संदर्भ:
हाल ही में NEET में अनियमितताओं, प्रश्नपत्र लीक तथा परीक्षा संबंधी कदाचार पर हुई बहसों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था में विद्यमान खामियों को उजागर किया है।
- हालाँकि, वास्तविक और गंभीर चुनौती केवल बेरोज़गारी नहीं, बल्कि रोजगार-अयोग्यता है—अर्थात ऐसी स्थिति जिसमें स्नातक पर्याप्त कौशल, कमजोर अधिगम परिणामों और कमजोर बुनियादी शिक्षा के कारण रोजगार प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं।
प्रमुख शब्दावली
- रोजगार-अयोग्यता: ऐसी स्थिति जिसमें व्यक्ति के पास शैक्षणिक योग्यताएँ तो होती हैं, लेकिन नियोक्ताओं द्वारा अपेक्षित कौशल, दक्षताएँ और ज्ञान का अभाव होता है।
- PISA (अंतर्राष्ट्रीय छात्र मूल्यांकन कार्यक्रम ): यह आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) द्वारा आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय मूल्यांकन परीक्षा है, जो विभिन्न देशों के 15 वर्षीय छात्रों की पठन, गणित और विज्ञान संबंधी दक्षता का आकलन करती है।
- जनसांख्यिकीय लाभांश: कार्यशील आयु वर्ग (15–59 वर्ष) की आबादी का बड़ा हिस्सा होने के कारण प्राप्त होने वाला आर्थिक लाभ जनसांख्यिकीय लाभांश कहलाता है।
- ASER (वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट): यह प्रथम (Pratham) फाउंडेशन द्वारा जारी किया जाने वाला एक वार्षिक सर्वेक्षण है, जो ग्रामीण भारत में छात्रों के अधिगम परिणामों (Learning Outcomes) का आकलन करता है।
भारत का शिक्षा संकट गंभीर चिंता का विषय क्यों है?
- कमजोर शिक्षण परिणाम:
- वास्तविक चुनौती विद्यालयों में नामांकन नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे वास्तव में सीख भी रहे हैं या नहीं।
- कई छात्र बुनियादी पठन, लेखन तथा संख्यात्मक कौशल प्राप्त किए बिना ही अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर लेते हैं।
- कक्षाओं में अभी भी रटकर सीखने की प्रवृत्ति प्रमुख बनी हुई है।
- स्नातकों की कम रोजगार-क्षमता:
- बड़ी संख्या में स्नातकों के पास रोजगार के लिए आवश्यक कौशल नहीं होते।
- डिग्री प्राप्त करना अक्सर वास्तविक ज्ञान और दक्षताओं से अलग हो गया है।
- इससे शिक्षा प्रणाली के उत्पादन और श्रम बाज़ार की आवश्यकताओं के बीच असंगति उत्पन्न होता है।
- जनसांख्यिकीय लाभांश के लिए खतरा
-
- भारत विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में से एक है।
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल के अभाव में जनसांख्यिकीय लाभांश, जनसांख्यिकीय बोझ में बदल सकता है।
- बढ़ती बेरोज़गारी तथा अल्प-रोज़गार सामाजिक अशांति तथा अपराध को बढ़ावा दे सकती हैं।
अधिगम/सीखने की कमी के प्रमाण
- PISA में खराब प्रदर्शन:
- भारत ने वर्ष 2009 में तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश के छात्रों के माध्यम से PISA में भाग लिया था।
- भाग लेने वाले देशों में भारत का स्थान निचले स्तर पर रहा।
- परिणामों ने गणित और विज्ञान में बुनियादी दक्षताओं की कमजोरी को उजागर किया।
- ASER रिपोर्टों के निष्कर्ष:
- उच्च कक्षाओं के अनेक छात्र भी बुनियादी पठन और अंकगणितीय कौशल में कठिनाई का सामना करते हैं।
- कई राज्यों में छात्रों का अधिगम स्तर उनकी कक्षा के अपेक्षित मानकों से काफी नीचे है।
भारत की शिक्षा प्रणाली में विद्यमान संरचनात्मक समस्याएँ
- परीक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण:
- समझ विकसित करने के बजाय याद करने पर अधिक जोर दिया जाता है।
- छात्रों को ज्ञान का अनुप्रयोग करने के बजाय जानकारी दोहराने के लिए पुरस्कृत किया जाता है।
- आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता तथा समस्या-समाधान कौशल पर सीमित ध्यान दिया जाता है।
- कमज़ोर शिक्षक प्रशिक्षण:
- अनेक शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों में गुणवत्ता का अभाव है।
- कई शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम दक्षता-विकास के बजाय केवल प्रमाणपत्र प्राप्ति पर केंद्रित हैं।
- सतत व्यावसायिक विकास पर्याप्त नहीं है।
- कमजोर विद्यालयी अवसंरचना : कई विद्यालयों में निम्न सुविधाओं का अभाव है:
- पुस्तकालय
- प्रयोगशालाएँ
- खेल सुविधाएँ
- सुरक्षित पेयजल
- कार्यशील शौचालय
- शासन एवं जवाबदेही का अभाव:
- शैक्षिक सुधार प्रायः अधिगम परिणामों के बजाय संसाधनों और निवेश पर अधिक केंद्रित रहते हैं।
- कमजोर निगरानी तंत्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने में असफल रहता है।
- अत्यधिक प्रशासनिक नियंत्रण नवाचार और संस्थागत स्वायत्तता को बाधित कर सकता है।
सरकारी स्कूली शिक्षा का विरोधाभास
- अधिक व्यय, कम परिणाम:
- सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों को प्रायः निजी विद्यालयों के शिक्षकों की तुलना में अधिक वेतन मिलता है।
- इसके बावजूद कई सरकारी विद्यालयों में सीखने के परिणाम संतोषजनक नहीं हैं।
- इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल वेतन वृद्धि से शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
उच्च शिक्षा से संबंधित चिंताएँ
- अत्यधिक विनियमन:
- ऐतिहासिक रूप से भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर नौकरशाही नियंत्रण अधिक रहा है।
- अत्यधिक नियमन नवाचार, अनुसंधान और संस्थागत उत्कृष्टता को सीमित कर सकता है।
- अनुसंधान की कमी:
- अग्रणी ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर अपेक्षाकृत कम व्यय करता है।
- विश्वविद्यालय अक्सर शैक्षणिक नवाचार के बजाय नियमों के अनुपालन को प्राथमिकता देते हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का प्रभाव
रोजगार की बदलती प्रकृति:
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) लगातार नियमित और दोहराव वाले कार्यों का स्वचालन कर रही है।
- भविष्य में रोजगारों के लिए निम्नलिखित कौशलों की आवश्यकता होगी:
- आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking)
- रचनात्मकता (Creativity)
- विश्लेषणात्मक कौशल (Analytical Skills)
- संचार क्षमता (Communication Skills)
- अनुकूलनशीलता (Adaptability)
- कम-कुशल स्नातकों के लिए जोखिम:
- जिन स्नातकों के पास बुनियादी कौशलों का अभाव है, उन्हें AI-आधारित अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा करना कठिन होगा।
- रोजगार-क्षमता का अंतर और अधिक बढ़ सकता है।
सुझाए गए सुधार
- रटकर सीखने से सक्रिय अधिगम की ओर परिवर्तन:
- जिज्ञासा-आधारित और अनुभवात्मक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए।
- आलोचनात्मक चिंतन और समस्या-समाधान कौशल विकसित किए जाएँ।
- छात्रों में प्रश्न पूछने और जिज्ञासा की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जाए।
- शिक्षक शिक्षा को सुदृढ़ बनाना:
- शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता और विनियमन में सुधार किया जाए।
- सतत व्यावसायिक विकास कार्यक्रमों को संस्थागत रूप दिया जाए।
- विद्यालयी अवसंरचना में सुधार: सभी छात्रों को निम्न सुविधाओं की सार्वभौमिक उपलब्धता सुनिश्चित की जाए:
- पुस्तकालय
- प्रयोगशालाएँ
- डिजिटल संसाधन
- खेल सुविधाएँ
- बुनियादी सुविधाएँ
- शिक्षण-अधिगम परिणामों पर केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना:
- केवल नामांकन और उपस्थिति के संकेतकों तक सीमित न रहकर उससे आगे बढ़ना आवश्यक है।
- छात्रों के अधिगम का आकलन करने हेतु सुदृढ़ एवं प्रभावी मूल्यांकन तंत्र विकसित किए जाने चाहिए।
- संस्थागत स्वायत्तता को बढ़ावा देना:
- अनावश्यक नौकरशाही नियंत्रण कम किए जाएँ।
- शैक्षणिक स्वतंत्रता, नवाचार और अनुसंधान उत्कृष्टता को प्रोत्साहित किया जाए।
- शिक्षा को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना
- व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास को शिक्षा प्रणाली में समाहित किया जाए।
- उद्योग–शिक्षा संस्थान साझेदारी को मजबूत किया जाए।
- डिजिटल अर्थव्यवस्था के अनुरूप भविष्य-उन्मुख कौशलों पर बल दिया जाए।
निष्कर्ष
- भारत की शिक्षा संबंधी चुनौती मूलतः पहुँच का संकट नहीं, बल्कि अधिगम का संकट है। यद्यपि नामांकन स्तरों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, फिर भी कमजोर अधिगम परिणाम, अपर्याप्त कौशल विकास तथा कम रोजगार-क्षमता देश के जनसांख्यिकीय लाभांश के लिए गंभीर चुनौती उत्पन्न कर रहे हैं।
- इन संरचनात्मक कमियों को गुणवत्ता-केंद्रित सुधारों के माध्यम से दूर करना आवश्यक है, ताकि भारत की विशाल युवा आबादी को एक उत्पादक आर्थिक संपदा में परिवर्तित किया जा सके।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: भारत की मूल आर्थिक चुनौती रोजगार की कमी नहीं, बल्कि उसके युवाओं में व्यापक रूप से व्याप्त रोजगार-अयोग्यता है। इस संकट में योगदान देने वाली भारत की शिक्षा प्रणाली की संरचनात्मक कमियों का विश्लेषण कीजिए तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के आलोक में आवश्यक उपाय सुझाइए।
(15 अंक, 250 शब्द)
|