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भारत–अमेरिका संबंध: रणनीतिक निर्भरता और विदेश नीति की चुनौतियाँ

भारत–अमेरिका संबंध: रणनीतिक निर्भरता और विदेश नीति की चुनौतियाँ 29 May 2026

संदर्भ:

राजनीतिक विश्लेषक प्रताप भानु मेहता का तर्क है कि आज भारत की विदेश नीति हेडलाइट्स की रोशनी में फँसे हिरण की स्थिति” (Deer in Headlights Syndrome) जैसी प्रतीत होती है, जिसमें तेजी से बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण नीति-निर्माता भ्रमित, असमंजसग्रस्त और अनिश्चित दिखाई देते हैं।

चीन पर बढ़ती निर्भरता और विकल्पों का अभाव

इस लेख में उठाया गया मुख्य मुद्दा यह है कि:

  • भारत कई क्षेत्रों में आर्थिक रूप से चीन पर निर्भर बना हुआ है।
  • हालाँकि, भारत को चीन का कोई सुविधाजनक रणनीतिक विकल्प नहीं मिला है।

यद्यपि संयुक्त राज्य अमेरिका को अक्सर भारत के एक रणनीतिक साझेदार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन लेखक का तर्क है कि भारत अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकता, क्योंकि अमेरिकी विदेश नीति मुख्यतः उसके स्वयं के राष्ट्रीय हितों द्वारा संचालित होती है।

भारत की नैतिक विदेश नीति की प्रतिष्ठा में गिरावट

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने दृढ़ता से निम्नलिखित का विरोध किया:

  • उपनिवेशवाद (Colonialism)
  • साम्राज्यवाद (Imperialism)
  • एशिया और अफ्रीका पर पश्चिमी प्रभुत्व

हालाँकि, लेखक का तर्क है कि भारत धीरे-धीरे इस नैतिक स्थिति से दूर होता गया है।

उदाहरण:

  • यूक्रेन पर रूस के हमले पर भारत की चुप्पी।
  • ईरान के विरुद्ध अमेरिका और इज़राइल की कार्रवाइयों पर भारत की सीमित प्रतिक्रिया।

लेखक के अनुसार, इससे विकासशील देशों और साम्राज्यवाद-विरोधी राजनीति की आवाज़ के रूप में भारत की छवि कमजोर हुई है।

रणनीतिक स्वायत्तता बनाम व्यावहारिक निर्भरता

  • भारत आधिकारिक रूप से रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की नीति का पालन करता है, जिसका अर्थ है कि वह किसी बाह्य दबाव के बिना स्वतंत्र रूप से अपनी विदेश नीति संबंधी निर्णय लेता है।

लेकिन लेखक का तर्क है कि:

  • भारत अपनी स्वतंत्रता प्रदर्शित करने के लिए रूस से तेल खरीदता है।
  • किंतु जब अमेरिका द्वारा शुल्क (Tariffs) या अन्य दबाव की संभावना उत्पन्न होती है, तो भारत ऐसे संबंधों को सीमित कर देता है।

इस प्रकार, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता अक्सर पूर्णतः स्वतंत्र होने के बजाय केवल प्रतीकात्मक प्रतीत होती है।

लेखक निम्नलिखित शब्दों का प्रयोग करता है:

आंतरिकीकृत निर्भरता” (Internalized Dependence)

अर्थ:

  • भारत ने मनोवैज्ञानिक रूप से यह स्वीकार कर लिया है कि चीन के विरुद्ध संतुलन स्थापित करने के लिए अमेरिका ही उसका एकमात्र व्यवहार्य प्रतिरोधक है।

लेखक के अनुसार, यह छिपी हुई निर्भरता किसी औपचारिक गठबंधन से भी अधिक खतरनाक हो सकती है।

पाकिस्तान के प्रति अमेरिका का दृष्टिकोण

  • भारत को अपेक्षा थी कि अमेरिका पाकिस्तान को भारत की सुरक्षा चिंताओं के परिप्रेक्ष्य में देखेगा।

हालाँकि:

  • अमेरिका पाकिस्तान के साथ रणनीतिक संबंध बनाए हुए है।
  • ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी अमेरिका ने दक्षिण एशिया में स्वयं को एक मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करना जारी रखा।

लेखक का तर्क है कि:

  • अमेरिका कभी भी भारत की क्षेत्रीय दृष्टि के साथ पूर्णतः सहमत या संरेखित नहीं होगा।
  • अमेरिका भारतीय उपमहाद्वीप में अपना प्रभाव बनाए रखना पसंद करता है।

आर्थिक निष्कर्षणवाद और तकनीकी निर्भरता

लेख का तर्क है कि:

  • अमेरिका भारत के साथ संबंधों को बढ़ती हुई मात्रा में लेन-देन आधारित (Transactional) दृष्टिकोण से देखता है।
  • भारत पर लगाए गए टैरिफ का उद्देश्य अमेरिकी वर्चस्व प्रदर्शित करना था।

लेखक यह भी दावा करते हैं कि:

  • अमेरिका का मानना है कि भारत अभी भी तकनीकी रूप से उस पर निर्भर है।
  • इसलिए अमेरिका स्वयं को वार्ता में अधिक मजबूत सौदेबाजी की स्थिति में देखता है।

निष्कर्षणवादी कूटनीति” (Extractive Diplomacy)

अर्थ:

  • एक ऐसा कूटनीतिक संबंध, जिसमें एक देश वास्तविक रणनीतिक समानता (Genuine Strategic Equality) के बिना दूसरे देश से अधिकतम लाभ प्राप्त करने का प्रयास करता है।

निष्कर्ष

भारत–अमेरिका संबंधों की लेन-देन आधारित प्रकृति: लेखक के अनुसार, पहले भारत–अमेरिका संबंध लोकतंत्र, खुलापन (Openness) और उदारवादी सिद्धांतों (Liberal Principles) जैसे साझा मूल्यों पर आधारित थे। किंतु आज यह संबंध धीरे-धीरे अधिक लेन-देन आधारित (Transactional) और हित-प्रेरित (Interest-Driven) बनता जा रहा है। यह दर्शाता है कि बढ़ते सहयोग के बावजूद दोनों देशों के बीच अभी भी महत्वपूर्ण रणनीतिक मतभेद विद्यमान हैं।

महत्वपूर्ण शब्दावली 

1. भू-राजनीतिक निहिलवाद (Geopolitical Nihilism) – वैश्विक नियमों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और स्थापित व्यवस्थाओं के प्रति अनादर या उपेक्षा की प्रवृत्ति।

2. आंतरिकीकृत निर्भरता (Internalized Dependence) – किसी अन्य देश पर रणनीतिक निर्भरता को मनोवैज्ञानिक रूप से स्वीकार कर लेना।

3. निष्कर्षणवादी कूटनीति (Extractive Diplomacy) – ऐसी कूटनीति जिसका उद्देश्य दूसरे देश से अधिकतम एकतरफा लाभ प्राप्त करना हो, बिना वास्तविक समानता या संतुलित साझेदारी के।

4. “हेडलाइट्स में फँसे हिरण” सिंड्रोम (Deer in Headlights Syndrome) – ऐसी स्थिति जिसमें तेजी से बदलती परिस्थितियों के कारण निर्णयकर्ता भ्रमित हो जाएँ, निर्णय लेने में असमर्थ हों और नीतिगत गतिरोध (Policy Paralysis) उत्पन्न हो जाए।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: “भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की खोज अब अमेरिकी शक्ति पर आंतरिकीकृत निर्भरता के रूप में दिखाई देने लगी है।” हाल के भू-राजनीतिक संकटों तथा भारत की आर्थिक कमजोरियों के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

भारत–अमेरिका संबंध: रणनीतिक निर्भरता और विदेश नीति की चुनौतियाँ

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