संदर्भ
नौ-न्यायाधीशों की पीठ सबरीमला निर्णय से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों की समीक्षा करेगी, विशेषकर अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं (ERP) सिद्धांत की सीमा और उसका समानता के अधिकार के साथ संतुलन।
धार्मिक स्वतंत्रता की आधारशिला
- अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत अधिकार): ययह अनुच्छेद प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, पालन करने और प्रचारित करने का अधिकार सुनिश्चित करता है।
- यह व्यक्तिगत आस्था के कार्यों की रक्षा करता है, जैसे—किसी व्यक्ति का मंदिर जाना, नमाज़ अदा करना, या किसी सिख का पगड़ी पहनना।
- अनुच्छेद 26 (सामूहिक/समूह अधिकार): यह धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार प्रदान करता है।
- उदाहरण के लिए, गुरुद्वारा समिति द्वारा लंगर का निर्णय लेना या किसी चर्च द्वारा अपने ट्रस्टी नियुक्त करना, इसी सामूहिक अधिकार के अंतर्गत आता है।
- प्रतिबंध और टकराव:
- अधिकार पूर्णतः निरपेक्ष नहीं: ये अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं और राज्य द्वारा सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य के आधार पर या जब ये अन्य मौलिक अधिकारों, जैसे अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के साथ टकराते हों, प्रतिबंधित किए जा सकते हैं।
- प्रत्यक्ष टकराव: अक्सर टकराव तब उत्पन्न होता है जब किसी व्यक्ति का अनुच्छेद 25 के तहत अधिकार, किसी समूह के अनुच्छेद 26 के अधिकार से टकराता है।
उदाहरण: कोई व्यक्ति मंदिर में प्रवेश चाहता है, जबकि धार्मिक ट्रस्ट परंपरा का हवाला देकर उसे रोकता है।
सबरीमला मामला (2018)
- मुद्दा: 10–50 वर्ष की आयु की महिलाएँ, जिन्हें उनके मासिक धर्म वाले वर्षों में माना जाता है, परंपरागत रूप से मंदिर में प्रवेश करने से वर्जित थीं ताकि भगवान अय्यप्पा की ब्रह्मचर्यिता की रक्षा हो सके, क्योंकि उन्हें “अनंत ब्रह्मचारी” (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) माना जाता है।
- बहुमत का मत (4:1): इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य मामले(2018) में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी।
- न्यायालय ने माना कि 10–50 वर्ष की महिलाओं को बाहर रखना अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव निषेध) और 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन है।
- न्यायालय ने यह भी कहा कि अय्यप्पा के भक्त एक पृथक धार्मिक संप्रदाय नहीं हैं (जैसे वैष्णव या शैव), इसलिए उन्हें अनुच्छेद 26 के तहत दूसरों को बाहर करने का विशेष संरक्षण प्राप्त नहीं है।
- अल्पमत का मत (न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा): उन्होंने तर्क दिया कि एक धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में न्यायालय को धार्मिक परंपराओं के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए या धार्मिक प्रथाओं पर सामान्य “समानता के सूत्र” को लागू नहीं करना चाहिए।
अनिवार्य धार्मिक प्रथा (ERP) परीक्षण
- उत्पत्ति: यह परीक्षण 1954 के शिरूर मठ मामले में स्थापित किया गया था, जो यह निर्धारित करता है कि कौन-सी प्रथाएँ किसी धर्म का अभिन्न हिस्सा हैं और इसलिए वह संविधान द्वारा संरक्षित हैं।
- ERP में विद्यमान कमियाँ:
- “धार्मिक आवरण” संबंधी समस्या: ERP परीक्षण न्यायालयों को यह तय करने के लिए बाध्य करता है कि किसी धर्म के लिए क्या आवश्यक है, जिससे न्यायपालिका धर्म के मामलों में निर्णय नहीं करे, इससे धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत का उल्लंघन होने का जोखिम उत्पन्न होता है।
- व्यावहारिक और साक्ष्य संबंधी सीमाएँ: न्यायालय अक्सर “आवश्यकता” के प्रश्नों का निर्णय बिना विस्तृत मौखिक साक्ष्य, जिरह या विशेषज्ञ धार्मिक गवाही के करता है, जिससे ऐसे निर्णयों का साक्ष्य-आधार स्वाभाविक रूप से कमजोर हो जाता है।
- गरिमा बनाम आवश्यकताएँ का टकराव: ERP परीक्षण यह स्पष्ट नहीं करता कि यदि कोई प्रथा धर्म के लिए आवश्यक मानी भी जाए, तो क्या उसे तब भी बनाए रखा जाना चाहिए जब वह किसी व्यक्ति के गरिमा, समानता और स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती हो।
एंटी-एक्सक्लूज़न परीक्षण (न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ द्वारा प्रस्तावित वैकल्पिक ढाँचा)
- सम्मान (Deference): न्यायालय धार्मिक समुदायों को अपने सिद्धांतों और मान्यताओं को स्वयं परिभाषित करने की स्वायत्तता प्रदान करता है, बजाय इसके कि वह स्वयं धार्मिक व्याख्या करे।
- एंटी-एक्सक्लूज़न परीक्षण (Anti Exclusion Check): हालाँकि, यदि कोई धार्मिक प्रथा इस प्रकार व्यक्तियों को बाहर करती है कि उनकी गरिमा प्रभावित होती है या उन्हें सामाजिक और नागरिक जीवन में समान पहुँच से वंचित किया जाता है, तो समानता और स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक मूल्य उस प्रथा पर वरीयता प्राप्त करेंगे।
तुलना: ERP परीक्षण बनाम एंटी-एक्सक्लूज़न परीक्षण (Anti Exclusion Check)
| पहलू |
ERP परीक्षण |
एंटी-एक्सक्लूज़न परीक्षण |
| मुख्य प्रश्न |
क्या यह प्रथा धर्म के लिए आवश्यक (अभिन्न) है? |
क्या यह प्रथा ऐसा बहिष्कार उत्पन्न करती है जो समानता और गरिमा का उल्लंघन करता है? |
| केंद्र बिंदु |
धार्मिक केंद्रीयता और आवश्यक धार्मिकता |
समान व्यवहार और व्यक्तिगत गरिमा का संरक्षण |
| न्यायालय की भूमिका |
न्यायाधीश धर्मशास्त्री की भूमिका में — यह तय करते हैं कि क्या धार्मिक रूप से आवश्यक है |
न्यायालय धार्मिक स्वायत्तता का सम्मान करते हैं; केवल बहिष्कार की स्थिति में हस्तक्षेप करते हैं |
| गरिमा के प्रति दृष्टिकोण |
यदि कोई आवश्यक प्रथा गरिमा का उल्लंघन करे तो स्पष्ट समाधान नहीं |
गरिमा संवैधानिक परीक्षण का केंद्रीय सिद्धांत है |
| धर्मनिरपेक्षता पर प्रभाव |
धर्मनिरपेक्षता से टकराव — न्यायालय धार्मिक क्षेत्र में प्रवेश करते हैं |
धर्मनिरपेक्षता की रक्षा — धार्मिक व्याख्या की आवश्यकता नहीं |
भविष्य के कानूनी निहितार्थ
- वर्ष 2026 की समीक्षा: वर्ष 2026 में नौ-न्यायाधीशों की पीठ इन मुद्दों की समीक्षा करेगी ताकि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर एक अंतिम और स्पष्ट संवैधानिक मिसाल स्थापित की जा सके। यह निर्णय अन्य महत्वपूर्ण मामलों को भी प्रभावित करेगा, जिनमें शामिल हैं:
- दाऊदी बोहरा समुदाय: इस समुदाय के धार्मिक नेताओं को सदस्यों को बहिष्कृत (Excommunicate) करने की शक्ति प्राप्त है। इससे निम्न संवैधानिक प्रश्न उत्पन्न होता है:
- क्या यह अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदायों के अधिकार) के अंतर्गत संरक्षित है?
- क्या यह गरिमा और समानता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है?
- पारसी महिलाएँ: यदि कोई पारसी महिला अपने धर्म से बाहर विवाह करती है:
- क्या वह ज़रथुस्त्र धर्म (Zoroastrianism) का पालन जारी रख सकती है?
- क्या समुदाय के नियम उसकी व्यक्तिगत धार्मिक पहचान पर वरीयता प्राप्त करेंगे?
निष्कर्ष
अंतिम समाधान धार्मिक स्वायत्तता की रक्षा और समानता तथा व्यक्तिगत गरिमा के संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने के बीच एक सामंजस्यपूर्ण संतुलन स्थापित करने में निहित है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं’ (ERP) परीक्षण पर निर्भरता ने उसे कई बार धार्मिक-व्याख्याकार (Theological) भूमिका निभाने के लिए बाध्य किया है। यह हमारे संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना को कमजोर करता है। प्रस्तावित ‘एंटी-एक्सक्लूज़न’ परीक्षण के संदर्भ में इस कथन की समालोचनात्मक समीक्षा कीजिए। नया ढाँचा किस प्रकार सामुदायिक आस्था और व्यक्तिगत गरिमा के बीच बेहतर संतुलन स्थापित कर सकता है?
(15 अंक, 250 शब्द)
|