संदर्भ:
हाल ही में कोयंबटूर में 10 वर्षीय बालिका के बलात्कार एवं हत्या के मामले पर मीडिया को जानकारी देते समय पुलिस अधिकारियों के अनौपचारिक एवं असंवेदनशील रवैये ने पुलिसिंग में घटती सहानुभूति को लेकर चिंताएँ उत्पन्न की हैं।
पुलिसिंग में सहानुभूति क्यों महत्वपूर्ण है?
- जनविश्वास: नागरिक अपने सबसे संवेदनशील और कठिन समय में पुलिस के पास सहायता के लिए पहुँचते हैं। ऐसे में असंवेदनशील व्यवहार आपराधिक न्याय प्रणाली के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर करता है।
- नैतिक शासन: कानून-प्रवर्तन एजेंसियों को अपने अधिकारों और शक्तियों के साथ करुणा एवं संवेदनशीलता का संतुलन बनाए रखना चाहिए, ताकि न्याय केवल प्रभावी ही नहीं बल्कि मानवीय भी हो।
- पीड़ित-केंद्रित न्याय: सहानुभूति पीड़ितों और उनके परिवारों को यह महसूस कराती है कि उनकी बात सुनी जा रही है, उनका सम्मान किया जा रहा है और कठिन परिस्थितियों में उन्हें उचित समर्थन प्राप्त है।
पुलिस अधिकारी भावनात्मक रूप से अलग-थलग क्यों हो जाते हैं?
- करुणा थकान: हिंसा, मृत्यु और पीड़ा के निरंतर संपर्क में रहने से व्यक्ति की दूसरों के दुःख और कष्ट के प्रति भावनात्मक रूप से संवेदनशील प्रतिक्रिया देने की क्षमता धीरे-धीरे कम हो जाती है।
- द्वितीयक आघातजन्य तनाव: पीड़ितों के दर्दनाक अनुभवों और आघात से बार-बार जुड़ाव के कारण पुलिस कर्मियों में स्वयं भी मनोवैज्ञानिक तनाव, भावनात्मक थकान और आघात-सदृश लक्षण विकसित हो सकते हैं।
- भावनात्मक शून्यता: सैनिकों, आपातकालीन चिकित्सकों और आपदा-प्रतिक्रिया कर्मियों की तरह पुलिस अधिकारी भी तनाव से निपटने के लिए भावनात्मक दूरी विकसित कर सकते हैं।
- व्यावसायिक संबंधी चुनौतियाँ: लंबे और अनिश्चित कार्य अवधि, साप्ताहिक अवकाश का अभाव, राजनीतिक दबाव, संसाधनों की कमी तथा जनता की बढ़ती अपेक्षाएँ पुलिस कर्मियों में तनाव, थकान और कार्य-उत्साह में कमी (बर्नआउट) का कारण बनती हैं।
- मनोवैज्ञानिक बोझ: अनिश्चित कार्य अवधि, साप्ताहिक अवकाश का अभाव, राजनीतिक दबाव, सीमित संसाधनों के बीच जनता की उच्च अपेक्षाएँ पुलिस कर्मियों में भावनात्मक थकावट, मानसिक तनाव और मनोवैज्ञानिक दबाव उत्पन्न करती हैं।
भारतीय पुलिस व्यवस्था में विद्यमान संरचनात्मक समस्याएँ
- औपनिवेशिक विरासत: वर्ष 1857 के विद्रोह के बाद लागू किया गया पुलिस अधिनियम, 1861 नागरिक-केंद्रित सेवा के बजाय नियंत्रण, दमन और कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर अधिक केंद्रित था।
- भय-आधारित पुलिसिंग: पुलिस थाने अक्सर भय उत्पन्न करने वाले और डरावने प्रतीत होते हैं, जिससे पीड़ित स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं तथा न्याय व्यवस्था से अलग-थलग और विमुख हो जाते हैं।
सर्वोत्तम प्रथाएँ
- हरियाणा की संवेदी पुलिस पहल: यह पहल पुलिस कर्मियों को जनता के साथ सम्मानजनक व्यवहार, पीड़ित-संवेदनशील संवाद तथा मानवीय एवं सहानुभूतिपूर्ण पुलिसिंग के लिए प्रशिक्षित करती है।
- आघात-संवेदनशील पुलिसिंग – यूके एवं कनाडा: यह मॉडल पीड़ितों तथा आघातपूर्ण परिस्थितियों से जुड़े मामलों का संवेदनशीलता, सहानुभूति और पेशेवर दक्षता के साथ प्रबंधन करने पर बल देता है।
- जापान की कोबान प्रणाली (Koban System): यह व्यवस्था नागरिकों और स्थानीय पुलिस कर्मियों के बीच नियमित संवाद एवं संपर्क के माध्यम से सामुदायिक पुलिसिंग को बढ़ावा देती है, जिससे जनता और पुलिस के बीच विश्वास तथा सहयोग मजबूत होता है।
- स्कैंडिनेवियाई मॉडल: यह मॉडल दमनात्मक या बल-आधारित पुलिसिंग के बजाय सामुदायिक सहभागिता, सहानुभूति, संवाद और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर अधिक बल देता है।
आगे की राह
- नागरिक-अनुकूल पुलिस अवसंरचना: स्वच्छ परिसर, प्रतीक्षालय, सीसीटीवी निगरानी, पेयजल सुविधा तथा महिलाओं के लिए पृथक सुविधाओं वाले स्वागतयोग्य पुलिस थानों का निर्माण किया जाए।
- भावनात्मक बुद्धिमत्ता प्रशिक्षण: पुलिस प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में भावनात्मक बुद्धिमत्ता, व्यवहार विज्ञान, आघात मनोविज्ञान तथा पीड़ित-संवेदनशील संवाद को शामिल किया जाए।
- पुलिस कर्मियों के लिए संस्थागत देखभाल: कार्य घंटों का युक्तिकरण, साप्ताहिक अवकाश, मनोवैज्ञानिक परामर्श तथा तनाव-प्रबंधन कार्यक्रम सुनिश्चित किए जाएँ।
- पीड़ित सहायता तंत्र: पुलिस थानों में पीड़ित सहायता डेस्क, परामर्श इकाइयाँ, पुनर्वास सहायता सेवाएँ तथा नागरिक सुविधा केंद्र स्थापित किए जाएँ।
- जवाबदेही एवं प्रतिपुष्टि तंत्र: पुलिस के व्यवहार और सेवा की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने हेतु स्वतंत्र ऑडिट तथा नागरिक प्रतिपुष्टि (फीडबैक) तंत्र की स्थापना की जाए, जिससे पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और जनविश्वास को बढ़ावा मिले।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: आपराधिक न्याय प्रणाली की वास्तविक वैधता केवल दोषसिद्धि (Convictions) से नहीं, बल्कि न्याय प्रदान करने की मानवीय प्रक्रिया से भी निर्धारित होती है। पुलिस कर्मियों में बढ़ती ‘करुणा थकान’ (Compassion Fatigue) के परिप्रेक्ष्य में भारत में आघात-संवेदनशील पुलिसिंग (Trauma-Informed Policing) की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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