संदर्भ:
हाल ही में नोएडा में हुआ आंदोलन गहरी आर्थिक कठिनाइयों को दर्शाती है, जहाँ मजदूरी, नौकरी की सुरक्षा और कार्य स्थितियों को लेकर श्रमिक असंतोष हिंसक झड़पों और व्यवधानों में बदल गया है। यह राज्य, उद्योग और श्रमिकों के बीच सामाजिक अनुबंध के टूटने का संकेत देता है तथा शासन और नियामक खामियों को उजागर करता है।
मुख्य कारण — वेतन असमानता और महंगाई
यह आंदोलन पड़ोसी हरियाणा से तुलना के कारण शुरू हुआ, जहाँ समान अशांति के बाद न्यूनतम मजदूरी में 35% की वृद्धि की गई।
- 21% का अंतर: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित 21% की अंतरिम वेतन वृद्धि को श्रमिकों ने अपर्याप्त माना, जबकि वे मासिक वेतन को 18,000 से 25,000 रुपये तक बढ़ाने की मांग कर रहे थे।
- जीवन-यापन संकट: स्थिर मजदूरी और उच्च महंगाई के कारण स्थिति गंभीर हो गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार श्रमिक अपनी आय का लगभग एक-छठा हिस्सा केवल एलपीजी (रसोई गैस) और भोजन पर खर्च करते हैं, जिससे अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन जीना लगभग असंभव हो गया है।
नए श्रम संहिताओं (2025) से संबंधित चिंताएँ
29 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं (वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा, और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ) में समेकित करना विवाद का केंद्र है:
- वेतन फ्लोर की संस्थागत विफलता: वेतन संहिता के तहत केंद्र सरकार को कानूनी रूप से बाध्यकारी न्यूनतम वेतन स्तर (वेतन फ्लोर) निर्धारित करने का दायित्व सौंपा गया है।
- ऐसा करने में विफल रहने के कारण राज्यों को औद्योगिक निवेश के लिए प्रतिस्पर्धा करते हुए मजदूरी को कृत्रिम रूप से कम बनाए रखने का अवसर प्राप्त हुआ है।
- कार्य घंटों में वृद्धि: नई संहिताएँ 8 घंटे के मानक कार्यदिवस को 12–14 घंटे तक बढ़ाने की अनुमति देता हैं।
- प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि यह अक्सर कानूनी ओवरटाइम भुगतान के बिना किया जाता है।
- सामूहिक सौदेबाजी में कमी: श्रमिक संघ बनाने और हड़ताल करने के अधिकारों को सीमित कर दिया गया है, जिससे श्रमिक अधिकार “कागजी शेर” बनकर रह गए हैं।
औपचारिक क्षेत्र का अनौपचारिकीकरण
प्रदर्शनों ने एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव को उजागर किया है—ठेका श्रम (Contractualization) में वृद्धि:
- रोजगार असुरक्षा: औपचारिक विनिर्माण क्षेत्र में लगभग 40% कार्यबल अब ठेके पर कार्य कर रहा है, जिससे रोजगार की पूर्ण असुरक्षा और वैधानिक लाभों का पूरी तरह से नुकसान हो रहा है।
- ठेका श्रम की हिस्सेदारी: यह 1997-98 के बाद से ठेका श्रम की सबसे अधिक हिस्सेदारी है, क्योंकि नई श्रम संहिताएँ कंपनियों को दीर्घकालिक रोजगार प्रतिबद्धताओं से बचने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।
संस्थागत शून्यता
औद्योगिक शांति के टूटने का एक प्रमुख कारण संवाद की कमी है:
- भारतीय श्रम सम्मेलन (ILC): यह महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय निकाय (सरकार, नियोक्ता और कर्मचारी) वर्ष 2015 के बाद से नहीं मिला है।
- परामर्श की कमी: श्रम संहिताएँ बिना उस त्रिपक्षीय परामर्श के पारित की गईं, जिसे भारतीय श्रम सम्मेलन (ILC) द्वारा सुगम बनाया जाता, जिससे नीति-निर्माण में पूर्ण संस्थागत शून्यता उत्पन्न हो गई।
श्रम कल्याण के संदर्भ में आगे की राह
औद्योगिक संतुलन बहाल करने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:
- मानवीय कार्य समय का प्रवर्तन: 8 घंटे के अनिवार्य कार्यदिवस को पुनः लागू करना और ओवरटाइम भुगतान का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना।
- मुद्रास्फीति-सूचकांकित वेतन: भोजन और ईंधन की बढ़ती लागत के अनुरूप समय पर वेतन वृद्धि सुनिश्चित करना।
- ILC का पुनर्जीवन: नीति निर्माण में श्रमिक प्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए भारतीय श्रम सम्मेलन को पुनः सक्रिय करना।
- वेतन फ्लोर का कार्यान्वयन: राज्यों के बीच “न्यूनतम स्तर की दौड़” (Race To The Bottom) को रोकने के लिए केंद्र सरकार को तुरंत एक राष्ट्रीय वेतन फ्लोर निर्धारित करना चाहिए।
- निश्चित अवकाश नीतियाँ: निश्चित कार्य घंटों की मांग को पूरा करना तथा प्रति माह कम से कम चार वेतन सहित रविवार अवकाश सुनिश्चित करना।
निष्कर्ष
नोएडा के विरोध प्रदर्शन नई श्रम संहिताओं में मौजूद कमजोरियों को उजागर करते हैं, जहाँ व्यवसाय करने में सुगमता की प्राथमिकता आजीविका और गरिमा के अधिकार पर भारी पड़ने का जोखिम उत्पन्न करता है। सतत सुधार के लिए संस्थागत संवाद आवश्यक है तथा औपचारिक क्षेत्र को अनौपचारिकीकरण को बढ़ावा देने से रोका जाना चाहिए।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: हाल ही में औद्योगिक हड़तालों की लहर ने नए श्रम संहिता ढाँचे के तहत ठेका श्रमिकों की असुरक्षा को उजागर किया है। भारत में ‘व्यवसाय करने में आसानी’ (Ease of Doing Business) और ‘श्रमिक कल्याण’ (Worker Welfare) के बीच संतुलन का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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