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नया मूल्य सूचकांक क्यों महत्वपूर्ण है?

नया मूल्य सूचकांक क्यों महत्वपूर्ण है? 6 Jun 2026

संदर्भ:

सरकार ने 15 जून से प्रारंभ होने वाली पाँच वर्षीय संक्रमण योजना की घोषणा की है, जिसके तहत थोक मूल्य सूचकांक (WPI) को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) को अपनाया जाएगा। यह बदलाव भारत में उत्पादक-स्तर की मुद्रास्फीति को मापने की प्रणाली में एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार का प्रतीक है।

उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) क्या है?

  • परिभाषा: PPI (उत्पादक मूल्य सूचकांक) आर्थिक गतिविधियों के प्रारंभिक चरण में उत्पादकों के दृष्टिकोण से कीमतों में होने वाले परिवर्तनों को मापता है। यह उन कीमतों का आकलन करता है जो उत्पादकों को अपने उत्पादों (आउटपुट) के लिए प्राप्त होती हैं तथा उन लागतों का भी, जो वे उत्पादन हेतु आवश्यक इनपुट्स (कच्चा माल, सेवाएँ आदि) खरीदने के लिए चुकाते हैं।

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  • द्वि-सूचकांक (Dual-Index) तंत्र
    • आउटपुट PPI (Output PPI): यह उत्पादकों द्वारा अपने उत्पादों के लिए प्राप्त मूल कीमतों पर आधारित होता है। इसमें निवल कर, व्यापारिक मार्जिन तथा परिवहन मार्जिन को शामिल नहीं किया जाता।
    • इनपुट PPI (Input PPI): यह क्रेताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों पर आधारित होता है तथा उन वास्तविक लागतों को दर्शाता है (मार्जिन और करों सहित) जो उत्पादकों को उत्पादन हेतु आवश्यक इनपुट्स खरीदने के लिए चुकानी पड़ती हैं।
  • वैश्विक अनुरूपता: अधिकांश देशों ने पहले ही उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) को अपना लिया है, क्योंकि यह राष्ट्रीय लेखा प्रणाली (SNA) के अनुरूप है, जो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की गणना के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानक ढाँचा है।

संरचनात्मक अंतर: WPI बनाम PPI

  • कवरेज का विस्तार: WPI (थोक मूल्य सूचकांक) केवल वस्तुओं की कीमतों को मापता है, जबकि PPI (उत्पादक मूल्य सूचकांक) में वस्तुओं और सेवाओं दोनों को शामिल किया जाता है। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि सेवा क्षेत्र भारत के GDP में 55% से अधिक योगदान देता है तथा देश के लगभग 30% कार्यबल को रोजगार प्रदान करता है।
  • सूक्ष्म एवं विस्तृत डेटा: WPI व्यापक क्षेत्रीय सकल मूल्य अनुमानों पर आधारित होता है, जबकि आउटपुट PPI अधिक सूक्ष्म, विस्तृत और अद्यतन राष्ट्रीय लेखा आपूर्ति तालिकाओं का उपयोग करता है, जिससे मूल्य परिवर्तनों का अधिक सटीक आकलन संभव हो पाता है।
  • दोहरी गणना की समाप्ति: WPI में एक तकनीकी समस्या थी, जिसमें मध्यवर्ती वस्तुओं को उत्पादन की विभिन्न अवस्थाओं में कई बार गिना जाता था, जिससे आँकड़ों में विकृति उत्पन्न होती थी। PPI इनपुट और आउटपुट शृंखलाओं को अलग-अलग मापकर इस समस्या का समाधान करता है और दोहरी गणना को समाप्त करता है।
  • अद्यतन वस्तु-टोकरी : वस्तुओं की टोकरी (Commodity Basket) का विस्तार 697 से बढ़ाकर 957 वस्तुओं तक किया जा रहा है, जिसमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा तथा परमाणु ऊर्जा जैसे आधुनिक और उभरते क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है।

आर्थिक एवं नीतिगत महत्व

  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: इनपुट PPI ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल (दवा) और निर्माण जैसे क्षेत्रों में लागत वृद्धि के संकेत खुदरा मूल्य सूचकांक (CPI) में दिखाई देने से कई सप्ताह पहले ही दे देता है। इससे व्यवसायों को जोखिमों के विरुद्ध सुरक्षा करने तथा अपने लाभ मार्जिन को समयानुसार समायोजित करने का अवसर मिलता है।
  • उपभोक्ता मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान: जब इनपुट PPI बढ़ रहा हो, लेकिन आउटपुट PPI स्थिर बना रहे, तो यह संकेत देता है कि उद्योग या कारखाने बढ़ी हुई लागत को अस्थायी रूप से स्वयं वहन कर रहे हैं। ऐसी स्थिति भविष्य में इस लागत के उपभोक्ताओं पर स्थानांतरित होने की संभावना को दर्शाती है, जिससे उपभोक्ता मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।
  • मौद्रिक नीति के समायोजन: सेवा क्षेत्र की मुद्रास्फीति को शामिल करने तथा दोहरी गणना से उत्पन्न विकृतियों को समाप्त करने के कारण PPI, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को मुद्रास्फीति का अधिक सटीक संकेतक प्रदान करता है। इससे RBI को ब्याज दरों के निर्धारण और मौद्रिक नीति के प्रभावी समायोजन में बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिलती है।
  • अनुबंधीय सुगमता: दीर्घकालिक अवसंरचना और आपूर्ति अनुबंधों में प्रायः WPI-आधारित मूल्य-वृद्धि प्रावधान शामिल होते हैं। इन अनुबंधों में किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न हो, इसके लिए सरकार पाँच वर्षीय संक्रमण अवधि के दौरान PPI के साथ-साथ संशोधित WPI का भी समानांतर प्रकाशन करेगी। इससे पुराने अनुबंधों को नए मूल्य सूचकांक ढाँचे के अनुरूप समायोजित करने में सुविधा होगी।

कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ

  • डेटा असमानता: सेवा क्षेत्र से संबंधित PPI घटक प्रारंभिक चरण में मासिक के बजाय त्रैमासिक आधार पर जारी किया जाएगा। इसके परिणामस्वरूप वस्तुओं के मासिक सूचकांक की तुलना में वास्तविक समय डेटा में विलंब उत्पन्न होगा, जिससे सेवा क्षेत्र की मूल्य प्रवृत्तियों का त्वरित आकलन करना अपेक्षाकृत कठिन हो सकता है।
  • डेटा संग्रहण संबंधी बाधाएँ: भारत जैसी विशाल, विविधतापूर्ण और बड़े पैमाने पर असंगठित घरेलू अर्थव्यवस्था से विश्वसनीय, समय पर तथा उच्च-गुणवत्ता वाला मूल्य डेटा प्राप्त करना अब भी एक प्रमुख परिचालन चुनौती बना हुआ है।

आगे की राह 

  • आवृत्ति का समन्वय: नीति-निर्माताओं को सेवा क्षेत्र के त्रैमासिक सूचकांक को शीघ्र ही मासिक रिपोर्टिंग प्रणाली में बदलना चाहिए ताकि इसकी वास्तविक समय उपयोगिता सुनिश्चित हो सके।
  • डेटा अवसंरचना को सुदृढ़ करना: विनिर्माण एवं सेवा केंद्रों में डिजिटल रिपोर्टिंग तंत्र को मजबूत किया जाए ताकि मूल्य डेटा संग्रहण की विश्वसनीयता बनी रहे।
  • अनुबंधों का पुनर्समझौता: कॉरपोरेट संस्थाओं और सार्वजनिक निकायों को पाँच वर्षीय संक्रमण अवधि का उपयोग करते हुए पुराने WPI-आधारित मुद्रास्फीति समायोजन प्रावधानों को PPI-आधारित प्रावधानों से प्रतिस्थापित करना चाहिए।

निष्कर्ष

PPI की ओर यह बदलाव भारत की सांख्यिकीय प्रणाली की एक दीर्घकालिक कमी को दूर करता है, क्योंकि अब देश के प्रमुख सेवा क्षेत्र को भी उत्पादन-स्तर की मुद्रास्फीति मापन प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा। मुद्रास्फीति को उसके स्रोत स्तर पर मापने से यह सुनिश्चित होगा कि नीतिगत निर्णय आधुनिक भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं के अनुरूप हों।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: थोक मूल्य सूचकांक (WPI) से उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) की ओर संक्रमण भारत द्वारा अपने व्यापक आर्थिक संकेतकों को मापने की पद्धति में एक मौलिक पुनर्विचार को दर्शाता है। दोनों सूचकांकों के बीच संरचनात्मक अंतरों की चर्चा कीजिए तथा मूल्यांकन कीजिए कि PPI किस प्रकार मौद्रिक नीति निर्माण को अधिक प्रभावी बनाएगा।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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