संदर्भ:
वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनने की भारत की महत्त्वाकांक्षा के बावजूद, महिला कार्य सहभागिता दर वैश्विक स्तर पर अभी भी सबसे कम बनी हुई है। उच्च आर्थिक विकास को बनाए रखने, उत्पादकता बढ़ाने और समावेशी विकास हासिल करने के लिए महिलाओं के रोजगार परिदृश्य में सुधार की आवश्यक है।
अध्ययन संबंधी प्रमुख निष्कर्ष:
- उच्च आर्थिक विकास दर : महिला कार्य सहभागिता दर (WPR) में वृद्धि से श्रम बल का विस्तार होता है, घरेलू आय में वृद्धि होती है, उपभोग को प्रोत्साहन मिलता है और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की तीव्र वृद्धि में योगदान मिलता है।
- मानव पूँजी विकास: उच्च महिला रोजगार से बच्चों के पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल के परिणामों में सुधार होता है, जिससे दीर्घकालिक मानव पूँजी सुदृढ़ होती है।
- अधिक उत्पादकता: लैंगिक रूप से विविधतापूर्ण कार्यस्थल उच्च नवाचार, दक्षता और प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रोत्साहन देते हैं, जिससे समग्र उत्पादकता में सुधार होता है।
भारत में महिला रोजगार की वर्तमान स्थिति:
- कम कार्य सहभागिता: भारत की महिला कार्य सहभागिता दर (WPR) 30% से नीचे बनी हुई है, जो विश्व में सबसे कम दरों में से एक है।
- युवा महिलाओं में उच्च बेरोजगारी: शैक्षिक प्राप्ति में सुधार के बावजूद शिक्षित युवा महिलाओं को असंगत रूप से उच्च बेरोजगारी दरों का सामना करना पड़ रहा है।
- रोजगार, शिक्षा अथवा प्रशिक्षण से बाहर (नीट) युवा महिलाओं की संख्या में वृद्धि: विगत दशक के दौरान 15-29 वर्ष के आयु वर्ग की उन युवा महिलाओं की संख्या में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है, जो न तो किसी सवैतनिक रोजगार या आर्थिक गतिविधि में संलग्न हैं और न ही किसी औपचारिक शिक्षा अथवा कौशल विकास प्रशिक्षण का हिस्सा ही हैं।
निम्न महिला कार्य सहभागिता के कारण:
- कृषि रोजगार में गिरावट: मशीनीकरण और संरचनात्मक परिवर्तन ने कृषि में महिला श्रम बल की माँग को सीमित कर दिया है, जिससे कई महिलाएँ कार्यबल से बाहर हो गई हैं।
- संकट-प्रेरित रोजगार: कोविड-19 महामारी और गैर-कृषि रोजगार में मंदी ने कई महिलाओं को अवैतनिक पारिवारिक श्रम के रूप में निर्वाह कृषि की ओर वापस धकेल दिया।
- रोजगारविहीन संरचनात्मक परिवर्तन: हालिया आर्थिक विकास पूँजी-गहन क्षेत्रों में केंद्रित रहा है, जो महिलाओं के लिए अपेक्षाकृत कम रोजगार के अवसर सृजित करते हैं।
- कमजोर श्रम-गहन विनिर्माण: कपड़ा, परिधान, खाद्य प्रसंस्करण और लघु उद्योग जैसे क्षेत्रों में रोजगार अपर्याप्त रहा है, जो पारंपरिक रूप से बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार प्रदान करते हैं।
- लैंगिक मानदंड और गतिशीलता संबंधी बाधाएँ: सामाजिक मानदंड, सुरक्षा चिंताएँ और सीमित गतिशीलता (आवागमन की क्षमता) श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी को प्रतिबंधित करती हैं।
- क्षेत्रीय असमानताएँ: विभिन्न राज्यों में महत्त्वपूर्ण अंतर विद्यमान हैं, जहाँ दक्षिणी राज्य, विशेष रूप से तमिलनाडु, कई हिंदी-बेल्ट राज्यों की तुलना में बहुत बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।
तमिलनाडु मॉडल:
- सुदृढ़ विनिर्माण आधार: कपड़ा, परिधान, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और फुटवियर जैसे उद्योग महिलाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार उत्पन्न करते हैं।
- बेहतर मानव विकास: उच्च महिला साक्षरता, बेहतर स्वास्थ्य देखभाल, बेहतर सार्वजनिक शिक्षा और उन्नत गतिशीलता अधिक महिला श्रम बल भागीदारी का समर्थन करती हैं।
- सहायक बुनियादी ढाँचा: हॉस्टलों की उपलब्धता, परिवहन सुविधाएँ और सुरक्षित कार्यस्थलों ने महिलाओं को कार्यबल में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया है।
उच्च महिला रोजगार का महत्त्व:
- समावेशी आर्थिक विकास: महिलाओं की अधिक भागीदारी उत्पादक कार्यबल का विस्तार करती है और आर्थिक विकास को गति प्रदान करती है।
- जनसांख्यिकीय लाभांश: महिलाओं का उत्पादक रोजगार भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का पूर्ण उपयोग करने में सक्षम बनाता.है।
- गरीबी उन्मूलन: अतिरिक्त घरेलू आय वित्तीय सुरक्षा को सुदृढ़ करती है और गरीबी को कम करती है।
- महिला सशक्तिकरण: रोजगार महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता, निर्णय लेने की शक्ति और सामाजिक स्थिति को बढ़ाता है।
- सतत विकास: अधिक लैंगिक समानता सतत विकास लक्ष्यों (SDGs), विशेष रूप से SDG 5 (लैंगिक समानता) और SDG 8 (सम्मानजनक कार्य और आर्थिक वृद्धि) को प्राप्त करने में योगदान देती है।
संवैधानिक और नीतिगत ढाँचा:
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 14, 15, 16, 39(a), 39(d), 42, और 51A(e) लैंगिक समानता, समान अवसर, समान कार्य के लिए समान वेतन, और न्यायसंगत एवं मानवीय कार्य दशाओं को प्रोत्साहन देते हैं।
- सरकारी पहलें: स्किल इंडिया मिशन, पीएम मुद्रा योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM), स्टैंड-अप इंडिया, पीएम विश्वकर्मा, मिशन शक्ति और उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना का उद्देश्य रोजगार के अवसरों और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी में सुधार करना है।
प्रमुख चुनौतियाँ:
- निम्न महिला श्रम बल भागीदारी: सवैतनिक (पेड) रोजगार में महिलाओं की भागीदारी वैश्विक औसत से अत्यधिक नीचे बनी हुई है।
- सीमित गुणवत्तापूर्ण रोजगार: महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में या अवैतनिक पारिवारिक श्रमिकों के रूप में कार्य कर रहा है।
- कौशल असंगति (स्किल मिसमैच): शिक्षा और कौशल विकास प्रायः उद्योग की आवश्यकताओं और माँगों के अनुरूप नहीं होते हैं।
- अपर्याप्त देखभाल अवसंरचना : बाल देखभाल (चाइल्डकेयर) सुविधाओं की सीमित उपलब्धता महिलाओं के अवैतनिक देखभाल के बोझ में वृद्धि करती है।
- असुरक्षित कार्य वातावरण: कार्यस्थल की सुरक्षा, परिवहन और उत्पीड़न से संबंधित चिंताएँ श्रम बल की भागीदारी को हतोत्साहित करती हैं।
- क्षेत्रीय असमानताएँ : महिला रोजगार के परिणामों में दक्षिणी और उत्तरी राज्यों के मध्य व्यापक स्तर पर विषमताएँ विद्यमान हैं।
आगे की राह:
- श्रम-गहन विनिर्माण को प्रोत्साहन प्रदान करना : कपड़ा, परिधान, खाद्य प्रसंस्करण, फुटवियर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में रोजगार का विस्तार करना।
- मानव पूँजी को सुदृढ़ करना: विशेष रूप से लड़कियों और महिलाओं के लिए सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, पोषण और कौशल विकास में सुधार करना।
- देखभाल अर्थव्यवस्था में निवेश: महिलाओं पर अवैतनिक देखभाल कार्य की जिम्मेदारियों को कम करने के लिए क्रेच, बाल देखभाल सेवाओं तथा अन्य देखभाल अवसंरचना तक पहुँच का विस्तार किए जाने की आवश्यकता है।
- कार्यस्थल की सुरक्षा व्यवस्था का सुदृढीकरण : सुरक्षित परिवहन, छात्रावास सुविधाओं और कार्यस्थल सुरक्षा वेवस्था के प्रभावी कार्यान्वयन को सुदृढ़ करना।
- महिला उद्यमिता को सहायता: ऋण, बाजारों, डिजिटल प्लेटफॉर्मों और व्यवसाय विकास सेवाओं तक महिलाओं की पहुँच में सुधार करना।
- सर्वोत्तम प्रथाओं को दोहराना: अन्य राज्यों को तमिलनाडु और अन्य उच्च प्रदर्शन करने वाले राज्यों द्वारा लागू की गई सफल नीतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना।
निष्कर्ष:
विकसित भारत के दृष्टिकोण को प्राप्त करने के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार, शिक्षा, कौशल और सुरक्षित कार्यस्थलों तक व्यापक पहुँच के माध्यम से महिलाओं की उत्पादक क्षमता का उपयोग करना आवश्यक है। महिला कार्य सहभागिता में निरंतर सुधार न केवल समावेशी विकास के लिए बल्कि भारत की दीर्घकालिक आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता और सामाजिक विकास को सुदृढ़ करने के लिए भी आवश्यक है।
UPSC मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न (UPSC CSE Mains 2023, GS-I):
भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण की प्रक्रिया में कार्यबल में उनकी भागीदारी की भूमिका का परीक्षण कीजिए। महिला श्रम बल भागीदारी को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों का भी विश्लेषण कीजिए। (15 अंक)
UPSC प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न (UPSC Prelims 2019):
भारत के संविधान के राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
1. राज्य पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधन सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।
2. राज्य पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से संविधान के अनुच्छेद 39 के अंतर्गत राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों में सम्मिलित है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (c) 1 और 2 दोनों |