संदर्भ:
23–26 मई 2026 के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा के पश्चात भारत–अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों में स्पष्ट गतिरोध दिखाई देने लगा है। रणनीतिक विशेषज्ञों और विभिन्न थिंक टैंकों का मानना है कि अमेरिका की संरक्षणवादी आर्थिक नीतियाँ तथा कूटनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव उस साझेदारी को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं, जिसे कभी 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारी माना जाता था।
विश्वास का संकट
सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी (CNAS) की रिपोर्ट “रिपेयरिंग द ब्रीच: गेटिंग U.S.-इंडिया टाइज़ बैक ऑन ट्रैक” के अनुसार, वर्ष 2025 के उत्तरार्ध में भारत–अमेरिका द्विपक्षीय संबंध तीन प्रमुख विवादास्पद मुद्दों के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हुए और संबंधों की प्रगति में उल्लेखनीय बाधा उत्पन्न हुई:
- ऑपरेशन सिंदूर के बाद की परिस्थितियाँ: मई 2025 में पाकिस्तान समर्थित आतंकी ढाँचों के विरुद्ध भारत द्वारा चलाए गए व्यापक ऑपरेशन सिंदूर के बाद, नई दिल्ली ने इस्लामाबाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूर्णतः अलग-थलग करने का प्रयास किया।
- हालाँकि, अमेरिकी प्रशासन ने ईरान संकट में मध्यस्थता की भूमिका निभाने के लिए पाकिस्तानी नेतृत्व की खुलकर सराहना की। भारत में इस कदम को एक गंभीर रणनीतिक विश्वासघात के रूप में देखा गया।
- आक्रामक व्यापार संरक्षणवाद: अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यातों पर एकतरफा रूप से 50% तक शुल्क (Tariff) लगाए जाने से नई दिल्ली को गहरा झटका लगा।
- यह आर्थिक तनाव और बढ़ गया जब अमेरिका ने रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल की खरीद जारी रखने के लिए भारत को दंडित करने के उद्देश्य से अतिरिक्त 25% शुल्क (टैरिफ) दंड लगाया।
- क्वाड की व्यवस्थित उपेक्षा: राष्ट्राध्यक्ष स्तर के शिखर सम्मेलनों की उल्लेखनीय अनुपस्थिति तथा व्यापक कूटनीतिक उत्साह की कमी ने प्रभावी रूप से क्वाड (ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान, अमेरिका) की सक्रियता और प्रभावशीलता को कमज़ोर कर दिया है।
- विश्लेषकों को आशंका है कि अमेरिका चीन के साथ एकतरफा और लेन-देन आधारित व्यवस्था स्थापित करने के लिए इस समूह को कम प्राथमिकता दे रहा है।
मार्को रुबियो का दौरा (मई 2026) और राजनयिक तनाव
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की बहुप्रतीक्षित यात्रा रणनीतिक आश्वासन देने में विफल रही। इसके बजाय, इसने “अमेरिका फर्स्ट” सिद्धांत की लेन-देन आधारित प्रकृति को और स्पष्ट कर दिया।
- व्यापारिक प्रतिबद्धताओं में ठहराव: लंबित द्विपक्षीय व्यापार समझौते के संबंध में कोई महत्वपूर्ण सफलता या ठोस प्रगति हासिल नहीं हो सकी।
- सार्वजनिक मतभेद: उस समय तनाव खुलकर सामने आ गया जब अमेरिका ने दावा किया कि भारत ने पाँच वर्षों में 500 अरब डॉलर के आयात की योजना के लिए प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन भारतीय अधिकारियों ने इस दावे का तुरंत खंडन कर उसे अस्वीकार कर दिया।
- रणनीतिक विस्मृति: वॉशिंगटन लौटने पर, राष्ट्रपति ट्रंप और सेक्रेटरी रुबियो, दोनों ने ही कैबिनेट की सार्वजनिक ब्रीफिंग में भारत, प्रधानमंत्री मोदी या क्वाड का ज़रा भी ज़िक्र नहीं किया। इससे पता चलता है कि अमेरिका की मौजूदा विदेश नीति में भारत की प्राथमिकता कम हो रही है।
साझेदारी की स्थायी आधारशिला
वर्तमान कूटनीतिक और लेन-देन संबंधी तनावों के बावजूद, गहराई से निहित संरचनात्मक वास्तविकताएँ दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक द्विपक्षीय सामंजस्य की आवश्यकता को कायम रखती हैं:
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन: बढ़ते अधिनायकवाद का मुकाबला करने तथा स्वतंत्र, खुली और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए भारत भौगोलिक और सैन्य दृष्टि से एक अपरिहार्य साझेदार बना हुआ है।
- भू-राजनीतिक प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा: सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रक्षा सह-उत्पादन तथा स्वच्छ ऊर्जा सुरक्षा जैसी महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों में आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती वाशिंगटन के लिए नई दिल्ली के विशाल पैमाने और क्षमता के बिना हासिल करना संभव नहीं है।
- दलीय सहमति पर आधारित सहभागिता: रणनीतिक संवाद के विभिन्न माध्यम ट्रैक-1.5 कूटनीति को बनाए हुए हैं। इसका प्रमाण यह है कि वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक (जैसे हडसन इंस्टीट्यूट) संस्थागत विश्वास को बनाए रखने के लिए भारतीय समाज और राजनीति के विविध नेतृत्व वर्गों के साथ सक्रिय रूप से संवाद कर रहे हैं।
निष्कर्ष
यद्यपि भारत-अमेरिका साझेदारी का दीर्घकालिक संरचनात्मक आधार अभी भी मजबूत और तर्कसंगत बना हुआ है, वर्तमान संबंध अप्रत्याशित एवं लेन-देन आधारित नीतियों से उत्पन्न गहरे विश्वास-संकट से प्रभावित हैं। इस संबंध को पुनर्जीवित करने के लिए कठोर संरक्षणवाद से आगे बढ़ना होगा तथा अल्पकालिक राजनीतिक लाभों के बजाय साझा रणनीतिक और प्रौद्योगिकीय उद्देश्यों के आधार पर दोनों देशों के हितों का पुनः संरेखण करना होगा।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के अंतर्गत भारत-अमेरिका संबंधों में आए हालिया बदलावों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। बढ़ती हुई लेन-देन आधारित कूटनीति के बीच भारत को अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को किस प्रकार संतुलित करना चाहिए?
(15 अंक, 250 शब्द)
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