संदर्भ:
ईरान और अरब खाड़ी राजतंत्रों के बीच बढ़ता हुआ तनाव फिर से ध्यान का केंद्र बन गया है, क्योंकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रॉक्सी संघर्ष और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंताएँ उभर रही हैं।
संरचनात्मक असमानता और शक्ति संतुलन
- जनसांख्यिकीय और राजनीतिक असमानता: ईरान लगभग 9 करोड़ की आबादी वाला एक बड़ा एकीकृत राष्ट्र है, जबकि छह खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों की कुल आबादी लगभग 2.7 करोड़ है, जिससे क्षेत्रीय शक्ति में एक संरचनात्मक असंतुलन उत्पन्न होता है।
- ईरान को संतुलित करने में कठिनाई: ईरान के भौगोलिक आकार, जनसंख्या और सैन्य क्षमता के कारण अरब खाड़ी देश अकेले उसके विरुद्ध स्थिर रणनीतिक संतुलन स्थापित नहीं कर सकते।
- बाह्य शक्तियों पर निर्भरता: यह असंतुलन सऊदी अरब और UAE जैसे देशों को सुरक्षा की गारंटी और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों, जैसे होर्मुज़ जलसंधि, की सुरक्षा के लिए अमेरिका पर अधिक निर्भर रहने के लिए मजबूर करता है।
खाड़ी सुरक्षा व्यवस्था का ऐतिहासिक विकास
- ब्रिटिश सुरक्षा ढाँचा: लगभग 150 वर्षों तक, ब्रिटेन ने खाड़ी में स्थिरता बनाए रखी थी। उसने छोटे राजतंत्रों राज्यों की रक्षा की और साथ ही ब्रिटिश भारत के ईरान के साथ कार्यात्मक सम्बन्ध स्थापित किए।
- क्षेत्रीय व्यवस्था में बदलाव: ब्रिटिश सत्ता के पतन, वर्ष 1971 में खाड़ी राज्यों की स्वतंत्रता, तथा वर्ष 1979 की ईरानी क्रांति ने खाड़ी की भू-राजनीति को मूल रूप से बदल दिया।
- 1979 से पहले ईरान की आक्रामकता: शाह के शासन के दौरान भी ईरान ने क्षेत्र में प्रभुत्व कायम करने का प्रयास किया, वर्ष 1971 में अबू मूसा (Abu Musa) और टुनब द्वीपों (Tunb islands) पर कब्ज़ा किया, बहरीन पर एक प्रांत के रूप में अपना दावा जताया, और ओमान में सैन्य हस्तक्षेप किया।
1979 की इस्लामी क्रांति का प्रभाव
- वैचारिक परिवर्तन: ईरान ने फारसी राष्ट्रवाद से हटकर शिया क्रांतिकारी विचारधारा अपनाई, जिसका उद्देश्य मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाना था।
- प्रॉक्सी समूहों के माध्यम से विस्तार: ईरान ने हेज़बोल्लाह (Hezbollah), हमास (Hamas) और हूती (Houthis) जैसे समूहों का समर्थन करके अपने क्षेत्रीय प्रभाव को मजबूत किया, जिससे सुन्नी अरब देशों के साथ तनाव बढ़ गया।
- अमेरिका–ईरान संबंधों में बदलाव: क्रांति ने संयुक्त राज्य अमेरिका को ईरान का सहयोगी से उसका प्रमुख रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी बना दिया।
असफल रणनीतियाँ और अनपेक्षित परिणाम
- इराक़ एक प्रतिरोधक के रूप में: खाड़ी के देशों ने इराक़–ईरान युद्ध के दौरान ईरान को सीमित करने के लिए इराक़ का समर्थन किया, लेकिन यह रणनीति तब उलट गई जब इराक़ ने कुवैत पर 1990 में आक्रमण किया, जिससे क्षेत्रीय संकट तथा तनाव और बढ़ गया।
- सुन्नी उग्रवाद का उदय: शिया ईरान का प्रतिरोध करने के प्रयास में कट्टर सुन्नी ताकतों का समर्थन करने से चरमपंथी नेटवर्क जैसे अल-कायदा के उदय में योगदान मिला।
- वर्ष 2003 में अमेरिका का इराक पर आक्रमण: सद्दाम हुसैन को हटाने से ईरान की शक्ति बढ़ी, जिसके कारण ईरान पर एक प्रमुख सैन्य संतुलन समाप्त हो गया और इससे ईरानी शिया समूहों को इराक़ में प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिला, जिससे ईरान की क्षेत्रीय पहुँच और बढ़ी।
वर्त्तमान संरेखण और वार्ताएँ
- इज़राइल के साथ रणनीतिक नजदीकी: ईरान के बढ़ते प्रभाव ने ईरान के विरुद्ध सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा दिया, जिससे इज़राइल और खाड़ी के कुछ देशों के बीच सुरक्षा साझेदारी मजबूत हुई और अब्राहम समझौते के तहत सामान्यीकरण समझौतों तक पहुँच प्राप्त हुई।
- विभिन्न रणनीतिक मांगें: पश्चिमी और अरब देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम और प्रॉक्सी गतिविधियों पर नियंत्रण तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य में स्वतंत्र नौवहन चाहते हैं।
- ईरान अपने परमाणु अधिकारों की मान्यता, खाड़ी से अमेरिकी ठिकानों को हटाने, भविष्य के हमलों के विरुद्ध गारंटी, युद्ध के नुकसान के लिए मुआवजा और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर विरोधी निर्णय (वेटो) का अधिकार चाहता है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका की निरंतर केंद्रीय भूमिका: अन्य वैश्विक शक्तियों की मौजूदगी के बावजूद, अमेरिका खाड़ी के राजतंत्रों के लिए प्रमुख सुरक्षा प्रदाता बना हुआ है।
निष्कर्ष
ईरान–अरब खाड़ी प्रतिद्वंद्विता एक संरचनात्मक भू-राजनीतिक संघर्ष है, जो शक्ति असमानता, विचारधारा और बाह्य गठबंधनों से प्रभावित है। इसलिए क्षेत्रीय स्थिरता के लिए पूर्ण समाधान की बजाय संघर्ष प्रबंधन अधिक व्यावहारिक विकल्प है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: मध्य पूर्व में द्विपक्षीय संघर्षों के भारत पर भू‑राजनीतिक प्रभाव की समीक्षा करें।
(10 अंक, 150 शब्द)
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