भारत में न्यायिक भ्रष्टाचार

भारत में न्यायिक भ्रष्टाचार 27 Feb 2026

संदर्भ

कक्षा 8 की नई NCERT सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायिक भ्रष्टाचार, मामलों के लंबित रहने (केस बैकलॉग) और न्याय तक पहुँच में बाधाओं का स्पष्ट उल्लेख किए जाने से विवाद उत्पन्न हुआ।

  • विवाद और आलोचना के बाद, NCERT द्वारा माफी मांगी गई और कथित रूप से पुस्तकों को वापस ले लिया गया, जिससे पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और नागरिक शिक्षा पर व्यापक बहस छिड़ गई।

न्यायिक भ्रष्टाचार की प्रकृति और विस्तार

  • गहराई से जड़ जमाई समस्या: कार्यपालिका में होने वाले भ्रष्टाचार के विपरीत, न्यायिक भ्रष्टाचार गहराई से जड़ जमाए हुए है और अक्सर जनता की नजरों से छिपा रहता है।
  • भ्रष्टाचार के प्रकार: यह केवल धन संबंधी रिश्वत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शामिल हैं:
    • भाई-भतीजावाद (Nepotism): परिचित व्यक्तियों को अनुचित लाभ देना और पदोन्नति करना।
    • शक्ति का दुरुपयोग: व्यक्तिगत लाभ के लिए न्यायिक अधिकार का उपयोग।
    • हितों का टकराव: ऐसे मामलों की सुनवाई करना जिनमें न्यायाधीश की व्यक्तिगत रुचि या हित जुड़े हों।
    • जन धारणा: वर्ष 2007 की ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, 77% भारतीयों ने न्यायपालिका को भ्रष्ट माना।
  • असंगत संपत्ति के प्रमाण: विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, यशवंत वर्मा मामले (दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश) में उनके आधिकारिक निवास पर आग लगने के बाद करोड़ों रुपये नकद बरामद होने की खबर सामने आई, जो न्यायिक वेतन के अनुरूप नहीं थी।

जवाबदेही में विद्यमान बाधाएँ

  • अदालत की अवमानना (Contempt of Court): यह प्रावधान ऐसा भय उत्पन्न करता है जिससे जनता और मीडिया न्यायाधीशों पर प्रश्न उठाने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें जुर्माना या कारावास संबंधी जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।
  • महाभियोग की कठिन प्रक्रिया: अनुच्छेद 124(4) और न्यायाधीश जांच नियम (1968) के तहत, किसी न्यायाधीश को हटाना लगभग असंभव है।
    • इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए 100 लोकसभा सांसदों या 50 राज्यसभा सांसदों के हस्ताक्षरों की आवश्यकता होती है।
    • अंतिम निर्णय योग्यता के बजाय राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।
    • उदाहरण: वर्ष 1993 में न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव भ्रष्टाचार के सिद्ध आरोपों के बावजूद विफल रहा, क्योंकि सत्तारूढ़ दल ने उनके खिलाफ मतदान करने से इनकार कर दिया।

आंतरिक तंत्र की विफलता

  • अकार्यशील प्रणाली: न्यायाधीशों द्वारा अपने सहकर्मियों की जाँच के लिए बनाई गई आंतरिक व्यवस्था व्यवहार में लगभग निष्क्रिय है।
  • शिकायतों के आँकड़े: हाल ही में विधि मंत्रालय ने संसद को बताया कि पिछले 10 वर्षों में भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय में न्यायाधीशों के विरुद्ध 8,630 शिकायतें दर्ज की गईं।
  • कार्रवाई का अभाव: गंभीर आरोपों के बावजूद जाँच लगभग कभी नहीं होती और प्रायः फाइलें बिना जाँच के दबा दी जाती हैं।

आगे की राह

  • राष्ट्रीय न्यायिक आयोग (NJC): संवैधानिक समर्थन वाला एक राष्ट्रीय न्यायिक आयोग स्थापित किया जाना चाहिए, जो न्यायिक नियुक्तियों की निगरानी करे और जवाबदेही सुनिश्चित करे, साथ ही राजनीतिक प्रभाव से स्वतंत्र हो।
  • अनिवार्य संपत्ति प्रकटीकरण: सभी न्यायाधीशों को पारदर्शिता बढ़ाने के लिए अपनी संपत्ति का वार्षिक सार्वजनिक घोषणा-पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य होना चाहिए।
  • अवमानना कानून में सुधार: यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि अवमानना संबंधी प्रावधानों का दुरुपयोग न्यायिक कदाचार को वैध जाँच से बचाने के लिए न किया जाए।
  • पारदर्शी कॉलेजियम नियुक्तियाँ: न्यायाधीशों के चयन के लिए स्पष्ट और सार्वजनिक रूप से घोषित मानदंड लागू किए जाने चाहिए, ताकि विश्वसनीयता को बढ़ावा मिले।
  • स्वतंत्र शिकायत निवारण तंत्र: नागरिकों के लिए न्यायाधीशों के विरुद्ध शिकायत दर्ज करने और उनकी स्थिति ट्रैक करने हेतु एक अलग संस्थागत व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

पारदर्शिता और विश्वसनीय निगरानी के माध्यम से न्यायिक जवाबदेही को सुदृढ़ करना आवश्यक है, ताकि स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित रहे। केवल पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों के पालन से ही न्यायपालिका में जनता का विश्वास कायम रह सकता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारत में न्यायिक स्वतंत्रता का संवैधानिक महत्व क्या है, इसका विश्लेषण कीजिए। क्या न्यायपालिका की शैक्षिक आलोचना संस्थागत संवेदनशीलताओं के अधीन होनी चाहिए?

 (15 अंक, 250 शब्द)

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