संदर्भ:
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के गैर-स्थायी सदस्यों के लिए जून 2026 के चुनावों के बाद सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा पुनः चर्चा में आ गया है, जहाँ ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल ने सीटें प्राप्त कीं, जबकि जर्मनी निर्वाचित होने में विफल रहा।
- इस परिणाम ने मौजूदा सुरक्षा परिषद संरचना की विश्वसनीयता, प्रतिनिधित्व और वैधता पर चर्चा को पुनः आरंभ कर दिया है, साथ ही स्थायी सदस्यता के लिए भारत की माँग को भी मजबूत किया है।
सुरक्षा परिषद सुधार क्यों आवश्यक है?
प्रतिनिधि संरचना का अभाव
- सुरक्षा परिषद 1945 की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को दर्शाता है, न कि वर्तमान के बहुध्रुवीय विश्व को।
- विश्व की आबादी में एक बड़ा हिस्सा होने के बावजूद अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया का कोई स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं है।
- विकासशील देशों का तर्क है, कि परिषद में लोकतांत्रिक वैधता की कमी है।
प्रभावशीलता में कमी
- वीटो पावर के बार-बार उपयोग ने परिषद को बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देने से रोका है।
- यूक्रेन और गाजा जैसे संघर्षों में निर्णायक कार्रवाई करने में असमर्थता ने सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता को कमजोर किया है।
उभरती शक्तियों का उदय
- भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान जैसे देश वैश्विक शांति, आर्थिक विकास तथा बहुपक्षीय शासन में प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभरे हैं।
- वर्तमान संरचना अब वैश्विक शक्ति के बदलते संतुलन को नहीं दर्शाती है।
स्थायी सदस्यता के लिए भारत का दावा
सबसे बड़ा लोकतंत्र
- भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, और मानवता के लगभग छठे हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।
- इसको शामिल करने से सुरक्षा परिषद की लोकतांत्रिक वैधता में सुधार होगा।
संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में प्रमुख योगदानकर्ता
- भारत संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सबसे बड़े सैनिक योगदानकर्ताओं में से एक रहा है।
- भारतीय शांति सैनिकों ने विश्व भर के कई संघर्ष क्षेत्रों में सेवा की है।
आर्थिक शक्ति का विस्तार
- भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में उभरा है, तथा वैश्विक व्यापार, प्रौद्योगिकी तथा सतत विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उत्तरदायी वैश्विक शक्ति
- भारत रणनीतिक स्वायत्तता की नीति का पालन करता है, शांतिपूर्ण विवाद समाधान को बढ़ावा देता है और वैश्विक दक्षिण के हितों का सक्रिय रूप से समर्थन करता है।
वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) का नेतृत्व
- वॉइस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट जैसी पहलों के माध्यम से, भारत ने स्वयं को विकासशील देशों के समर्थक के रूप में स्थापित किया है।
आगामी सुरक्षा परिषद चुनावों में भारत की क्षमता
वैश्विक दक्षिण से व्यापक समर्थन
- अपने विकास सहयोग और क्षमता निर्माण पहलों के कारण भारत को विकासशील देशों के बीच व्यापक सद्भावना प्राप्त हुई है।
- इस समर्थन ने भारत को 2020 के चुनाव में एक गैर-स्थायी सीट के लिए निर्विरोध जीत हासिल करने में मदद की थी।
पश्चिम एशियाई देशों के साथ बेहतर संबंध
- भारत खाड़ी देशों के साथ संतुलित राजनयिक संबंध बनाए रखता है, जो इसकी चुनावी संभावनाओं को मजबूत करता है।
राजनयिक पूँजी का विस्तार
- जी20, ब्रिक्स, क्वाड और वॉइस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट जैसे मंचों में भारत की सक्रिय भागीदारी ने उसकी अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता को बढ़ाया है।
भारत के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ
संतुलित पश्चिम एशिया नीति की आवश्यकता
- भारत को इजराइल-फिलीस्तीन संघर्ष के प्रति संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखना चाहिए।
- किसी एक पक्ष के साथ अत्यधिक झुकाव की धारणा, संयुक्त राष्ट्र चुनावों के दौरान मुस्लिम-बहुसंख्यक देशों और वैश्विक दक्षिण से प्राप्त होने वाले समर्थन को कम कर सकती है।
चीन का विरोध
- चीन स्थायी सदस्यता के विस्तार का विरोध करता है।
- रणनीतिक और भू-राजनीतिक कारणों से वह भारत की उम्मीदवारी का समर्थन करने से मना करता है।
पाकिस्तान का राजनयिक विरोध
- पाकिस्तान लगातार स्थायी सदस्यता के लिए भारत के दावे के खिलाफ अभियान चलाता है।
- वह भारत की उम्मीदवारी का विरोध करने के लिए क्षेत्रीय विवादों जैसे मुद्दों को उठाता है।
संस्थागत गतिरोध
- अंतर-सरकारी वार्ता प्रक्रिया में बहुत कम प्रगति देखी गई है, क्योंकि सुधार के मॉडल को लेकर सदस्य देश विभाजित हैं।
सदस्य देशों के मध्य आम सहमति का अभाव
- अलग-अलग क्षेत्र इस बात पर असहमत हैं, कि स्थायी सदस्य के रूप में उनका प्रतिनिधित्व कौन करे।
- उदाहरण के लिए, अफ्रीकी देश स्थायी प्रतिनिधित्व का समर्थन करते हैं लेकिन इस बात पर असहमत हैं कि कौन से देश उन सीटों पर बैठेंगे।
G4 समूह
| सदस्य |
स्थायी सीट के लिए कारण |
प्रमुख विरोधी देश |
| भारत |
सबसे बड़ा लोकतंत्र और उभरती वैश्विक शक्ति |
पाकिस्तान |
| जापान |
प्रमुख आर्थिक शक्ति और संयुक्त राष्ट्र योगदानकर्ता |
चीन / कोरिया गणराज्य |
| जर्मनी |
यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था |
इटली |
| ब्राजील |
लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा देश |
मेक्सिको |
जी4 का उद्देश्य
भारत, जापान, जर्मनी तथा ब्राजील संयुक्त रूप से सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के विस्तार का समर्थन करता है।
कॉफी क्लब (एकीकरण के लिए सहमति समूह)
यह क्या है?
कॉफी क्लब, जिसे एकीकरण के लिए सहमति समूह के रूप में भी जाना जाता है, नए स्थायी सीटों के निर्माण का विरोध करता है। इसके बजाय, यह गैर-स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने का समर्थन करता है।
उद्देश्य
यह क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों को स्थायी सदस्य बनने से रोकना चाहता है।
L.69 समूह
परिचय
L.69 समूह सुरक्षा परिषद के व्यापक सुधार का समर्थन करने वाले 40 से अधिक विकासशील देशों का एक गठबंधन है।
भारत के लिए महत्त्व
यह समूह स्थायी और गैर-स्थायी दोनों तरह की सदस्यता के विस्तार का पुरजोर समर्थन करता है। भारत इस मंच का उपयोग सुधारों के लिए व्यापक समर्थन जुटाने और वार्ताओं में मौजूदा गतिरोध को कम करने के लिए कर सकता है।
अंतर-सरकारी वार्ता (IGN)
यह क्या है?
अंतर-सरकारी वार्ता संयुक्त राष्ट्र की वह प्रक्रिया है, जो सुरक्षा परिषद के सुधारों पर चर्चा करने के लिए उत्तरदायी है।
वर्तमान स्थिति
सदस्य देशों के बीच निम्नलिखित विषयों पर असहमति के कारण यह प्रक्रिया कई वर्षों से ठप पड़ी है:
- स्थायी सीटों का विस्तार
- वीटो शक्तियाँ
- क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व
- सुरक्षा परिषद का आकार
क्या भारत को जी4 के साथ बने रहना चाहिए?
पक्ष में तर्क
- जी4 सुधार के लिए एक संयुक्त माँग प्रस्तुत करता है।
- सामूहिक कूटनीति अधिक अंतरराष्ट्रीय दृश्यता उत्पन्न करती है।
- यह समूह विश्व के चार प्रमुख क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है।
विपक्ष में तर्क
- भारत की उम्मीदवारी जापान, जर्मनी और ब्राजील द्वारा सामना किए जाने वाले विरोध से जुड़ जाती है।
- जापान के प्रति चीन का विरोध और जर्मनी के प्रति यूरोपीय देशों का विरोध अप्रत्यक्ष रूप से भारत की संभावनाओं को प्रभावित करता है।
- कुछ विश्लेषकों का तर्क है, कि भारत की स्वतंत्र उम्मीदवारी को सामूहिक अभियान की तुलना में अधिक व्यापक समर्थन प्राप्त हो सकता है।
आगे की राह
- भारत को विकास साझेदारी और दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से वैश्विक दक्षिण के मध्य समर्थन बढ़ाना जारी रखना चाहिए।
- भारत को अपनी राजनयिक विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए, पश्चिम एशिया में एक संतुलित विदेश नीति बनाए रखनी चाहिए।
- भारत को सुरक्षा परिषद में सार्थक सुधार के लिए L.69 समूह को सक्रिय रूप से लामबंद करना चाहिए।
- भारत को अनिश्चितकालीन देरी को रोकने के लिए, अंतर-सरकारी वार्ता प्रक्रिया के भीतर समयबद्ध वार्ता का समर्थन करना चाहिए।
- भारत को सुधारों के लिए, समर्थन बढ़ाने के लिए अफ्रीकी, लैटिन अमेरिकी और छोटे द्वीप विकासशील देशों के साथ साझेदारी मजबूत करनी चाहिए।
- भारत को शांति स्थापना, जलवायु कार्रवाई, मानवीय सहायता और बहुपक्षीय कूटनीति के माध्यम से स्वयं को एक उत्तरदायी वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना जारी रखना चाहिए।
निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद केवल तभी प्रासंगिक रह सकता है, जब वह समकालीन भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करे। भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति, लोकतांत्रिक साख, बहुपक्षवाद के प्रति प्रतिबद्धता और वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व उसे स्थायी सदस्यता के लिए एक मजबूत उम्मीदवार बनाते हैं। एक अधिक प्रतिनिधि और समावेशी सुरक्षा परिषद इक्कीसवीं सदी की वैश्विक चुनौतियों से निपटने में संयुक्त राष्ट्र की वैधता, प्रभावशीलता और विश्वसनीयता को बढ़ाएगा।
| मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: “जी4 समूह के साथ भारत के जुड़ाव से मिलने वाले लाभ कम हो रहे हैं, और यह इसकी सुरक्षा परिषद की आकांक्षाओं में एक बाधा के रूप में कार्य करता है।” बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्यों और वैश्विक मध्यम शक्तियों द्वारा हाल ही में सामना किए गए प्रभावों के आलोक में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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