संदर्भ:
वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब (World Inequality Lab) द्वारा जारी एक वर्किंग पेपर के अनुसार, ग्रामीण भारत में भूमि स्वामित्व अत्यधिक केंद्रित है, जहाँ शीर्ष 10% परिवारों के पास कुल भूमि क्षेत्र का 44% भाग है।
ग्रामीण भारत में भूमि का सामाजिक महत्त्व:
- एक संपत्ति से परे: ग्रामीण भारत में, भूमि केवल कृषि के लिए एक आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि व्यक्ति की पहचान और आजीविका सुरक्षा का एक मूलभूत तत्त्व है।
- सांस्कृतिक संदर्भ: भूमि के गहने सामाजिक महत्त्व को मुंशी प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास ‘गोदान’ में दर्शाया गया है, जहाँ मुख्य पात्र होरी का जीवन भर का संघर्ष अपनी जमीन और गाय की रक्षा करने के इर्द-गिर्द केंद्रित रहता है।
- भूमि के तीन स्तंभ: ग्रामीण समाज में, भूमि जीवन के तीन महत्त्वपूर्ण पहलुओं को निर्धारित करती है—आय सृजन, समुदाय के भीतर सामाजिक स्थिति, तथा संस्थागत ऋण तक पहुँच (क्योंकि बैंक अक्सर ऋण के लिए संपार्श्विक/गारंटी के रूप में भूमि की माँग करते हैं)।
भूमि स्वामित्व का वर्गीकरण:
ग्रामीण भारत में भूमि वितरण को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
- बड़े भूस्वामी: गाँव की भूमि के सबसे बड़े और अक्सर सबसे उपजाऊ हिस्सों के मालिक, जो उन्हें महत्त्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक प्रभाव प्रदान करते हैं।
- छोटे और सीमांत किसान: बहुत छोटी जोत वाले किसान, जो प्रायः सतत आजीविका के लिए पर्याप्त आय उत्पन्न करने के लिए संघर्ष करते हैं।
- भूमिहीन परिवार: ये परिवार किसी भूमि के मालिक नहीं होते और आमतौर पर अपनी आजीविका के लिए दूसरों के खेतों में दिहाड़ी मजदूर के रूप में कार्य करते हैं।
- वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब के नवीनतम पेपर के अनुसार, भारत में लगभग 46% ग्रामीण परिवार पूरी तरह से भूमिहीन हैं।
ग्रामीण भारत में भूमि वितरण पर वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब का अध्ययन:
- डेटा स्रोत: 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) पर आधारित वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब का एक वर्किंग पेपर।
- अध्ययन का विस्तार: लगभग 2,70,000 गाँवों के लगभग 650 मिलियन व्यक्तियों का विश्लेषण।
- भौगोलिक विस्तार: इसमें 10 प्रमुख राज्य शामिल थे—पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल—जो भारत की ग्रामीण आबादी का लगभग 75% भाग हैं।
- भूमि वितरण पर मुख्य निष्कर्ष:
- शीर्ष 10% ग्रामीण परिवारों के पास भारत की कुल ग्रामीण भूमि का लगभग 44% हिस्सा है।
- शीर्ष 5% परिवारों का लगभग 32% भूमि पर नियंत्रण है।
- अकेले शीर्ष 1% परिवारों के पास लगभग 18% भूमि है।
- औसत जोत: भूमि के मालिक परिवारों के बीच औसत भूमि जोत लगभग 6.2 हेक्टेयर है, हालाँकि प्रभावी नियंत्रण अक्सर कुछ परिवारों के मध्य ही केंद्रित रहता है।
- नीतिगत विफलता: स्वतंत्रता के बाद के सुधारों जैसे- जमींदारी उन्मूलन और भूमि हदबंदी (land ceiling) कानूनों की शुरुआत के बावजूद, कमजोर कार्यान्वयन और प्रशासनिक खामियों ने ठोस पुनर्वितरण को रोक दिया, जिससे भूमि स्वामित्व में असमानता बनी रही।
क्षेत्रीय असमानताएँ और गिनी गुणांक:
- गिनी गुणांक: यह 0 से 100 के पैमाने पर असमानता को मापता है, जहाँ 100 पूर्ण असमानता और 0 पूर्ण समानता को दर्शाता है।
- उच्चतम असमानता: केरल में लगभग 90 के गिनी स्कोर के साथ सबसे अधिक भूमि असमानता दर्ज की गई है, इसके बाद बिहार, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल का स्थान है।
- अत्यधिक संकेंद्रण: बिहार में, एक औसत गाँव में एक अकेला परिवार गाँव की 20% भूमि को नियंत्रित कर सकता है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह आँकड़ा लगभग 7.3% है।
- पंजाब का विरोधाभास: कृषि रूप से समृद्ध होने के बावजूद, अत्यधिक मशीनीकृत खेती, बढ़ती भूमि की कीमतों और प्रवासी श्रमिकों पर निर्भरता के कारण, पंजाब में भूमिहीनता सबसे अधिक (लगभग 73%) है।
- निम्न असमानता: राजस्थान और मध्य प्रदेश में भूमिहीनता तुलनात्मक रूप से कम है।
भूमि असमानता के चालक:
- कृषि-पारिस्थितिकी स्थितियाँ: उपजाऊ और बाजारों के पास की भूमि अक्सर आर्थिक और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली समूहों द्वारा नियंत्रित की जाती है, जबकि कमजोर परिवारों के पास कम उत्पादक भूमि रह जाती है।
- जाति व्यवस्था: उच्च अनुसूचित जाति (SC) जनसंख्या वाले क्षेत्रों में अक्सर अधिक भूमिहीनता देखी जाती है, जिसका कारण ऐतिहासिक रूप से इन समुदायों का भूमि स्वामित्व से बहिष्करण रहा है।
- बुनियादी ढाँचा विरोधाभास: राजमार्गों और शहरी विस्तार जैसी विकास परियोजनाओं से भूमि की कीमतें बढ़ जाती हैं।
- छोटे किसान आर्थिक दबाव में अपनी जमीन बेच देते हैं, जिससे समावेशी विकास की बजाय धनी रियल एस्टेट हितों द्वारा भूमि का एकीकरण हो जाता है।
- ऐतिहासिक विरासत: वे क्षेत्र, जो ऐतिहासिक रूप से स्थायी बंदोबस्त और जमींदारी प्रथा के अधीन थे, वहाँ भूमि असमानता अधिक बनी हुई है, जबकि पूर्व रियासतों में भूमिहीनता का स्तर अपेक्षाकृत कम है।
भूमि असमानता के परिणाम:
- गरीबी का दुष्चक्र: भूमिहीन परिवार अक्सर पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी में फँसे रहते हैं, और आर्थिक गतिशीलता के सीमित अवसरों के साथ मुख्य रूप से निम्न वेतन वाले कृषि श्रम पर निर्भर रहते हैं।
- निम्न उत्पादकता: अत्यधिक खंडित और छोटी जोत किसानों की आधुनिक उपकरणों (सिंचाई, उर्वरक) में निवेश करने की क्षमता को सीमित करती है, जिससे कृषि उत्पादकता कम हो जाती है।
- सामाजिक तनाव: भूमि के असमान वितरण ने सामाजिक संघर्षों और जाति-आधारित हिंसा में योगदान दिया है, जैसा कि 1990 के दशक में बिहार में देखा गया था।
- आर्थिक बहिष्कार: भूमिहीन श्रमिक अक्सर ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ जैसी सरकारी सहायता योजनाओं से बाहर रह जाते हैं, और संपार्श्विक की कमी के कारण औपचारिक बैंक ऋण प्राप्त करने में भी कठिनाई का सामना करते हैं।
आगे की राह
- भूमि सुधारों को पुनर्जीवित करना: आदर्श किराया अधिनियम (Model Tenancy Act) को प्रभावी ढंग से लागू करके उन काश्तकारों के अधिकारों को मजबूत करना, जो उस भूमि पर खेती करते हैं जिसके वे मालिक नहीं हैं।
- डिजिटल भूमि रिकॉर्ड: स्वामित्व (SVAMITVA) योजना के तहत ड्रोन-आधारित मानचित्रण जैसी आधुनिक तकनीक का उपयोग करके सटीक और कंप्यूटरीकृत भूमि रिकॉर्ड सुनिश्चित करना।
- सहकारी खेती: सहकारी खेती मॉडल को बढ़ावा देना जहाँ छोटे और सीमांत किसान आधुनिक मशीनरी तक पहुँचने और उत्पादकता बढ़ाने के लिए भूमि और संसाधनों का साझा उपयोग करते हैं।
- ऋण तक पहुँच: भूमिहीन मजदूरों और बटाईदार किसानों के लिए बिना गारंटी (collateral-free) वाले ऋण की सुविधाओं का विस्तार करना।
निष्कर्ष
प्रभावी सुधारों, सुरक्षित भूमि अधिकारों और समावेशी ऋण प्रणालियों के माध्यम से भूमि असमानता को कम करना भारत में ग्रामीण समानता, उच्च कृषि उत्पादकता और सतत सामाजिक-आर्थिक विकास प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. भूमि सुधारों के कई दशकों के बावजूद, ग्रामीण भारत में भूमि वितरण असमान बना हुआ है। इस निरंतर असमानता के पीछे के सामाजिक-आर्थिक और भौगोलिक कारकों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। इसे दूर करने के लिए आधुनिक तकनीकी तथा नीतिगत हस्तक्षेपों के सुझाव दीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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