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विमुक्त और खानाबदोश जनजातियाँ तथा उनकी जनजातीय पहचान

विमुक्त और खानाबदोश जनजातियाँ तथा उनकी जनजातीय पहचान 1 Apr 2026

संदर्भ

विमुक्त, खानाबदोश और अर्द्ध-खानाबदोश जनजातियाँ 2027 की जनगणना में एक अलग कॉलम तथा एक समर्पित अनुसूची में संवैधानिक मान्यता की माँग कर रही हैं, ताकि उचित पहचान, नीतिगत समर्थन और लक्षित कल्याणकारी उपाय सुनिश्चित किए जा सकें।

विमुक्त जनजातियों (DNT), खानाबदोश जनजातियों (NT) और अर्द्ध-खानाबदोश जनजातियों (SNT) के बारे में

  • विमुक्त जनजातियाँ: ब्रिटिश प्रशासन द्वारा आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871 के तहत कई समुदायों को ‘वंशानुगत अपराधी’ के रूप में वर्गीकृत किया गया था।
    • इस अधिनियम को 1952 में निरस्त कर इन समुदायों को ‘विमुक्त’ (Denotified) घोषित  दिया गया, हालाँकि बाद में इनमें से कई अभ्यस्त अपराधी अधिनियम (Habitual Offenders Act) के दायरे में आ गए, जिसके बारे में आलोचकों का कहना है कि इसने उनके सामाजिक कलंक को जारी रखा।
  • खानाबदोश जनजातियाँ: ऐसे समुदाय जिनका कोई स्थायी निवास नहीं होता और जो पशुपालन, शिल्प कार्य या व्यापार जैसे पारंपरिक व्यवसायों के लिए प्रवास करते हैं।
  • अर्द्ध-खानाबदोश जनजातियाँ: वे समूह जो आंशिक रूप से बसे हुए हैं, लेकिन आजीविका गतिविधियों के लिए वर्ष के दौरान समय-समय पर प्रवास करते हैं।
    • उदाहरण: बंजारा, बहरूपिया, बिरहोर, फकीर, कालबेलिया, सपेरा, वन गुर्जर, गाड़िया लोहार, नट।
  • अनुसूचित भाषाएँ: कई DNT, NT और SNT समुदाय ऐसी भाषाएँ बोलते हैं, जो भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं हैं, जिससे उनकी सांस्कृतिक और नीतिगत मान्यता सीमित हो जाती है।

वर्तमान संदर्भ- आँकड़ें तथा विधिक चुनौतियाँ

  • रेनके आयोग (2008): रेनके आयोग विमुक्त, खानाबदोश और अर्द्ध-खानाबदोश जनजातियों की स्थिति का दस्तावेजीकरण करने वाला पहला आधिकारिक प्रयास था।
    • इसने उनकी जनसंख्या लगभग 10.74 करोड़ (भारत की जनसंख्या का लगभग 8 से 10%) होने का अनुमान लगाया।
    • आयोग ने उनके गंभीर सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार और हाशिए पर होने पर प्रकाश डाला।
  • इदाते आयोग (2017): इदाते आयोग ने पूरे भारत में लगभग 1200 DNT, NT और SNT समुदायों की पहचान की।
    • इसने उल्लेख किया, कि 269 समुदाय अभी भी अवर्गीकृत हैं, जिसका अर्थ है कि वे SC, ST या OBC श्रेणियों में शामिल नहीं हैं।
    • आयोग ने बेहतर नीति निर्माण के लिए जनगणना में उनकी गणना की सिफारिश की।
  • भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण अध्ययन (2023): भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण ने DNT और NT समुदायों के संबंध में शेष डेटा अंतराल को भरा।
  • हालिया विधिक प्रभाव: DNT और NT समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक महासंघ ने इन समूहों की मान्यता तथा अधिकारों की माँग को लेकर, भारत के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
    • न्यायालय ने कथित तौर पर याचिका को “गंभीर नहीं” बताते हुए खारिज कर दिया, जिससे इन समुदायों की “संस्थागत अदृश्यता” के संबंध में चिंताएँ पुनः बढ़ गई हैं।

सामाजिक हाशिए पर होना – DNT समुदायों की अदृश्यता और आधुनिकता के शिकार

  • संस्थागत अदृश्यता: अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के विपरीत, विमुक्त और खानाबदोश जनजातियों का सामाजिक संघर्ष मुख्यधारा के विमर्श में व्यापक रूप से अदृश्य है, क्योंकि कई समुदायों की पहचान और उपनाम प्रशासनिक एवं सामाजिक प्रणालियों से अनुपस्थित हैं।
  • औपनिवेशिक आधुनिकता: औपनिवेशिक प्रशासनिक दृष्टिकोण की निरंतरता जो गतिशील आबादी को संदेह की दृष्टि से देखती है, आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871 जैसी नीतियों की विरासत को दर्शाती है।
  • सौम्य शत्रुता: राज्य का एक ऐसा दृष्टिकोण जो कल्याणकारी उपायों के माध्यम से सहायक प्रतीत होता है, लेकिन खानाबदोश समुदायों की पारंपरिक जीवन शैली तथा गतिशीलता के प्रति संरचनात्मक रूप से प्रतिकूल बना रहता है।
  • प्रतिच्छेदी हाशिए पर होना : उनकी स्थिति बहिष्कार के कई रूपों को दर्शाती है—जैसे- दलितों द्वारा सामना किया जाने वाला सामाजिक भेदभाव, आदिवासियों द्वारा अनुभव किया गया अलगाव, और अन्य हाशिए के समुदायों में देखा जाने वाला सामाजिक कलंक।
  • एपिस्टेमिसाइड: समुदायों की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों, कौशल और सांस्कृतिक प्रथाओं का विनाश या अवमूल्यन, जो अक्सर सामाजिक हाशिए पर होने तथा आधुनिक संस्थानों के प्रभुत्व के कारण होता है।
  • वर्गीकरण में विसंगति: एक ही समुदाय को एक राज्य में अनुसूचित जाति, दूसरे में अनुसूचित जनजाति तथा कहीं और अन्य पिछड़ा वर्ग के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है, जबकि लगभग 269 समुदाय पूरी तरह से अवर्गीकृत हैं, जिससे वे कल्याणकारी लाभों के दायरे से बाहर रह जाते हैं।

DNT और NT समुदायों के लिए ‘थ्री-सी’ (Three Cs) फ्रेमवर्क

  • संज्ञान (Cognisance): राज्य को औपचारिक रूप से विमुक्त और खानाबदोश जनजातियों के अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए, तथा उन्हें लक्षित नीतिगत ध्यान देने की आवश्यकता वाले एक विशिष्ट और कमजोर सामाजिक समूह के रूप में मान्यता देनी चाहिए।
  • गणना (Counting): 2027 की जनगणना में DNT और NT समुदायों के लिए एक अलग कॉलम आवश्यक है, क्योंकि सटीक गणना साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और कल्याणकारी वितरण का आधार बनती है।
  • वर्गीकरण (Categorisation): अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के प्रावधानों के समान एक अलग संवैधानिक अनुसूची का निर्माण करना, ताकि स्पष्ट वर्गीकरण और कल्याणकारी योजनाओं तक सीधी पहुंच सुनिश्चित हो सके।

निष्कर्ष

विमुक्त और खानाबदोश जनजातियों की पहचान, उचित गणना और संवैधानिक वर्गीकरण सुनिश्चित करना उनकी ऐतिहासिक अदृश्यता को समाप्त करने तथा प्रभावी सामाजिक न्याय नीतियों को सक्षम करने के लिए आवश्यक है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. आगामी जनगणना विमुक्त, खानाबदोश और अर्द्ध-खानाबदोश जनजातियों (DNT/NT) के ऐतिहासिक हाशिए पर होने की स्थिति को संबोधित करने का एक अवसर प्रस्तुत करती है। उनकी पहचान और समावेश की चुनौतियों का परीक्षण कीजिए, तथा नीतिगत ढाँचे में उनके प्रभावी एकीकरण के उपाय सुझाइए।

(15 अंक, 250 शब्द)

विमुक्त और खानाबदोश जनजातियाँ तथा उनकी जनजातीय पहचान

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