संदर्भ
हाल ही में भारत सरकार ने देश के सेमीकंडक्टर उद्योग को सुदृढ़ करने के लिए भारत सेमीकंडक्टर मिशन के दूसरे चरण को पहले की तुलना में अधिक वित्तीय आवंटन के साथ स्वीकृति प्रदान की है।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य भारत में सेमीकंडक्टर चिप के आयात पर भारत की निर्भरता को कम करना, तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना तथा बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के मध्य भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
सेमीकंडक्टर क्या हैं?
- सेमीकंडक्टर ऐसे पदार्थ होते हैं जिनकी विद्युत चालकता चालक और कुचालक के मध्य होती है। इन्हीं से समेकित परिपथ (चिप) का निर्माण किया जाता है।
- इन्हें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का “मस्तिष्क” माना जाता है। इनका उपयोग स्मार्टफ़ोन, कंप्यूटर, मोटर वाहन, रक्षा उपकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों तथा संचार नेटवर्क सहित अनेक क्षेत्रों में किया जाता है।
सेमीकंडक्टर मिशन क्यों आवश्यक है?
वैश्विक आपूर्ति शृंखला का बढ़ता जोखिम
- वैश्विक सेमीकंडक्टर विनिर्माण का 60 प्रतिशत से अधिक तथा उन्नत सेमीकंडक्टर चिपों का लगभग 90 प्रतिशत उत्पादन ताइवान में किया जाता है।
- ताइवान जलडमरूमध्य में किसी भी भू-राजनीतिक संघर्ष से वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।
महत्त्व
- सेमीकंडक्टर अब केवल व्यावसायिक उत्पाद नहीं रह गए हैं, बल्कि आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा तकनीकी संप्रभुता के लिए एक सामरिक महत्त्व की संपत्ति बन चुके हैं।
- बाह्य देशों पर निर्भरता को कम करने के लिए विश्व के अनेक देश घरेलू सेमीकंडक्टर विनिर्माण के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे हैं।
भारत सेमीकंडक्टर मिशन
उद्देश्य
- भारत में समग्र सेमीकंडक्टर विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र की स्थापना करना।
- चिप निर्माण संयंत्र, चिप पैकेजिंग, चिप डिजाइन, परीक्षण तथा अनुसंधान को प्रोत्साहित करना।
- वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला में भारत की भागीदारी को सुदृढ़ बनाना।
भारत सेमीकंडक्टर मिशन : चरण–2
बढ़ी हुई वित्तीय प्रतिबद्धता
- सरकार ने दूसरे चरण के लिए लगभग 1.27 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।
- यह पहले चरण के 76,000 करोड़ रुपये की तुलना में काफी अधिक है।
- यह निवेश वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी सेमीकंडक्टर उद्योग विकसित करने की सरकार की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
प्रमुख विशेषताएँ
पूँजीगत सहायता में कमी
- पहले चरण में सरकार द्वारा परियोजना लागत का 50 प्रतिशत तक पूँजीगत सहायता प्रदान किया जाता था।
- दूसरे चरण में पूँजीगत सहायता अपेक्षाकृत कम होगी।
- इसके स्थान पर विभिन्न प्रकार के प्रोत्साहनों का दायरा बढ़ाया गया है।
उत्पादन आधारित प्रोत्साहन
- कंपनियों को उनके वास्तविक सेमीकंडक्टर उत्पादन एवं बिक्री के आधार पर प्रोत्साहन मिलेगा।
- इससे केवल कारखाने स्थापित करने के बजाय व्यावसायिक रूप से सफल उत्पादन को भी बढ़ावा मिलेगा।
स्वदेशी अवयव उपयोग पर अतिरिक्त प्रोत्साहन
- जो कंपनियाँ घरेलू स्तर पर निर्मित अवयवों का उपयोग करेंगी, उन्हें अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलेगा।
- इससे घरेलू आपूर्ति शृंखला मजबूत होगी तथा आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को बढ़ावा मिलेगा।
समग्र पारिस्थितिकी तंत्र का विकास
- यह मिशन केवल चिप निर्माण संयंत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शामिल हैं—
- सेमीकंडक्टर पैकेजिंग
- संयोजन एवं परीक्षण सुविधाएँ
- इलेक्ट्रॉनिक अवयवों का विनिर्माण
- अनुसंधान एवं विकास
- कुशल मानव संसाधन का विकास
प्रथम चरण की प्रगति
- स्वीकृत परियोजनाएँ
- पहले चरण के अंतर्गत कई सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को स्वीकृति प्रदान की गई है।
- गुजरात के धोलेरा में स्थापित टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स–पीएसएमसी चिप निर्माण परियोजना प्रमुख परियोजनाओं में से एक है।
- वर्तमान स्थिति
- निर्माण कार्य प्रारंभ किया जा चुका है।
- हालाँकि अभी तक वाणिज्यिक स्तर पर चिप उत्पादन शुरू नहीं किया गया है।
- सेमीकंडक्टर निर्माण अत्यंत जटिल प्रक्रिया है, जिसे व्यावसायिक उत्पादन तक पहुँचने में कई वर्ष लगते हैं।
पहले चरण के परिणाम आने से पहले दूसरा चरण क्यों शुरू किया गया?
- लंबी परिपक्वता अवधि
- सेमीकंडक्टर निर्माण संयंत्रों को पूर्ण क्षमता से उत्पादन शुरू करने में सामान्यतः 8–10 वर्ष का समय लगता हैं।
- पहले चरण के परिणामों की प्रतीक्षा करने से भारत की रणनीतिक योजनाओं में अनावश्यक विलंब होता।
- रणनीतिक महत्ता
- घरेलू सेमीकंडक्टर विनिर्माण अब केवल औद्योगिक नीति का विषय ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीतिक आवश्यकता बन चुका है।
- आयात पर निर्भरता कम करना आर्थिक लचीलापन और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए आवश्यक है।
सेमीकंडक्टर उद्योग संबंधी चुनौतियाँ
- अत्यधिक पूँजी-प्रधान उद्योग
- इस उद्योग में विशाल वित्तीय निवेश, उन्नत आधारभूत संरचना तथा अत्याधुनिक विनिर्माण तकनीकों की आवश्यकता होती है।
- यह वस्त्र या निर्माण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत कम प्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न करता है।
- तकनीकी निर्भरता
- उन्नत चिप निर्माण तकनीकों के लिए भारत अभी भी विदेशी प्रौद्योगिकियों पर निर्भर है।
- अत्याधुनिक विनिर्माण उपकरणों तक पहुँच सीमित है।
अत्यधिक पराबैंगनी प्रकाश (EUV) आधारित लिथोग्राफी तकनीक का एकाधिकार
- अत्यधिक पराबैंगनी प्रकाश (EUV) आधारित लिथोग्राफी
- इस तकनीक की मशीनों का उपयोग सिलिकॉन वेफर पर नैनोमीटर स्तर के परिपथ अंकित करने के लिए किया जाता है।
- उन्नत सेमीकंडक्टर चिप निर्माण के लिए यह एक अनिवार्य तकनीक है।
- वैश्विक एकाधिकार
- वर्तमान में केवल नीदरलैंड की एक कंपनी ही इस प्रकार की वाणिज्यिक मशीनों का निर्माण करती है।
- जापान जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देश भी अभी तक इसका व्यावसायिक विकल्प विकसित नहीं कर पाए हैं।
- प्रतिभा पलायन
- भारत प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में उच्च प्रशिक्षित इंजीनियर्स तैयार करता है।
- बेहतर अनुसंधान सुविधाओं तथा नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के कारण बड़ी संख्या में प्रतिभाएँ विकसित देशों की ओर पलायन कर जाती हैं।
भारत के लिए इसकी महत्ता
- आर्थिक सुरक्षा: घरेलू सेमीकंडक्टर उत्पादन आयात पर निर्भरता कम करेगा तथा आपूर्ति शृंखला को अधिक सुरक्षित बनाएगा।
- राष्ट्रीय सुरक्षा: स्वदेशी चिप रक्षा उपकरणों, संचार प्रणालियों, उपग्रहों तथा अन्य रणनीतिक प्रौद्योगिकियों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
- तकनीक के नेतृत्वकर्त्ता के रूप में
- सेमीकंडक्टर उद्योग निम्नलिखित उभरते क्षेत्रों को गति प्रदान करेगा—
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता
- पाँचवीं एवं छठी पीढ़ी की दूरसंचार तकनीक
- आईओटी (IoT)
- विद्युत वाहन
- क्वांटम कम्प्यूटिंग
- औद्योगिक विकास: सशक्त सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण तथा उन्नत प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करेगा।
आगे की प्रमुख चुनौतियाँ
- अत्यधिक पूंजीगत निवेश तथा लंबी निवेश-वसूली अवधि।
- विनिर्माण उपकरणों के लिए आयात पर निर्भरता।
- उन्नत लिथोग्राफी जैसी तकनीकों में वैश्विक एकाधिकार।
- कुशल मानव संसाधन तथा उच्च स्तरीय अनुसंधान अवसंरचना की आवश्यकता।
- ताइवान, दक्षिण कोरिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान तथा चीन जैसे देशों से कड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा।
आगे की राह
- सेमीकंडक्टर अनुसंधान तथा स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास में दीर्घकालिक निवेश बढ़ाया जाए।
- चिप निर्माण, अभिकल्पन तथा उन्नत विनिर्माण के लिए सार्वजनिक–निजी साझेदारी को मजबूत किया जाए।
- स्वदेशी लिथोग्राफी सहित अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों का विकास किया जाए।
- उच्च प्रशिक्षित वैज्ञानिकों एवं अभियंताओं को देश में बनाए रखने के लिए विश्वस्तरीय अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया जाए।
- लक्षित प्रोत्साहनों तथा स्थानीय मूल्य संवर्धन के माध्यम से घरेलू सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला को मजबूत किया जाए।
- दक्षिण कोरिया द्वारा अपने राष्ट्रीय उद्योगों को विकसित करने की तर्ज पर भारतीय सेमीकंडक्टर कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने हेतु सहयोग दिया जाए।
- आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाते हुए तकनीकी आत्मनिर्भरता को भी सुदृढ़ किया जाए।
मुख्य परीक्षा आधारित प्रश्न :
प्रश्न : विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारत की उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए उठाए गए कदमों का परीक्षण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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