वैश्विक शांति निर्माता के रूप में भारत

वैश्विक शांति निर्माता के रूप में भारत 6 Mar 2026

संदर्भ

हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए संयुक्त सैन्य हमलों ने पश्चिम एशिया में तनाव को तीव्र रूप से बढ़ा दिया है। इससे व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष की आशंका उत्पन्न हुई है और यह भी उजागर हुआ है कि संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ एकतरफा सैन्य कार्रवाइयों को रोकने में कितनी सीमित भूमिका निभा पा रही हैं।

वैश्विक राजनीति में बदलाव और पूर्व धारणाओं की विफलता

  • “इतिहास के अंत” का भ्रम: वर्ष 1991 में शीत युद्ध के समाप्त होने के बाद यह माना गया कि उदार लोकतंत्र और वैश्विक व्यापार की जीत हो चुकी है। यह भी विश्वास था कि संयुक्त राष्ट्र, WTO और विश्व बैंक जैसी बहुपक्षीय संस्थाएँ विश्व व्यवस्था बनाए रखेंगी।
  • विफल धारणाएँ: यह माना गया था कि आर्थिक परस्पर निर्भरता देशों को युद्ध करने से रोकेगी, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्थाएँ एक-दूसरे के साथ अत्यधिक एकीकृत (जुड़ी हुई) हैं।
  • वर्त्तमान वास्तविकता: ये धारणाएँ अब ध्वस्त हो चुकी हैं।
    • वैश्विक स्तर पर निवारक संकेत (दूसरों को रोकने के लिए शक्ति दिखाना) देने से हटकर अब सीधी, समन्वित सैन्य कार्रवाई की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। उदाहरण: इज़राइल, अमेरिका और ईरान से जुड़े सैन्य हमले।
    • तीसरे विश्व युद्ध का खतरा अब एक वास्तविक संभावना माना जाने लगा है।

महान शक्ति की वापसी

  • नियमों पर शक्ति का वर्चस्व: आधुनिक कूटनीति ने कूटनीति से हटकर शक्ति पर अधिक निर्भरता की दिशा में रुख कर लिया है।
    • देश अब अंतरराष्ट्रीय नियमों या संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप की प्रतीक्षा नहीं करते; इसके बजाय, वे अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रतिबंध, सैन्य हमले और रणनीतिक गठबंधन का उपयोग कर रहे हैं।
  • वैश्विक उदाहरण: इस बात का स्पष्ट उदाहरण सेमीकंडक्टर चिप्स को लेकर अमेरिका और चीन के व्यापार व तकनीकी युद्ध में, वेनेज़ुएला में अमेरिका का हस्तक्षेप, और क्यूबा पर भारी प्रतिबंधों में दिखाई देता है।
  • संरचनात्मक असंतुलन: अमेरिका के नेतृत्व वाले एकध्रुवीय क्रम से अमेरिका (स्थापित शक्ति) और चीन (संशोधनवादी शक्ति) के बीच रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता में संक्रमण ने वैश्विक राजनीति में महान शक्तियों की प्रतिस्पर्धा को तीव्र कर दिया है।
  • जीवित रहने और सुरक्षा की प्रधानता: इस प्रतिद्वंद्विता में अनुभव किए गए अस्तित्वगत खतरे राज्यों को राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जीवित रहने को अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और नियमों के कड़ाई से पालन से ऊपर प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र की अक्षमता

  • पुराना संस्थागत ढाँचा: संयुक्त राष्ट्र की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उस समय की शक्ति-संतुलन को ध्यान में रखकर की गई थी, जब ब्रिटेन, फ्रांस और सोवियत संघ जैसी शक्तियाँ प्रमुख थीं।
  • सुरक्षा परिषद की निष्क्रियता: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) अक्सर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पाती है, क्योंकि स्थायी सदस्य अपने हितों के टकराव की स्थिति में वीटो शक्ति का उपयोग करते हैं।
  • बल प्रयोग का सामान्यीकरण: अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था उस क्रम की ओर विकसित हो रही है जहाँ सैन्य शक्ति, प्रतिबंध और रणनीतिक दबाव राज्यकला के सामान्यीकृत उपकरणों के रूप में लगातार अधिक स्वीकार्य होते जा रहे हैं।

वैश्विक शांति निर्माता के रूप में भारत की स्थिति

  • रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-संरेखण: भारत प्रतिस्पर्धी समूहों के बीच संतुलित संबंध बनाए रखता है, BRICS और क्वाड(Quad) जैसे समूहों में भाग लेते हुए अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता को संरक्षित करता है।
  • प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के बीच विश्वसनीयता: भारत एक ओर अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग बनाए रखता है, तो दूसरी ओर रूस के साथ अपने ऊर्जा संबंध जारी रखता है। यह उसकी कूटनीतिक लचीलापन दर्शाता है।
  • वैश्विक दक्षिण और विकसित विश्व के बीच सेतु: भारत विकासशील देशों के बीच विश्वसनीयता और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के साथ रचनात्मक साझेदारी का आनंद उठाता है, जिससे यह संवाद को सुगम बनाने में सक्षम हो पता है।

शांति स्थापित करने के लिए भारत की संभावित रणनीतियाँ

  • ट्रैक-1 कूटनीति: सरकार-से-सरकार स्तर पर आधिकारिक वार्ताएँ, जिनमें मंत्री, राजनयिक और राज्य प्रतिनिधि शामिल होते हैं, ताकि संघर्ष प्रबंधन और सहमति निर्माण हो सके।
  • ट्रैक-1.5 कूटनीति: सरकारी अधिकारियों के साथ-साथ विशेषज्ञों, थिंक टैंक और नीति विशेषज्ञों की भागीदारी वाली मिश्रित वार्त्ता, जिससे लचीले नीति विचार और अनौपचारिक सहमति विकसित की जा सके।
  • ट्रैक-2 कूटनीति: गैर-सरकारी व्यक्तियों के बीच अनौपचारिक संवाद, जिसका उद्देश्य विश्वास निर्माण, समाधान की खोज और संघर्षरत पक्षों के बीच तनाव को कम करना होता है।
  • विशेष दूतों की नियुक्ति: संघर्ष क्षेत्रों में समर्पित विशेष दूतों की नियुक्ति ताकि संचार चैनलों को बनाए रखा जा सके, गलत आकलन को कम किया जा सके और प्रतिद्वंद्वी पक्षों के बीच संवाद को सुगम बनाया जा सके।

एशिया और विश्व पर प्रभाव 

  • आर्थिक स्थिरता: एशिया की आर्थिक वृद्धि, क्षेत्रीय संपर्क और गरीबी उन्मूलन एक स्थिर वैश्विक वातावरण पर निर्भर करते हैं।
  • आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान: मुख्य शक्तियों के बीच बढ़ते संघर्ष वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर सकते हैं और मुद्रास्फीति को बढ़ावा दे सकते हैं।
  • नागरिकों पर प्रभाव: भोजन और ईंधन की बढ़ती कीमतें आम नागरिकों, विशेषकर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर असमान रूप से प्रभाव डालती हैं।
  • वैश्विक अस्थिरता का जोखिम: तीव्र होती भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताएँ विश्व को लंबी अवधि की अस्थिरता की ओर धकेल सकती हैं।

निष्कर्ष

जब वैश्विक राजनीति में शक्ति-राजनीति पुन: प्रमुख हो रही है, तब प्रतिस्पर्धा को संवाद और संयम के माध्यम से प्रबंधित करना आवश्यक है। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता उसे वैश्विक स्तर पर संवाद और स्थिरता को बढ़ावा देने वाला एक विश्वसनीय मध्यस्थ बनाती है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: हाल की घटनाएँ, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और ईरान शामिल हैं, वैश्विक राजनीति में एक व्यापक बदलाव को दर्शाती हैं जहाँ कठोर शक्ति अंतरराष्ट्रीय संबंधों को तेजी से आकार दे रही है। चर्चा कीजिए कि यह प्रवृत्ति बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रभावशीलता को कैसे चुनौती देती है। साथ ही, भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति के संदर्भ में ऐसी भू-राजनीतिक तनावों को प्रबंधित करने में क्या भूमिका निभा सकता है, इसका विश्लेषण कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

 

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