संदर्भ:
भारतीय राजनीति में “विकास (Vikas)” शब्द अक्सर कल्याण और संरचनात्मक सुधारों को एक साथ मिला देता है, जिससे एक ऐसा विकास विरोधाभास उत्पन्न होता है जहाँ दिखाई देने वाली वृद्धि के बावजूद असमानता बनी रहती है।
कल्याण और विकास में अंतर
- कल्याण (अल्पकालिक/उपभोग-उन्मुख): यह उन तात्कालिक, पुनर्वितरण आधारित हस्तक्षेपों को संदर्भित करता है, जिनका उद्देश्य गरीबी को कम करना और असुरक्षा को घटाना होता है।
- उदाहरण: मुफ्त खाद्यान्न, ऋण माफी, प्रत्यक्ष नकद अंतरण।
- प्रकृति: यह तात्कालिक राहत प्रदान करता है और उपभोग को बढ़ावा देता है, लेकिन यह आवश्यक रूप से देश की उत्पादन क्षमता का विस्तार नहीं करता।
- विकास (दीर्घकालिक/उत्पादन-उन्मुख): यह एक व्यापक और मार्ग-निर्भर प्रक्रिया है, जिसमें संरचनात्मक परिवर्तन शामिल होते हैं तथा सतत आर्थिक वृद्धि और मानव क्षमताओं का विस्तार होता है।
- उदाहरण: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, तकनीकी को अपनाना।
- अमर्त्य सेन का क्षमता दृष्टिकोण: वास्तविक विकास मानव स्वतंत्रताओं (जैसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पोषण) के विस्तार पर केंद्रित होता है, न कि केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की मात्रा पर, क्योंकि केवल आर्थिक वृद्धि अपने आप में समान वितरण की गारंटी नहीं देती।
तनाव: राजकोषीय सीमाएँ और “रेवड़ी (Revdi) संस्कृति”
इन उद्देश्यों में संतुलन स्थापित करने में मुख्य चुनौती सीमित कर संसाधनों के आवंटन में निहित है:
- क्राउडिंग आउट प्रभाव: लोकलुभावन कल्याण योजनाओं (फ्रीबीज) पर अत्यधिक खर्च से सरकारी खजाना खाली हो सकता है, जिससे पूंजीगत व्यय के लिए संसाधन कम बचते हैं। इससे स्कूल और अस्पताल जैसे दीर्घकालिक विकास परियोजनाएँ प्रभावित होती हैं।
- “रेवड़ी संस्कृति” बहस: बिना शर्त नकद सहायता को अक्सर कल्याण का परजीवी दृष्टिकोण माना जाता है। हालाँकि यह चुनावी रूप से काफी आकर्षक होती है, लेकिन यह उत्पादन क्षमता को बढ़ाए बिना दीर्घकालिक वित्तीय अस्थिरता का जोखिम उत्पन्न करता है।
- सार्वजनिक वस्तुएँ और सकारात्मक बाह्य प्रभाव: वास्तविक विकास में सार्वजनिक वस्तुओं (जैसे कानून-व्यवस्था, स्वच्छ वायु) को प्राथमिकता दी जाती है। ये ऐसी वस्तुएँ होती हैं जिनसे किसी को अलग नहीं किया जा सकता (Non-Excludable) और जो मजबूत सकारात्मक बाह्य प्रभाव उत्पन्न करती हैं, जिससे लोकतंत्र की नींव और मजबूत होती है।
एकीकरण — एक पूरक मॉडल
कल्याण और विकास को एक-दूसरे के स्थान पर उपयोग होने योग्य नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाना चाहिए।
- मिड-डे मील का उदाहरण: यह एक कल्याणकारी साधन के रूप में कार्य करता है (भोजन प्रदान करता है), जो विकास को सक्षम बनाता है (स्कूल में उपस्थिति बनाए रखने और दीर्घकालिक सीखने के परिणामों में सुधार करता है)।
- उत्पादक सुरक्षा जाल: मनरेगा (MGNREGA) या पीएम-जेएवाई (PM-JAY) जैसी सुव्यवस्थित योजनाएँ मानव क्षमताओं को बढ़ाती हैं और असुरक्षा को कम करती हैं, जो अंततः आर्थिक उत्पादकता में योगदान देती हैं।
आगे की राह
- राजकोषीय पारदर्शिता: चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा घोषित मुफ्त योजनाओं (Freebies) के राजकोषीय प्रभाव का उल्लेख सुनिश्चित करने के लिए भारत के चुनाव आयोग (ECI) के दिशानिर्देशों का कार्यान्वयन आवश्यक है।
- रणनीतिक संतुलन: सरकारों को अल्पकालिक राहत और दीर्घकालिक संरचनात्मक निवेश के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए। कल्याण को विकास के लिए एक सेतु के रूप में कार्य करना चाहिए, न कि उसके विकल्प के रूप में।
- नागरिक जवाबदेही: अंतिम समाधान एक शिक्षित और स्वस्थ नागरिक समाज के निर्माण में निहित है, जो केवल समय-समय पर मिलने वाले लाभों के बजाय क्रमिक प्रगति और संस्थागत सुदृढ़ीकरण के लिए सरकार को जवाबदेह ठहरा सके।
निष्कर्ष
कल्याण को विकास के साथ मिलाकर देखने से अल्पकालिक लाभ को प्राथमिकता मिलती है, जबकि आर्थिक क्षमता की अनदेखी होती है। “विकसित भारत” के लक्ष्य के लिए आवश्यक है कि नीतियाँ वित्तीय रूप से स्थायी हों और कल्याण, विकास का पूरक बने।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: लोकलुभावन कल्याणकारी वादों को दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों के साथ मिलाना भारत की राजकोषीय स्थिरता और संरचनात्मक परिवर्तन के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करता है। मुफ्त योजनाओं (Freebies) की हालिया बहस के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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