संदर्भ
रूस–यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में तनाव जैसे वैश्विक संघर्षों पर भारत के रुख को लेकर बहस ने फिर से यह प्रश्न उठाया है कि भारत अपनी विदेश नीति में तटस्थता का पालन करता है या अधिक रणनीतिक दृष्टिकोण को अपनाता है।
गुटनिरपेक्षता बनाम तटस्थता
- सैद्धांतिक अंतर: तटस्थता (जैसे स्विट्ज़रलैंड) का अर्थ है संघर्षों में किसी भी पक्ष से दूरी बनाए रखना, जबकि भारत का गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) सिद्धांत मुद्दों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेने की अनुमति प्रदान करता है।
- राष्ट्रीय हित मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में: अंतरराष्ट्रीय संबंधों में किसी मुद्दे की “योग्यता” अक्सर किसी देश के राष्ट्रीय हित के समान होती है।
- भारत ने ऐतिहासिक रूप से ऐसे पक्ष चुने हैं जो उसकी रणनीतिक और आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप हों, न कि केवल नैतिक या आदर्शवादी आधार पर।
- भारत कभी-कभी खुले तौर पर, कभी-कभी सूक्ष्म रूप से, लेकिन हमेशा अपने निर्णय से किसी न किसी पक्ष का समर्थन करता रहा है।
सोवियत संघ/रूस की ओर ऐतिहासिक झुकाव
- पश्चिम-विरोधी भावना की विरासत: औपनिवेशिक अनुभव और शीत युद्ध के दौरान पाकिस्तान को अमेरिका का समर्थन मिलने के कारण भारत पश्चिमी गुटों से दूरी बनाए रखता था।
- सोवियत हस्तक्षेपों पर चुप्पी: भारत ने हंगरी (1956), चेकोस्लोवाकिया (1968) और अफगानिस्तान (1979) में सोवियत हस्तक्षेपों की निंदा करने से परहेज किया।
- इसका कारण यह था कि सोवियत संघ ने कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में वीटो अधिकार के माध्यम से समर्थन दिया था, साथ ही भारत को हथियार उपलब्ध कराए और भारत के साथ मित्रता संधि बनाए रखी।
- यूक्रेन संघर्ष: भारत ने यूक्रेन में रूस की कार्रवाइयों (2014, 2022) पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों में मतदान से परहेज (Abstain) किया, जो उसके रूस के साथ रणनीतिक संबंधों और भू-राजनीतिक विचारों को दर्शाता है।
नैतिकता से अधिक व्यवहारिकता – प्रमुख उदाहरण
- वियतनाम–कंबोडिया (1978): भारत ने कंबोडिया में वियतनाम के हस्तक्षेप की आलोचना नहीं की क्योंकि वियतनाम को चीन के संतुलन के रूप में देखा जाता था।
- कोरियाई युद्ध (1950): प्रधानमंत्री नेहरू ने चीन के युद्ध में प्रवेश की निंदा करने वाले संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव का विरोध किया ताकि बीजिंग के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए रखे जा सकें।
- इराक–कुवैत संकट (1990): इराक द्वारा कुवैत पर अवैध कब्जे के बावजूद, भारत ने लगभग 1.5 लाख भारतीयों की सुरक्षित निकासी और अपने तेल हितों की रक्षा के लिए सद्दाम हुसैन के साथ संबंध बनाए रखे। यह निर्णय नैतिकता की बजाय व्यावहारिक दृष्टिकोण पर आधारित था।
पश्चिम एशिया के प्रति भारत का पुराना दृष्टिकोण
- द्विआधारी भू-राजनीतिक दृष्टिकोण: भारत ने परंपरागत रूप से इस क्षेत्र की व्याख्या दो दृष्टिकोणों से की है: अमेरिका बनाम अरब और इज़राइल बनाम अरब।
- सीमित ध्यान सुन्नी-शिया विभाजन पर दिया गया, विशेष रूप से अरब-ईरान रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पर।
- अरब राजतंत्र बनाम गणराज्य शासन और उनकी राजनीतिक दरारों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
- विकृत नीतिगत प्रतिक्रियाएँ: इस सरलीकृत समझ ने समय के साथ भारत के रणनीतिक विश्लेषण और कूटनीतिक प्रतिक्रियाओं को कमजोर कर दिया।
वर्त्तमान बदलाव – मध्य पूर्व और इज़राइल
- इज़राइल के साथ बढ़ता सहयोग: भारत ने रक्षा प्रौद्योगिकी, खुफिया जानकारी साझा करने, कृषि, और नवाचार के क्षेत्र में इज़राइल के साथ सहयोग को बढ़ावा दिया है।
- कुछ लोग यह भी मानते हैं कि भारत ईरान के साथ संघर्ष में इज़राइल की ओर झुककर अपनी तटस्थता की नीति का परित्याग कर रहा है।
- खाड़ी देशों में आर्थिक और प्रवासी हितों का संतुलन: खाड़ी देशों के साथ लगभग 200 अरब डॉलर के व्यापार और वहां लगभग 90 लाख भारतीय निवास करने के कारण, भारत की नीति ऊर्जा सुरक्षा, प्रेषित रकम, और अपने प्रवासी समुदाय की सुरक्षा को प्राथमिकता देती है, और अरब देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने को प्रोत्साहित करती है।
- ईरान का कारक: वर्त्तमान में भारत के हित ईरान का समर्थन करने से पूरी तरह मेल नहीं खाते, विशेषकर जब कई अरब देशों ने अब्राहम समझौतों (Abraham Accords) के माध्यम से इज़राइल के साथ अपने संबंध सामान्य कर लिए हैं।
निष्कर्ष
भारत की विदेश नीति सक्रिय तटस्थता की बजाय रणनीतिक स्वायत्तता को दर्शाती है, जो लगातार ऐसे मार्ग को अपनाती है जो राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक हित, और विदेश में अपने नागरिकों के कल्याण की रक्षा करते हैं।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से कठोर तटस्थता के बजाय नैतिकता और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन स्थापित करती रही है। पश्चिम एशिया में बदलती भू-राजनीति के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए कि भारत का दृष्टिकोण इस परिवर्तन को किस प्रकार दर्शाता है।
(150 शब्द, 10 अंक)
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