संदर्भ:
भारत में बाल यौन शोषण की लगातार कम रिपोर्टिंग, जिसे कोयम्बटूर के हालिया सुलूर मामले ने उजागर किया है, गहन व्यवस्थागत अक्षमताओं, विधि प्रवर्तन में जनता के अविश्वास और साक्ष्य-आधारित, आघात-सचेत (trauma-informed) संस्थागत प्रतिक्रियाओं की गंभीर कमी को उजागर करती है।
संकट की वास्तविक प्रकृति:
- विश्वस्त पारिवारिक संबंध: 90% से अधिक मामलों में, बच्चे के लिए खतरा परिवार के विश्वस्त लोगों के भीतर से उत्पन्न होता है, जो हिंसक अजनबियों पर जनता के ध्यान को सीधे तौर पर झुठलाता है।
- लक्षित संवेदनशीलता: प्रवासी और श्रमिक वर्ग के समुदायों को अधिक जोखिम का सामना करना पड़ता है, क्योंकि वे सुरक्षात्मक स्थानीय सामाजिक नेटवर्क में कम एकीकृत होते हैं।
शहरी संरचना तथा अवसंरचनात्मक विफलताएँ:
- उपेक्षित अपराध स्थल: उपेक्षित औद्योगिक स्थल और खराब रखरखाव वाली साझा भूमि अक्सर बच्चों के खिलाफ अपराधों के लिए सक्रिय स्थान बन जाती हैं।
- मेट्रो-केंद्रित फोकस: ‘सेफ सिटी’ परियोजना के बावजूद, शहरी पुनर्विकास असमान रूप से मुख्य महानगरीय क्षेत्रों में केंद्रित होता है, जिससे उसके आस-पास के क्षेत्रों की अनदेखी होती है।
- अनदेखी की गई सामाजिक सुरक्षा: पारिस्थितिक परियोजनाएँ, जैसे- नोय्याल नदी आर्द्रभूमि पुनरुद्धार, नियमित रूप से बाल-अनुकूल शहरी विकास प्रतिमानों को शामिल करने में विफल रहती हैं।
न्यायिक बाधाएँ तथा सजा दर:
- गंभीर मामलों का बैकलाग: विशेष पॉक्सो (POCSO) अदालतें 89% लंबित दर का सामना कर रही हैं, जो एक वर्ष के भीतर सुनवाई पूरी करने के वैधानिक जनादेश में विफल रही हैं।
- सजा की दर: ऐतिहासिक सजा दर निराशाजनक रूप से 3% से 30% के बीच बनी हुई है, जो न्यायपालिका और पुलिस में जनता के विश्वास को गंभीर रूप से कमजोर करती है।
- अत्यधिक कार्यभार: 2024 में, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने 70,000 से अधिक बाल पीड़ितों से जुड़े 69,191 पॉक्सो मामलों को दर्ज किया।
जनता के अविश्वास का चक्र:
- विलंबित हस्तक्षेप: पुलिस की उदासीनता के भय से, परिवार अक्सर लापता बच्चों की तलाश स्वयं करते हैं, जिससे अनजाने में अपराधियों को साक्ष्य नष्ट करने या भागने का समय मिल जाता है।
- नौकरशाही बाधाएँ: चूँकि राज्य त्वरित सजा देने में विफल रहता है, नागरिक कानून प्रवर्तन को एक शरण की बजाय बाधा के रूप में देखते हैं, जो रिपोर्टिंग की प्रक्रिया को और कम कर देता है।
दोषपूर्ण तथा प्रतिक्रियावादी नीतिगत प्रतिक्रियाएँ:
- तुष्टिकरण कानून: पॉक्सो अधिनियम में 2018 तथा 2019 के संशोधन साक्ष्यों की बजाय जनता के गुस्से की प्रतिक्रिया थे, जिसमें पूरी तरह से कठोर सजा पर ध्यान केंद्रित किया गया था।
- गंभीरता में कमी: बार-बार सजा को सख्त करना परिवारों को रिपोर्ट करने से हतोत्साहित करता है, क्योंकि अपराधी आमतौर पर एक जाना-पहचाना, परिचित रिश्तेदार होता है।
- आँकड़ा-नीति अंतराल: मात्रात्मक डेटा संग्रह में सुधार हुआ है, लेकिन दोषमुक्ति के गुणात्मक विश्लेषण तथा पुनरावृत्ति पर दीर्घकालिक डेटा शायद ही कभी वास्तविक नीतिगत बदलावों को सूचित करते हैं।
द्वितीयक उत्पीड़न :
- प्रशासनिक आघात: असंवेदनशील प्रशासनिक प्रतिक्रियाओं और सनसनीखेज मीडिया रिपोर्टों के कारण बचे लोगों और उनके परिवारों को गंभीर द्वितीयक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।
- कलंक-संचालित पुलिसिंग: आघात-सचेत (trauma-informed) पुलिसिंग की पूर्ण कमी हजारों बच्चों को रिपोर्ट न की गई हिंसा के आवर्ती चक्र के प्रति संवेदनशील छोड़ देती है।
निष्कर्ष:
बाल यौन शोषण के संस्थागत अदृश्यता को समाप्त करने के लिए प्रतिक्रियावादी, दंडात्मक कानूनों से व्यापक व्यवस्थागत सुधारों की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। वास्तविक बाल संरक्षण के लिए आवश्यक जनविश्वास को बहाल करने हेतु आघात-सचेत पुलिसिंग, साक्ष्य-आधारित न्यायिक प्रबंधन और बाल-सुरक्षित शहरी नियोजन की आवश्यकता है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्र. पॉक्सो अधिनियम और हालिया संशोधनों के तहत कठोर विधिक प्रावधानों के बावजूद, सजा की दर अत्यंत कम बनी हुई है। भारत में बाल यौन शोषण के मामलों की कम रिपोर्टिंग में योगदान देने वाले व्यवस्थागत, सामाजिक तथा ढाँचागत बाधाओं का विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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