संदर्भ:
- हाल ही में पश्चिम एशिया के संघर्ष ने वैश्विक तेल बाजारों को गंभीर रूप से बाधित कर दिया है, जिसकी वजह से भारत के लिए एक गंभीर चुनौती उत्पन्न हो गई, जो अपने कच्चे तेल का लगभग 90% आयात करता है।
- इस संवेदनशीलता के बावजूद, भारत ने विवेकपूर्ण ऊर्जा तथा राजनयिक रणनीतियों के माध्यम से कई विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्था की तुलना में इस संकट का अधिक प्रभावी ढंग से प्रबंधन किया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- 1973 का तेल संकट: 1973 के वैश्विक तेल संकट ने उच्च मुद्रास्फीति, देश के तेल आयात मूल्य में वृद्धि और इसके विदेशी मुद्रा भंडार पर अधिक दबाव डालकर भारत को गंभीर रूप से प्रभावित किया था।
- 1991 का भुगतान संतुलन (BoP) संकट: 1991 तक, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार केवल तीन सप्ताह के आयात के वित्तपोषण के लिए पर्याप्त स्तर तक कम हो गया था।
- एक गंभीर बाह्य भुगतान संकट का सामना करते हुए, भारत को अपने सोने के भंडार को गिरवी रखने और आईएमएफ से वित्तीय सहायता प्राप्त करने हेतु बाध्य होना पड़ा, जिससे वृहद आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई।
- वर्तमान पश्चिम एशिया संकट: पश्चिम एशिया के हालिया संघर्ष ने एक बार पुनः वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल दिया, जिसके कारण:
- कच्चे तेल की कीमतें $120 प्रति बैरल से पार हो गई।
- एलपीजी आयात लागत ₹1,600 प्रति सिलेंडर से अधिक हो गई।
- भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण शिपिंग बीमा प्रीमियम में तीव्र गति से वृद्धि हुई।
- एक महत्त्वपूर्ण वैश्विक तेल पारगमन मार्ग, हॉर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से आपूर्ति बाधित हुई।
- इन घटनाक्रमों ने इस बात की चिंता बढ़ा दी थी कि भारत को मुद्रास्फीति में भारी वृद्धि तथा आर्थिक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।
भारत का प्रदर्शन
अन्य देशों की तुलना में, भारत में ईंधन की कीमतों में वृद्धि अपेक्षाकृत मध्यम रही।
पेट्रोल की कीमतों में अनुमानित वृद्धि:
| देश |
वृद्धि |
| म्यांमार |
90% |
| पाकिस्तान |
50% |
| फिलीपींस |
50% |
| अमेरिका |
45% |
| ब्रिटेन |
19% |
| जर्मनी |
14% |
| भारत |
7.5% |
डीजल की कीमतों में लगभग 8% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि घरेलू एलपीजी की कीमतें तुलनात्मक रूप से स्थिर बनी रहीं।
भारत के बेहतर प्रदर्शन के पीछे की मुख्य वजहें क्या थीं ?
- मजबूत राजनयिक संबंध: भारत की संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति ने इसे ईरान, सऊदी अरब, यूएई और अन्य खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखने में सक्षम बनाया।
- इन राजनयिक संबंधों ने संकटकाल के दौरान भी कच्चे तेल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने में रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण भूमिका को उजागर करता है।
- तेल आयात का विविधीकरण: खाड़ी क्षेत्र के देशों पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए, भारत ने रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, नाइजीरिया, अंगोला, ब्राजील और वेनेजुएला से तेल खरीद में वृद्धि कर अपने कच्चे तेल के आयात में विविधता लाई।
- इस विविध सोर्सिंग रणनीति ने आपूर्ति व्यवधानों को न्यूनतम किया, तथा भारत की ऊर्जा आपूर्ति शृंखला में सरलता को बढ़ाया।
- इथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम (EBP): भारत के इथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम ने ईंधन के साथ इथेनॉल को मिलाकर पारंपरिक पेट्रोल की खपत को कम किया।
- इसने आयातित कच्चे तेल पर देश की निर्भरता को कम करने तथा तेल आयात बिल को घटाने और स्वच्छ ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देते हुए अधिक ऊर्जा सुरक्षा में योगदान दिया।
- अक्षय ऊर्जा का विस्तार: सौर और पवन ऊर्जा के तीव्र विस्तार ने जीवाश्म ईंधन पर भारत की निर्भरता को कम किया तथा ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाई।
- बढ़ी हुई अक्षय ऊर्जा क्षमता ने दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया और वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव के लिए प्रतिरोधक क्षमता में सुधार किया।
- सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR): विशाखापत्तनम, मंगलौर और पादुर में भारत के सामरिक पेट्रोलियम भंडार ने आपूर्ति व्यवधानों के दौरान एक रणनीतिक बफर के रूप में कार्य किया।
- इन आपातकालीन भंडारों ने भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में कच्चे तेल की उपलब्धता सुनिश्चित की तथा बाह्य ऊर्जा प्रभावों के लिए देश की तैयारियों का विस्तार किया।
संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण
संकट प्रबंधन के लिए कई संस्थाओं ने आपस में मिलकर कार्य किया:
| संस्थान |
भूमिका |
| विदेश मंत्रालय |
खाड़ी देशों और ईरान के साथ राजनयिक संबंध |
| पेट्रोलियम मंत्रालय |
कच्चे तेल के वैकल्पिक स्रोतों की व्यवस्था करना |
| तेल विपणन कंपनियाँ |
घरेलू ईंधन की कीमतों में वृद्धि को सीमित करने के लिए हानि स्वयं वहन की |
| पतन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय |
रसद (लॉजिस्टिक्स) और वैकल्पिक शिपिंग मार्गों का प्रबंधन किया |
| भारतीय नौसेना |
वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा की |
| राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद |
जोखिम की निगरानी और रणनीतिक समन्वय |
मुख्य निष्कर्ष
- ऊर्जा सुरक्षा के लिए मजबूत कूटनीति की आवश्यकता है: ऊर्जा सुरक्षा केवल घरेलू उत्पादन से निर्धारित नहीं होती बल्कि प्रभावी राजनयिक जुड़ाव से भी तय होती है।
- भू-राजनीतिक संकटों के दौरान निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए मुख्य ऊर्जा उत्पादक देशों के साथ स्थिर संबंध बनाए रखना आवश्यक है।
- विविधीकरण ऊर्जा अनुकूलन को बढ़ाता है: कच्चे तेल के आयात में विविधीकरण करके किसी एक क्षेत्र या आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता कम करने से, भू-राजनीतिक संघर्षों, आपूर्ति व्यवधानों और कीमतों की अस्थिरता का प्रभाव न्यूनतम होता है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो जाती है।
- रणनीतिक ऊर्जा बफर का निर्माण: सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) का विस्तार करना और सौर एवं पवन जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाने में तेजी लाना बाह्य ऊर्जा तनावों के खिलाफ भारत की स्थिति में सुधार कर सकता है, और आयातित जीवाश्म ईंधन पर दीर्घकालिक निर्भरता को कम कर सकता है।
- संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण: बाह्य संकटों के प्रभावी प्रबंधन के लिए मंत्रालयों, ऊर्जा कंपनियों, सुरक्षा एजेंसियों और राजनयिक संस्थानों के मध्य कठोर समन्वय की आवश्यकता होती है।
- एक समन्वित शासन ढाँचा समय पर निर्णय लेने, कुशल संसाधन आवंटन और बेहतर संकट प्रतिक्रिया को सक्षम बनाता है।
- बहु-संरेखित (Multi-alignment) वाली विदेश नीति: भारत को सभी प्रमुख क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के साथ रचनात्मक संबंध को बनाए रखने और अपनी बहु-संरेखण की नीति को जारी रखनी चाहिए।
- ध्यातव्य है कि एक संतुलित विदेश नीति अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक, आर्थिक और ऊर्जा हितों की रक्षा करती है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भू-राजनीतिक संकट के दौरान रणनीतिक साझेदारियाँ ऊर्जा सुरक्षा के एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ के रूप में कार्य कर सकती हैं। पश्चिम एशिया और अन्य ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं के साथ भारत के संबंधों के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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