संदर्भ:
नीति आयोग की एक रिपोर्ट, जिसका शीर्षक “भारत में खेल उपकरण विनिर्माण बाजार की निर्यात क्षमता का एहसास” (Realising the Export Potential of the Sports Equipment Manufacturing Market in India) है, इस बात पर प्रकाश डालती है कि भारत का खेल सामान विनिर्माण क्षेत्र $50 बिलियन के वैश्विक खेल उपकरण बाजार में केवल 0.5% का योगदान देता है।
भारतीय खेल सफलता का विरोधाभास:
- वैश्विक मान्यता: नीरज चोपड़ा (भाला फेंक) और लक्ष्य सेन (बैडमिंटन) जैसे एथलीटों ने भारत को वैश्विक खेल मानचित्र पर खड़ा किया है, जो क्रिकेट से परे उत्कृष्टता को दर्शाता है।
- मुख्य मुद्दा: इन उपलब्धियों के बावजूद, एथलीटों द्वारा उपयोग किए जाने वाले अधिकांश उच्च-प्रदर्शन उपकरण, जैसे- पेशेवर भाले और विशेष खेल के जूते, अधिकांश मात्रा में आयात किए जाते हैं, न कि भारत में निर्मित।
- क्षेत्र की प्रकृति: खेल विनिर्माण एक अत्यधिक श्रम-प्रधान क्षेत्र है, जो घरेलू उत्पादन मजबूत होने पर रोजगार सृजन और औद्योगिक विकास की प्रचुर संभावनाएँ प्रदान करता है।
घरेलू क्लस्टर और MSME की विरासत:
- भौगोलिक एकाग्रता: भारत के लगभग 80% खेल उपकरणों का उत्पादन जालंधर और मेरठ जैसे शहरों में केंद्रित है, जो इस क्षेत्र के मुख्य विनिर्माण केंद्र हैं।
- MSME की भूमिका: इन क्लस्टरों में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) ने हाथ से सिले हुए गेंद और क्रिकेट गियर जैसे सामानों का उत्पादन करके, भारत की विनिर्माण विरासत को बनाए रखा है।
- तकनीकी अंतराल: पारंपरिक शिल्प कौशल को संरक्षित करने के बावजूद, कई इकाइयों के पास आधुनिक तकनीक और नवाचार तक सीमित पहुँच है, जो उन्हें वैश्विक स्तर पर विस्तार करने और प्रतिस्पर्धा से रोकती है।
लागत प्रतिस्पर्धात्मकता का अंतर:
- लागत हानि: क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों की तुलना में भारतीय खेल उपकरण निर्माताओं को उच्च उत्पादन लागत का सामना करना पड़ता है, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धा कम हो जाती है।
- भारत: औसत उत्पादन लागत लगभग ₹100 प्रति इकाई है।
- चीन: बड़े पैमाने पर विनिर्माण और एकीकृत आपूर्ति शृंखलाओं का लाभ उठाते हुए, लगभग ₹85 में समान वस्तुओं का उत्पादन करता है।
- पाकिस्तान: लगभग ₹87 की उत्पादन लागत, जो कम श्रम लागत और सियालकोट जैसे विशेष क्लस्टरों द्वारा समर्थित है।
- भारत में उच्च लागत के कारण: महंगे कच्चे माल, कमजोर लॉजिस्टिक्स बुनियादी ढाँचा, खंडित आपूर्ति शृंखला और पैमाने की मितव्ययिता का अभाव।
कच्चे माल और आयात की बाधाएँ:
- विशेष आवश्यकताएँ: आधुनिक उच्च-प्रदर्शन वाले खेल उपकरणों के लिए विशेष पॉलिमर, प्रदर्शन वाले कपड़े और कार्बन कंपोजिट जैसी उन्नत सामग्रियों की आवश्यकता होती है।
- आयात पर निर्भरता: ये महत्वपूर्ण सामग्रियाँ भारत में बड़े पैमाने पर उत्पादित नहीं होती हैं, जिससे निर्माताओं को आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।
- कराधान संबंधी मुद्दे: इन आवश्यक कच्चे माल पर उच्च आयात शुल्क उत्पादन लागत को बढ़ाते हैं, और MSMEs के पहले से ही कम लाभ मार्जिन को अत्यंत कम कर देते हैं।
परीक्षण, प्रमाणन और लॉजिस्टिक्स:
- सुविधाओं का अभाव: वैश्विक बाजारों तक पहुँचने के लिए, खेल उपकरणों को प्रासंगिक अंतरराष्ट्रीय खेल महासंघों द्वारा प्रमाणित किया जाना चाहिए।
- हालाँकि, भारत में पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त परीक्षण प्रयोगशालाओं की कमी है, जिससे निर्माताओं को प्रमाणन के लिए उत्पादों को यूरोप भेजने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
- उच्च लागत: एक सिंगल स्टॉक कीपिंग यूनिट (SKU), यानी किसी उत्पाद के एक विशिष्ट मॉडल या आकार के परीक्षण में ₹5 लाख से ₹50 लाख तक की लागत आ सकती है, जिससे प्रमाणन कई MSMEs की पहुँच से बाहर हो जाता है।
- लॉजिस्टिक उपलब्धता अंतराल: अधिकांश विनिर्माण क्लस्टर उत्तर भारत में हैं, जबकि प्रमुख बंदरगाह दक्षिण और पश्चिम में हैं, जिससे घरेलू परिवहन लागत अधिक हो जाती है।
ब्रांडिंग अंतराल:
- अनुबंध विनिर्माण: क्रिकेट उपकरणों के बाहर भारत के पास बहुत कम वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त खेल ब्रांड हैं।
- अधिकांश भारतीय फर्में अनुबंध निर्माताओं के रूप में कार्य करती हैं, जो ऐसे उपकरणों का उत्पादन करती हैं जिन्हें विदेशी कंपनियाँ ब्रांड करती हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उच्च मूल्यों पर बेचती हैं।
- विपणन चुनौतियाँ: कई MSMEs के पास वैश्विक विपणन, ब्रांड निर्माण और एथलीट एंडोर्समेंट के लिए वित्तीय क्षमता की कमी है।
आगे की राह:
- अल्पकालिक: उन्नत मशीनरी और विशेष कच्चे माल पर आयात शुल्क की कमी, वैश्विक परीक्षण और प्रमाणन के लिए सब्सिडी प्रदान करना, तथा निर्माताओं को निर्यात-लिंक्ड राजकोषीय प्रोत्साहन देना।
- मध्यम अवधि: उच्च प्रदर्शन वाले खेल उपकरण और सामग्री विकसित करने के लिए संबद्ध उद्योगों—जैसे तकनीकी वस्त्र, प्लास्टिक और जूते—की तकनीकी क्षमताओं का लाभ उठाना।
- दीर्घकालिक: कार्बन कंपोजिट जैसी उन्नत सामग्रियों के स्वदेशी उत्पादन में निवेश करना, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारतीय खेल ब्रांडों को बढ़ावा देना तथा भारत द्वारा आयोजित भविष्य के बड़े कार्यक्रमों (जैसे- ओलंपिक खेल) के लिए “मेड इन इंडिया” उपकरणों के उपयोग को अनिवार्य बनाना।
निष्कर्ष
भारत को एक सुसंगत राष्ट्रीय रणनीति के माध्यम से खंडित, पारंपरिक उत्पादन से बड़े पैमाने पर, प्रौद्योगिकी-संचालित खेल विनिर्माण की ओर बढ़ना चाहिए; समय पर नीतिगत समर्थन, नवाचार और ब्रांड निर्माण के साथ यह एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर सकता है, जो खेल अर्थव्यवस्था और भविष्य के मानकों को आकार देगा।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. खेलों के साथ गहन सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध के बावजूद, वैश्विक खेल उपकरण विनिर्माण व्यापार में भारत की उपस्थिति मामूली बनी हुई है। इस क्षेत्र में MSMEs द्वारा सामना की जाने वाली संरचनात्मक बाधाओं का विश्लेषण कीजिए तथा इसकी निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के उपाय सुझाइए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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