संदर्भ
हाल ही में NVS-02 और PSLV की विफलताओं ने केवल तकनीकी त्रुटियों पर ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित वैज्ञानिक संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी बहस को जन्म दिया है।
NVS-02 विफलता की तकनीकी पृष्ठभूमि
- प्रक्षेपण संदर्भ: NVS-02 को GSLV द्वारा प्रक्षेपित किया गया, लेकिन यह निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुँच सका।
- मूल कारण: मुख्य त्रुटि ऑक्सीडाइज़र वाल्व नियंत्रण परिपथ में एक विद्युत कनेक्टर से जुड़ी थी, जिसने कमांड सिग्नल को बाधित किया और ऑक्सीडाइज़र वाल्व को खुलने से रोक दिया।
- रिडंडेंसी संबंधी विफलता: प्राथमिक और बैकअप दोनों लाइनों में भी विफलता देखी गई। यह रिडंडेंसी संरचना में एक गंभीर चूक को दर्शाता है, क्योंकि बैकअप प्रणाली ने अपेक्षित फेल-सेफ (Fail-Safe) सुरक्षा प्रदान नहीं की।
- परिणाम: उपग्रह निर्धारित कक्षा प्राप्त नहीं कर सका, जिसके परिणामस्वरूप मिशन आंशिक रूप से विफल रहा।
पारदर्शिता संबंधी चिंताएँ
- सीमित जानकारी का प्रकटीकरण: विफलता के बाद लगभग एक वर्ष तक इसरो मौन रहा।
- केवल एक संक्षिप्त प्रेस बयान जारी किया गया। विस्तृत विफलता विश्लेषण सार्वजनिक नहीं किया गया।
- किसी भी व्यक्ति या संस्थागत जिम्मेदारी को औपचारिक रूप से निर्दिष्ट नहीं किया गया।
- एक स्पष्ट और समयबद्ध प्रणालीगत सुधार योजना सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं की गई।
- धारणा संबंधी समस्या: इस प्रतिक्रिया को सक्रिय पारदर्शिता के बजाय “दबाव में जानकारी उजागर करना” के रूप में देखा गया।
- जाँच की शुरुआत: विफलता के तकनीकी कारणों की जाँच के लिए एक समिति गठित की गई।
- सुधारात्मक उपाय: प्राप्त ज्ञान को कथित रूप से बाद के मिशनों में लागू किया गया, और LVM-3 M5 (नवम्बर 2025) ने सफलतापूर्वक GSAT-7R को कक्षा में स्थापित किया।
इन समस्याओं के चिंताजनक होने के कारण
- विश्वसनीयता का प्रश्न: PSLV, जो इसरो का सबसे विश्वसनीय प्रक्षेपण यान माना जाता है, ने विफलता का सामना किया।
- प्रणालीगत संकेत: लगातार विफलताएँ संभावित संरचनात्मक समस्याओं की ओर संकेत करती हैं।
- संभावित कमियाँ: गुणवत्ता नियंत्रण में चूक, विनिर्माण प्रक्रिया की कमजोरियाँ और निगरानी संबंधी कमियाँ।
- संस्थागत प्रतिक्रिया: प्रणालीगत चिंताओं की जाँच के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति गठित की गई।
ऐतिहासिक तुलना: 1979 बनाम 2025
- SLV-3 विफलता (1979): सतीश धवन ने व्यक्तिगत रूप से प्रेस को संबोधित किया और इसरो की ओर से पूर्ण जिम्मेदारी ली।
- विस्तृत विफलता विश्लेषण सार्वजनिक किया गया, जिससे वैज्ञानिक पारदर्शिता और नेतृत्व की जवाबदेही की परंपरा स्थापित हुई।
- NVS-02 विफलता (2025): जानकारी लंबे अंतराल के बाद जारी की गई और कोई व्यापक सार्वजनिक विफलता रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई।
सार्वजनिक संस्थानों में पारदर्शिता का महत्व
- लोकतांत्रिक जवाबदेही: करदाताओं द्वारा वित्तपोषित संस्था होने के नाते, इसरो नागरिकों के प्रति जवाबदेह है। पारदर्शिता सार्वजनिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत को सुदृढ़ करती है।
- विश्वास की पूँजी का निर्माण: पारदर्शिता दीर्घकालिक संस्थागत वैधता और जनविश्वास को मजबूत करता है।
- प्रणालीगत सुधार के लिए उत्प्रेरक: विफलताओं को पारदर्शी रूप से स्वीकार करने से संरचनात्मक सुधार संभव होते हैं और पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है।
- वैश्विक विश्वसनीयता में वृद्धि: पारदर्शिता भारत की जिम्मेदार और परिपक्व अंतरिक्ष शक्ति के रूप में प्रतिष्ठा को मजबूत करता है।
- संवैधानिक शासन की भावना: लोकतांत्रिक प्रणालियों में यह आवश्यक है कि सभी राज्य संस्थाएँ पारदर्शिता, जिम्मेदारी और नैतिक ईमानदारी के साथ कार्य करें।
निष्कर्ष
यद्यपि गोपनीय या संवेदनशील जानकारी सुरक्षित रखी जानी चाहिए, लेकिन इसरो को निवेशकों, जनता और सरकार के बीच विश्वास बनाने के लिए बुनियादी तकनीकी विवरण और जवाबदेही संबंधी उपाय साझा करना चाहिए।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: वैज्ञानिक संस्थाओं में सार्वजनिक विश्वास केवल तकनीकी सफलता पर ही नहीं बल्कि संस्थागत पारदर्शिता पर भी निर्भर करता है। आलोचनात्मक रूप से विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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