संदर्भ
आंध्र प्रदेश के राजमहेंद्रवरम में दूध में एथिलीन ग्लाइकोल (एक औद्योगिक रसायन जो रेफ्रिजरेशन सिस्टम और चिलिंग प्लांट में एंटीफ्रीज़ और कूलेंट के रूप में व्यापक रूप से उपयोग होता है) की मिलावट से हुई सामूहिक विषाक्तता की घटना में 11 लोगों की मौत हो गई और कई लोग अस्पताल में भर्ती हुए।
पृष्ठभूमि
- लापरवाही: हालाँकि विक्रेता को चेतावनी दी गई थी कि दूध का स्वाद कड़वा है, फिर भी उसने आर्थिक नुकसान से बचने के लिए दूध की आपूर्ति जारी रखी।
- संवेदनशील आबादी पर प्रभाव: इस घटना का सबसे गंभीर प्रभाव शिशुओं और बुजुर्गों पर पड़ा।
- शिशु: उनकी उच्च चयापचय संवेदनशीलता के कारण उनके शरीर ने एथिलीन ग्लाइकोल को बहुत तेजी से विषैले अम्लों में बदल दिया।
- बुजुर्ग: उनकी कमजोर गुर्दा (किडनी) कार्यक्षमता के कारण शरीर के लिए इस विषैले पदार्थ को बाहर निकालना कठिन हो गया।
- आपराधिक आरोप: विक्रेता के कथित तौर पर मिलावट की जानकारी होने के बावजूद बिक्री जारी रखने के कारण भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103 (हत्या) और धारा 105 (ऐसी गैर-इरादतन हत्या जो हत्या की श्रेणी में नहीं आती) के तहत मामले दर्ज किए गए।
- ऐतिहासिक समानता: इस घटना की तुलना वर्ष 2008 के चीन के मेलामाइन दूध कांड से की जा रही है, जहाँ दूध में प्लास्टिक रसायन मिलाने से बच्चों बीमार हो गए थे। यह दर्शाता है कि दूध में मिलावट वैश्विक स्तर पर नियामकों के लिए एक बार-बार सामने आने वाली चुनौती है।
डेयरी आपूर्ति श्रृंखला की संरचनात्मक समस्याएँ
- अनौपचारिक बाजार का प्रभुत्व: भारत में दूध वितरण का बड़ा हिस्सा छोटे और अनियमित विक्रेताओं के माध्यम से होता है, जिनकी निगरानी बहुत कम होती है।
- निगरानी का अभाव : राजमहेंद्रवरम की डेयरी कथित तौर पर 11 वर्षों तक बिना लाइसेंस के संचालित हुई, जो नियामक विफलता और स्थानीय अधिकारियों एवं भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा नियमित निरीक्षण की अनुपस्थिति को दर्शाता है।
- कमजोर सुरक्षा अवसंरचना: कोल्ड-चेन सिस्टम, परीक्षण सुविधाओं और नियमित स्वच्छता निरीक्षण की कमी से मिलावट का जोखिम बढ़ जाता है।
- कठोर दंड के प्रतिकूल प्रभाव: अत्यधिक आपराधिक दंड छोटे विक्रेताओं को नियंत्रित प्रणाली से बाहर या और अधिक अनौपचारिक क्षेत्र में धकेल सकता है, जिससे निगरानी और कमजोर हो सकती है।
- निवारक अंतर: अपराध को रोकने में सजा की निश्चितता और त्वरितता उसकी कठोरता से अधिक प्रभावी होती है।
- कमजोर प्रवर्तन और न्यायिक देरी के कारण, कठोर दंड की मांग के बावजूद जवाबदेही कम हो जाती है।
आगे की राह
- सब्सिडी वाला परीक्षण किट: छोटी डेयरियों और विक्रेताओं को सस्ती दूध परीक्षण किट उपलब्ध कराई जाए, जिससे वे नियमित गुणवत्ता जांच कर सकें और मिलावट का जल्दी पता लगाया जा सके।
- सहकारी शीतलन केंद्र: सरकार समर्थित सहकारी शीतलन सुविधाएँ स्थापित की जाएँ, जहाँ छोटे विक्रेता अपने संसाधनों को साझा कर सकें और रेफ्रिजरेशन अवसंरचना का उपयोग कर सकें।
- इससे कोल्ड-चेन रखरखाव बेहतर होगा और खाद्य सुरक्षा मानक मजबूत होंगे।
- सेफ हार्बर प्रावधान: ऐसे विक्रेताओं के लिए कम दंड लागू करें जो स्वेच्छा से तथा समय रहते मिलावट की रिपोर्ट करते हैं, ताकि अधिकारी सार्वजनिक नुकसान होने से पहले हस्तक्षेप कर सकें।
निष्कर्ष
प्रभावी खाद्य सुरक्षा नियमन इस बात पर निर्भर करता है कि उल्लंघनों का नियमित पता लगाया जाए और खाद्य सुरक्षा कानूनों और नियमों का समय पर पालन करवाया जाए, क्योंकि ये कठोर दंड की तुलना में अधिक मजबूत निवारक के रूप में कार्य करते हैं।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: खाद्य मिलावट की घटनाएँ नियामक निगरानी और प्रवर्तन तंत्र की गंभीर कमजोरियों को उजागर करती हैं। भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में शामिल संस्थागत और शासन संबंधी चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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