनर्परिभाषित किया

माउंटबेटन योजना के 79 वर्ष: कैसे 3 जून की घोषणा ने उपमहाद्वीप की सीमाओं को पुनर्परिभाषित किया 5 Jun 2026

संदर्भ:

79 वर्ष पूर्व प्रसारित 3 जून योजना (June 3 Plan) ने बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए ब्रिटिश भारत के विभाजन को स्वीकार किया। इस योजना के तहत सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेज करते हुए 15 अगस्त 1947 तक पूरा किया गया, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक और भौगोलिक स्वरूप को पुनर्परिभाषित कर दिया।

3 जून घोषणा (माउंटबेटन योजना) के बारे में

  • आदेश (The Mandate): मार्च 1947 में भारत आगमन पर लॉर्ड माउंटबेटन को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली द्वारा 30 जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया था। किंतु बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा और रक्तपात ने इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए बाध्य कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप सत्ता हस्तांतरण की समय-सीमा को काफी पहले कर दिया गया।
  • प्रमुख प्रस्ताव:
    • प्रांतों का विभाजन: पंजाब और बंगाल की विधानसभाएँ इस बात पर मतदान करेंगी कि उनके प्रांतों का विभाजन किया जाए या नहीं।
    • आत्मनिर्णय का अधिकार: सिंध की विधानसभा अपने भविष्य का निर्णय स्वयं करेगी, जबकि उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) और असम के सिलहट जिले के भविष्य का निर्धारण जनमत-संग्रह द्वारा किया जाएगा।
    • सीमा निर्धारण: यदि विभाजन को स्वीकृति मिलती है, तो एक सीमा आयोग दोनों देशों की सटीक सीमाएँ निर्धारित करेगा।
    • देशी रियासतें: 560 से अधिक देशी रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त कर दी जाएगी और उन्हें भारत या पाकिस्तान में से किसी एक में विलय करना होगा।

प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल इस योजना पर क्यों सहमत हुए?

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दृष्टिकोण
    • रक्तपात को रोकना: जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं का मानना था कि सत्ता का शीघ्र हस्तांतरण ही कलकत्ता और नोआखाली से लेकर पंजाब तक फैल रही भीषण सांप्रदायिक हिंसा और दंगों को रोकने का एकमात्र प्रभावी उपाय है।
    • मजबूत केंद्रीय सरकार: कांग्रेस एक ऐसे छोटे लेकिन एकजुट भारत को प्राथमिकता देती थी, जिसमें केंद्र सरकार मजबूत हो, बजाय एक ऐसे संयुक्त लेकिन कमजोर संघीय ढाँचे के, जहाँ मुस्लिम लीग शासन-प्रशासन को स्थायी रूप से बाधित या निष्क्रिय कर सकती थी।
    • प्लान बाल्कन” से बचाव: कांग्रेस ने माउंटबेटन की पूर्व वैकल्पिक योजना “प्लान बाल्कन” का कड़ा विरोध किया, क्योंकि उसमें प्रत्येक प्रांत को स्वतंत्र होने का विकल्प दिया गया था, जिससे भारत के पूर्ण विखंडन का खतरा उत्पन्न हो सकता था।
  • मुस्लिम लीग का दृष्टिकोण
    • राजनीतिक आत्मनिर्णय: मुहम्मद अली जिन्ना के लिए यह योजना पाकिस्तान के निर्माण की गारंटी थी, जो उनका प्रमुख राजनीतिक उद्देश्य था। उनका मानना था कि इससे मुसलमानों को हिंदू-बहुल भारत में संभावित राजनीतिक उपेक्षा और हाशियाकरण से सुरक्षा प्राप्त होगी।
    • अनिच्छापूर्वक स्वीकृति: मुहम्मद अली जिन्ना ने पंजाब और बंगाल के “खंडित” या “कटा-फटा” (Moth-eaten) विभाजन का तीव्र विरोध करने के बावजूद इस योजना को स्वीकार कर लिया। उनका मानना था कि समझौतों के साथ प्राप्त पाकिस्तान, पाकिस्तान न मिलने से बेहतर है।

विभाजन के दौरान प्रशासनिक विफलता और मानवीय संकट

  • सीमा संबंधी अनिश्चितता: घोषणा के बाद लाखों लोग गहरे भ्रम और असमंजस में थे। सरकार यह स्पष्ट करने में विफल रही कि सीमाएँ कहाँ निर्धारित होंगी, कौन-से जिले किस देश में जाएंगे और क्या लोगों को स्थानांतरित होना पड़ेगा।
  • नेतृत्व की दूरदर्शिता का अभाव: जब पत्रकारों ने माउंटबेटन से पूछा कि क्या विभाजन से बड़े पैमाने पर जनसंख्या का स्थानांतरण होगा, तो उन्होंने अल्पदृष्टिपूर्ण उत्तर दिया— व्यक्तिगत रूप से मुझे ऐसा नहीं लगता।”
  • बहुआयामी मानवीय त्रासदी: मानवीय लागत और उसके गंभीर परिणामों का पूर्वानुमान लगाने में संस्थागत विफलता के कारण मानव इतिहास के सबसे भीषण सामूहिक पलायनों में से एक घटित हुआ। जिसने धार्मिक आधार पर जुड़े समुदायों को बिखेर दिया।

विभाजन संकट का “तीन C” (Three Cs) ढाँचा

  • संज्ञान (Cognisance): औपनिवेशिक शासन भौगोलिक विस्थापन से जुड़ी गहरी मनोवैज्ञानिक एवं शारीरिक पीड़ा को समझने और उसका संज्ञान लेने में विफल रहा। उसने विभाजन को केवल एक प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था के रूप में देखा।
  • गणना: सीमावर्ती जिलों में अल्पसंख्यक आबादी की सटीक गणना और मानचित्रण जल्दबाजी में किया गया तथा इसके परिणामों को स्वतंत्रता प्राप्ति तक गोपनीय रखा गया। इससे लोगों के बीच अनिश्चितता, भय और अफवाहें बढ़ीं।
  • वर्गीकरण: क्षेत्रों को जल्दबाजी और कठोरता के साथ “भारत” अथवा “पाकिस्तान” की श्रेणियों में विभाजित कर दिया गया। इस प्रक्रिया में सदियों से विकसित साझा सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक तंत्रों की उपेक्षा की गई, जिसके परिणामस्वरूप पड़ोसी समुदाय रातोंरात ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी बन गए।

निष्कर्ष

3 जून योजना किसी विजयी समाधान से अधिक राजनीतिक थकान और अराजकता को नियंत्रित करने की विवशता से उत्पन्न एक उच्चस्तरीय समझौता थी। यद्यपि इसने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का अंत करने में सफलता प्राप्त की, लेकिन आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में इसकी संरचनात्मक विफलता ने दो स्वतंत्र राष्ट्रों के जन्म को एक विशाल मानवीय त्रासदी में बदल दिया।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: उन कारकों का मूल्यांकन कीजिए जिन्होंने माउंटबेटन को यह विश्वास दिलाया कि भारत के विभाजन के अतिरिक्त कोई अन्य व्यावहारिक समाधान संभव नहीं था।

 (15 अंक, 250 शब्द)

माउंटबेटन योजना के 79 वर्ष: कैसे 3 जून की घोषणा ने उपमहाद्वीप की सीमाओं को पुनर्परिभाषित किया

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