संदर्भ
भारत को सस्ती जेनेरिक दवाओं की वैश्विक आपूर्ति में अपने प्रभाव के कारण “विश्व की फार्मेसी” के रूप में जाना जाता है, फिर भी वैश्विक दिग्गजों की तुलना में यह फार्मास्युटिकल नवाचार से बहुत कम राजस्व अर्जित करता है।
भारत के फार्मास्युटिकल क्षेत्र के प्रमुख शब्द:
- जेनेरिक दवाएँ : मूल दवा का पेटेंट समाप्त होने के बाद उत्पादित कम लागत वाली दवाएँ, जिनमें वही सक्रिय तत्त्व होते हैं तथा ब्रांडेड दवा के समान ही चिकित्सीय प्रभाव प्रदान करती हैं।
- नोवल ड्रग्स: मूल शोध के माध्यम से विकसित पूरी तरह से नई दवाएँ, जैसे- कैंसर जैसी बीमारियों के लिए महत्त्वपूर्ण उपचार, जहाँ फार्मास्युटिकल उद्योग का अधिकांश लाभ केंद्रित होता है।
- चिकित्सकीय परीक्षण चरण (क्लीनिकल ट्रायल): दवा का परीक्षण चार चरणों में होता है:
- चरण एक: स्वस्थ स्वयंसेवकों में सुरक्षा जाँच करता है।
- चरण दो और चरण तीन: रोगियों में प्रभावकारिता का आकलन करते हैं।
- चरण चार: अनुमोदन के बाद दीर्घकालिक सुरक्षा की निगरानी करता है।
- फर्स्ट-इन-ह्यूमन ट्रायल : यह चरण एक के क्लीनिकल ट्रायल के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द है, जहाँ पहली बार मनुष्यों को एक नई दवा दी जाती है, मुख्य रूप से सुरक्षा, खुराक सीमा तथा दुष्प्रभावों का आकलन करने के लिए।
- इन्वेस्टिगेटर-इनिशिएटेड ट्रायल फ्रेमवर्क: चीन में उपयोग किया जाने वाला एक विनियामक मॉडल, जहाँ शोधकर्ता केंद्रीय नियामक से अनुमति लिए बिना मानव परीक्षण आरंभ कर सकते हैं, जिससे दवा विकास बहुत तीव्र गति हो जाता है।
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भारत के फार्मा क्षेत्र में राजस्व अंतराल:
- राजस्व असमानता: भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग वार्षिक लगभग $50 बिलियन आय अर्जित करता है, जबकि मर्क एंड कंपनी (Merck & Co.) जैसी एक अकेली कंपनी लगभग $64 बिलियन उत्पन्न करती है।
- जेनेरिक बनाम नवाचार: भारतीय फर्में मुख्य रूप से जेनेरिक दवाओं का उत्पादन करती हैं, जबकि वैश्विक कंपनियाँ पेटेंट वाली नवीन दवाओं से लाभ कमाती हैं।
- मूल्य एकाग्रता: लाभ का प्रमुख भाग पेटेंट-संरक्षित दवाओं में निहित है, जो बड़ी उत्पादन क्षमता के बावजूद भारत के राजस्व को सीमित करता है।
भारत के फार्मा क्षेत्र में विनियामक बाधाएँ:
- अनुमोदन में देरी: चरण एक के क्लीनिकल ट्रायल के लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) से अनुमति मिलने में दो वर्ष तक लग सकते हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में इसमें लगभग 30 दिन ही लगते हैं।
- CDSCO दवा अनुमोदन के लिए उत्तरदायी भारत का राष्ट्रीय विनियामक निकाय है।
- संस्थागत क्षमता सीमाएँ: आवेदनों की समीक्षा विषय विशेषज्ञ समिति (SEC) द्वारा की जाती है, जिसकी सीमित क्षमता एक बड़ी बाधा उत्पन्न करती है।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता पर प्रभाव: विनियामक देरी के कारण अमेरिका और चीन की तीव्र प्रणालियाँ परीक्षण पहले पूरा कर लेती हैं, और नवाचारों का व्यवसायीकरण करती हैं।
- कम चिकित्सकीय परीक्षण गतिविधि: भारत वार्षिक रूप से लगभग 40 ‘चरण एक’ परीक्षण आयोजित करता है, जो अमेरिका (लगभग 800) और चीन (1,000 से अधिक) की तुलना में अत्यंत कम है।
भारत के फार्मा क्षेत्र में तकनीकी क्षमता और एआई (AI):
- मजबूत प्रतिभा आधार: भारत के पास कंप्यूटर विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और जीव विज्ञान आधारित चिकित्सा में विशेषज्ञता का अनूठा संयोजन है।
- त्वरित दवा खोज: एआई उन शोध कार्यों को कुछ महीनों के भीतर कर सकता है, जिनमें पहले वर्षों लग जाते थे।
- व्यक्तिगत चिकित्सा : उन्नत तकनीकें किसी व्यक्ति के डीएनए (DNA) के अनुरूप व्यक्तिगत दवाएँ विकसित करना संभव बनाती हैं।
विनियामक बाधाओं के लिए प्रस्तावित समाधान – ऑस्ट्रेलिया का विकेंद्रीकरण मॉडल:
- प्रारंभिक परीक्षणों के लिए विकेंद्रीकृत अनुमोदन: अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और अनुसंधान संस्थानों को अपनी स्थानीय विशेषज्ञ समितियों के माध्यम से, चरण एक और चरण दो के क्लीनिकल ट्रायल को मंजूरी देने का अधिकार दिया जाना चाहिए।
- स्थानीय विषय विशेषज्ञ समिति की संरचना: वैज्ञानिक और नैदानिक मूल्यांकन सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक समिति में एक चिकित्सक, शोधकर्ता, फार्मास्युटिकल विशेषज्ञ और बायोस्टैटिस्टिशियन शामिल होना चाहिए।
- कार्य प्रणाली :
- संस्थान-स्तर का अनुमोदन: फार्मास्युटिकल कंपनियाँ परीक्षण अनुमोदन के लिए, किसी भी अधिकृत अस्पताल या शोध संस्थान की स्थानीय SEC से संपर्क कर सकती हैं।
- विनियामक सूचना: अनुमोदन के बाद, संस्थान को केवल केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) को सूचित करने की आवश्यकता है, जिसमें केंद्रीय मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी।
- किसी विधायी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं: विकेंद्रीकृत मॉडल को मौजूदा विनियामक ढाँचे के भीतर लागू किया जा सकता है।
- अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धि: ऑस्ट्रेलिया में लगभग 30 वर्षों से एक विकेंद्रीकृत प्रणाली का पालन किया जा रहा है, और इसे चिकित्सकीय परीक्षण अनुमोदन के लिए एक वैश्विक स्वर्ण मानक माना जाता है।
- अपेक्षित लाभ:
- तीव्र गति से अनुमोदन: कई स्थानीय SEC केंद्रीय विनियामक पर बोझ कम करेंगे और अनुमोदनों में तेजी लाएंगे।
- बेहतर अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), अपोलो अस्पताल, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) जैसे संस्थान प्रारंभिक चरण के दवा परीक्षणों के लिए सक्रिय केंद्र बन सकते हैं।
भारत के फार्मा विनियमन में निष्क्रियता के परिणाम:
- स्थानीय बीमारियों की उपेक्षा: वैश्विक फार्मास्युटिकल फर्में उन बीमारियों में सीमित रुचि दिखाती हैं जो मुख्य रूप से भारत को प्रभावित करती हैं, जैसे- तपेदिक (TB) और कैंसर, जिसका अर्थ है कि घरेलू नवाचार की कमी सार्वजनिक स्वास्थ्य बोझ को लंबा खींच सकती है।
- भू-राजनीतिक निर्भरता: नवाचार क्षमता को मजबूत किए बिना, भारत नई पेटेंट और महंगी दवाओं के लिए पश्चिमी देशों तथा चीन पर निर्भर रह सकता है।
- जैव-सुरक्षा जोखिम: जैसे-जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) नए रोगजनकों को बनाने की संभावना बढ़ाती है, एक धीमी विनियामक प्रणाली भारत की तेजी से चिकित्सा जवाबी कार्रवाई विकसित करने एवं उभरते जैविक खतरों का जवाब देने की क्षमता में बाधा डाल सकती है।
निष्कर्ष
भारत की फार्मा प्रतिभा विश्व स्तरीय है, और ऑस्ट्रेलिया के समान विकेंद्रीकृत विनियामक मॉडल को अपनाने से भारत को एक जेनेरिक दवा निर्माता से नवीन दवाओं के वैश्विक प्रर्वतक के रूप में बदलने में सहायता प्राप्त हो सकती है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. भारत जेनेरिक दवाओं के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभरा है, फिर भी प्रमुख फार्मास्युटिकल इनपुट के लिए आयात पर निर्भर बना हुआ है। भारत के फार्मास्युटिकल क्षेत्र में संरचनात्मक चुनौतियों की चर्चा कीजिए, तथा आत्मनिर्भरता एवं नवाचार को बढ़ाने के उपाय सुझाइए।
(10 अंक, 150 शब्द)
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