संदर्भ:
गांधीवादी विचारक ओ.पी. शाह के नेतृत्व में प्रतिष्ठित नागरिकों के एक समूह द्वारा दोनों सरकारों से राजनयिक जुड़ाव पुनः शुरू करने का आग्रह करने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता फिर से शुरू करने पर चर्चा पुनः आरंभ हो गई है। हालाँकि वार्ता क्षेत्रीय शांति और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन भारत का पुराना दृष्टिकोण यही है कि “आतंक और वार्ता एक साथ नहीं कार्य कर सकते।”
पृष्ठभूमि
- पठानकोट एयर बेस हमले (2016) के बाद से द्विपक्षीय वार्ता निलंबित है।
- भारत ने बार-बार सीमापार से होने वाले आतंकवादी हमलों का सामना किया है, जिनमें शामिल हैं:
- उरी हमला (2016)
- पुलवामा हमला (2019)
- पहलगाम हमला (2025)
- भारत का मानना है, कि पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित सीमापार आतंकवाद सामान्य द्विपक्षीय संबंधों में मुख्य बाधा है।
वार्ता पुनः आरंभ करने के पक्ष में तर्क
क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बढ़ावा देना
- राजनयिक जुड़ाव दो परमाणु-सशस्त्र पड़ोसियों के मध्य सैन्य संघर्ष के जोखिम को कम करता है।
- निरंतर संचार संकट प्रबंधन और विश्वास निर्माण में मदद करता है।
व्यापार और आर्थिक सहयोग का विस्तार
- बेहतर द्विपक्षीय संबंधों से प्रत्यक्ष व्यापार आसान होगा, जिससे परिवहन लागत और तीसरे देश के मार्गों पर निर्भरता कम होगी।
- बढ़ते व्यापार से विशेष रूप से पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्यों को लाभ होगा और क्षेत्रीय संपर्क में सुधार होगा।
पर्यटन और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा देना
- बेहतर संबंध धार्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और शैक्षिक सहयोग को पुनर्जीवित कर सकते हैं।
- अधिक वार्ता से दीर्घकाल में आपसी अविश्वास को कम करने में मदद मिलेगी।
क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाना
- बेहतर संबंधों से भूमि मार्गों के माध्यम से अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की पहुँच में सुधार होगा।
- बेहतर संपर्क क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण को मजबूत करेगा।
मतभेदों को सुलझाने के लिए कूटनीति का उपयोग
- वार्ता तनाव में वृद्धि की बजाय विवादों पर शांतिपूर्वक चर्चा करने के लिए एक संस्थागत तंत्र प्रदान करती है।
तत्काल वार्ता के खिलाफ तर्क
निरंतर सीमा पार आतंकवाद
- भारत को पाकिस्तान स्थित समूहों से उत्पन्न होने वाले आतंकवादी हमलों का सामना करना जारी है।
- आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई के बिना कोई भी बातचीत भारत की सुरक्षा चिंताओं को कमजोर कर सकती है।
पाकिस्तान की सेना का प्रभुत्व
- पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान देश की विदेश और सुरक्षा नीतियों पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालता रहता है।
- जब तक सेना वास्तविक रूप से संबंधों को सामान्य बनाने का समर्थन नहीं करती, तब तक स्थायी शांति कठिन बनी रहेगी।
विश्वास की कमी
- कई पूर्व शांति पहलों के तुरंत बाद बड़े आतंकवादी हमले हुए, जिससे जनता और राजनीतिक विश्वास कम हुआ।
- हिंसा की पुनरावृत्ति ने विश्वास की एक बड़ी कमी उत्पन्न कर दी है।
घरेलू राजनीतिक चिंताएँ
- वार्ता की पुनः शुरुआत, कोई भी भविष्य का आतंकवादी हमला भारत के लोकतांत्रिक नेतृत्व पर भारी राजनीतिक नुकसान डाल सकता है।
- जनता की राय आतंकवाद के खिलाफ कठोर जवाब के पक्ष में है।
शांति के ऐतिहासिक प्रयास
| पहल |
परिणाम |
| सिंधु जल संधि (1960) |
द्विपक्षीय तनाव के बावजूद जारी है। |
| शिमला समझौता (1972) |
विवाद समाधान के लिए द्विपक्षीय ढांचा स्थापित किया। |
| लाहौर घोषणा (1999) |
इसके तुरंत बाद कारगिल संघर्ष हुआ, जिससे विश्वास कमजोर हुआ। |
| प्रधानमंत्री वाजपेयी की लाहौर बस कूटनीति |
शांति पहल पर बाद की शत्रुता भारी पड़ी। |
| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाहौर यात्रा (2015) |
पठानकोट और उरी हमलों के बाद संबंधों में गिरावट आई। |
ट्रैक-II कूटनीति की भूमिका
यह क्या है?
- ट्रैक-II कूटनीति का तात्पर्य सेवानिवृत्त राजनयिकों, शिक्षाविदों, नीति विशेषज्ञों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के बीच अनौपचारिक वार्ता से है। यह भविष्य की वार्ताओं के लिए अनुकूल परिदृश्य निर्मित कर आधिकारिक कूटनीति का पूरक बनती है।
महत्त्व
- यह औपचारिक राजनयिक चैनल निलंबित होने पर भी संचार बनाए रखने में मदद करती है। यह विश्वास निर्माण और विचारों के आदान-प्रदान में योगदान देती है।
क्षेत्र जहाँ सहयोग संभव है
जलवायु परिवर्तन
- दोनों देशों को लू (हीटवेव), बाढ़, सूखे और ग्लेशियर पिघलने से बढ़ते जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।
- संयुक्त वैज्ञानिक सहयोग जलवायु के प्रति अनुकूलन में सुधार कर सकता है।
वायु प्रदूषण
- शीत ऋतु के दौरान मौसमी सीमा पार वायु प्रदूषण सीमा के दोनों ओर की आबादी को प्रभावित करता है।
- निगरानी और शमन पर सहयोग से पारस्परिक लाभ हो सकते हैं।
जल और पर्यावरणीय सुरक्षा
- भारत और पाकिस्तान कई नदी प्रणालियों को साझा करते हैं।
- जल संरक्षण, बाढ़ के पूर्वानुमान और भूजल प्रबंधन पर सहयोगात्मक प्रयास भविष्य के संघर्षों को कम कर सकते हैं।
आपदा प्रबंधन
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, आपदा प्रतिक्रिया और मानवीय सहायता के लिए संयुक्त तंत्र प्राकृतिक आपदाओं के दौरान जीवन बचा सकते हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य सहयोग
- महामारी और बीमारियों के प्रकोप के दौरान सहयोग क्षेत्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकता है।
ये मुद्दे गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों का भाग हैं, जहाँ सहयोग राजनीतिक रूप से कम विवादास्पद है और धीरे-धीरे विश्वास का निर्माण कर सकता है।
सार्थक वार्ता के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ
- सीमा पार आतंकवाद सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।
- शांति पहलों के बार-बार उल्लंघन के कारण गहरा विश्वास घाटा बना हुआ है।
- पाकिस्तान की नीति निर्माण में सैन्य प्रभाव निरंतर राजनयिक संबंधों को जटिल बनाता है।
- दोनों देशों में घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलता राजनयिक लचीलेपन को सीमित करती है।
- चीन-पाकिस्तान रणनीतिक सहयोग भारत की सुरक्षा चिंताओं में एक और आयाम जोड़ता है।
आगे की राह
- पाकिस्तान से कार्य कर रहे आतंकवादी संगठनों के खिलाफ ठोस और सत्यापन योग्य कार्रवाई होनी आवश्यक है।
- भारत को यह दृष्टिकोण बनाए रखना चाहिए, कि जब तक ठोस प्रगति दिखाई न दे, तब तक आतंकवाद तथा वार्ता एक साथ नहीं चल सकते।
- आधिकारिक जुड़ाव न होने की अवधि के दौरान संचार के माध्यमों को बनाए रखने के लिए ट्रैक-II कूटनीति को सक्रिय रहना चाहिए।
- जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग शुरू होना चाहिए।
- मानवीय आदान-प्रदान, धार्मिक तीर्थयात्राओं और कैदियों की वतन वापसी के माध्यम से विश्वास बहाली के उपायों को मजबूत किया जाना चाहिए।
- क्षेत्रीय शांति प्रयास शिमला समझौते (1972) और लाहौर घोषणा (1999) के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होने चाहिए।
निष्कर्ष
दक्षिण एशिया में शांति और समृद्धि के लिए भारत तथा पाकिस्तान के बीच एक स्थिर संबंध आवश्यक है। हालाँकि, स्थायी वार्ता के लिए आतंकवाद तथा हिंसा से मुक्त परिदृश्य की आवश्यकता होती है। वर्तमान परिस्थितियों में व्यापक वार्ता कठिन है, लेकिन गैर-पारंपरिक सुरक्षा मुद्दों पर सहयोग तथा निरंतर ट्रैक-II जुड़ाव संचार बनाए रखने और धीरे-धीरे विश्वास बहाल करने में सहायता कर सकता है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत और पाकिस्तान के बीच विद्यमान द्विपक्षीय संबंधों के संदर्भ में, गैर-क्षेत्रीय मुद्दों पर ‘व्यावहारिक संवाद’ की व्यवहार्यता का मूल्यांकन कीजिए। क्या ट्रैक-II कूटनीति स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकती है, व्याख्या कीजिए?
(15 अंक, 250 शब्द)
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