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भारत की भविष्य की जनसांख्यिकीय चुनौतियाँ

भारत की भविष्य की जनसांख्यिकीय चुनौतियाँ 19 Mar 2026

संदर्भ

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट और पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट ‘भारत के जनसांख्यिकीय भविष्य का अनावरण (2021–2051) [Unravelling India’s Demographic Future (2021–2051)’] के अनुसार, भारत धीमी जनसंख्या वृद्धि, घटती प्रजनन दर और धीरे-धीरे बढ़ती वृद्ध आबादी के चरण में प्रवेश कर रहा है, जो एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय मोड़ का संकेत है।

प्रमुख जनसांख्यिकीय रुझान

  • मध्यम जनसंख्या वृद्धि:  वर्ष 2021 में जनसंख्या 1,355.8 मिलियन थी, जिसके वर्ष 2051 तक बढ़कर 1,590.1 मिलियन होने का अनुमान है।
  • कम वृद्धि दर:  औसत वार्षिक वृद्धि दर 0.5% है, जो धीमी गति से विस्तार का संकेत देती है।
  • जनसंख्या विस्फोट नहीं:  कम अनुमान अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि के पहले के आशंकाओं को खारिज करते हैं।
  • जनसांख्यिकीय मोड़:  युवा-प्रधान संरचना से वृद्ध, शहरी और स्थिर जनसंख्या संरचना की ओर बदलाव।

बदलती आयु संरचना

  • बाल जनसंख्या में कमी:  0–4 आयु वर्ग की जनसंख्या में भारी गिरावट (113.5 मिलियन से काफी कम स्तर तक)।
    • प्रजनन दर में निरंतर गिरावट बाल जनसंख्या में कमी ला रही है।
  • कार्यशील आयु वर्ग का विस्तार (अस्थायी चरण):  वर्ष 2021 में कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या 833.8 मिलियन (65.2%) थी।
    • वर्ष 2041 तक उच्चतम:  जनसंख्या के घटने से पहले इसके 1,009 मिलियन (65.5%) तक पहुँचने की उम्मीद है।
    • वर्ष 2041 के बाद गिरावट:  वर्ष 2051 तक कार्यबल का हिस्सा घटकर 62.8% होने का अनुमान है।
    • जनसांख्यिकीय लाभांश की अवधि:  अवसर मौजूद है, लेकिन समय-सीमित है तथा वर्ष 2041 के बाद कम होने की आकांश है।
  • तीव्र  वृद्धावस्था: बुजुर्ग आबादी (60+) के वर्ष 2021 में 130.5 मिलियन (9.62%) से बढ़कर वर्ष 2051 तक 325.3 मिलियन (20.5%) होने का अनुमान है।
    • माध्य आयु में वृद्धि: माध्य आयु 28 से बढ़कर 40 वर्ष होने का अनुमान।
    • उन्नत जनसांख्यिकीय संक्रमण: यह विकसित देशों की तरह वृद्ध होती जनसंख्या वाले समाज की ओर बदलाव का संकेत देता है।

शिक्षा पर प्रभाव

  • स्कूली शिक्षा की माँग में कमी:  जन्म दर घटने से कक्षाओं का आकार छोटा हो रहा है और नए स्कूलों की आवश्यकता कम हो रही है, विशेषकर सरकारी क्षेत्र में।
  • ‘अलाभकारी स्कूलों’ का उदय: जिन स्कूलों में नामांकन बहुत कम है, वे अपने परिचालन खर्चों उठाने में  असमर्थ हैं।
    • उदाहरण:  जनसांख्यिकीय गिरावट के कारण केरल में स्कूलों के बंद होने की दीर्घकालिक प्रवृत्ति।
  • सरकारी स्कूलों का बंद होना: सरकारी स्कूलों की संख्या 2014-15 में 11.07 लाख से घटकर 2023-24 में 10.18 लाख हो गई है।
    • एक दशक में लगभग 90,000 स्कूल बंद हो गए।
  • निजी स्कूलों का विस्तार:  इसी अवधि में निजी स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.31 लाख (लगभग 43,000 की वृद्धि) हो गई।
    • यह सार्वजनिक शिक्षा की गुणवत्ता के प्रति धारणा और आकांक्षाओं से प्रेरित है।
  • शिक्षक रोजगार संबंधी चिंताएँ:  घटते नामांकन से शिक्षकों की छंटनी हो सकती है, तथा शिक्षकों को पुनः नियुक्त या पुनः प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है।

आर्थिक प्रभाव

  • जनसांख्यिकीय लाभांश खोने का जोखिम: जनसंख्या के वृद्ध होने के कारण वर्ष 2041 के बाद इस लाभांश के घटने की संभावना है।
  • रोजगार सृजन की आवश्यकता:  अपर्याप्त रोजगार जनसांख्यिकीय लाभ को आर्थिक बोझ में बदल सकता है।
  • कार्यबल का निरंतर लाभ:  वर्ष 2051 तक लगभग 60% जनसंख्या कार्यशील आयु वर्ग में बनी रहेगी।

वृद्धावस्था से जुड़ी वित्तीय और सामाजिक चुनौतियाँ

  • बढ़ता स्वास्थ्य बोझ:  वृद्ध होती जनसंख्या जेरियाट्रिक (वृद्ध देखभाल) सेवाओं की मांग बढ़ाती है।
  • स्वास्थ्य प्रणाली पर दबाव:  मौजूदा बुनियादी ढाँचा वृद्धावस्था संबंधी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त नहीं है।
  • पेंशन बोझ में वृद्धि:  वृद्ध जनसंख्या के बढ़ने से राज्य की वित्तीय देनदारियाँ बढ़ती हैं।
  • निर्भरता अनुपात में वृद्धि:  कम कामगारों द्वारा अधिक आश्रितों का समर्थन आर्थिक स्थिरता को कमजोर करता है।
  • सार्वजनिक व्यय में वृद्धि:  स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर अधिक खर्च की आवश्यकता होती है।

क्षेत्रीय प्रभाव और नीतिगत प्राथमिकताएँ

  • शिक्षा:  प्रजनन दर में गिरावट के कारण स्कूलों का युक्तिकरण हो रहा है, जिससे विस्तार के बजाय सीखने के परिणामों में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, जबकि कम नामांकन बेहतर शिक्षक–छात्र अनुपात और कक्षा की प्रभावशीलता प्राप्त करने में सहयोग कर रहा है।
  • स्वास्थ्य: प्रजनन दर में कमी मातृ स्वास्थ्य देखभाल के बोझ को कम करती है, परंतु साथ ही बढ़ती वृद्ध जनसंख्या जेरियाट्रिक देखभाल और मजबूत स्वास्थ्य अवसंरचना की आवश्यकता को बढ़ावा दे रही है।
  • प्रजनन अधिकार:  अनचाहे गर्भधारण को रोकने के लिए परिवार नियोजन पर निरंतर जोर देना आवश्यक है, साथ ही बांझपन से संबंधित चिंताओं का समाधान करना और महिलाओं के सूचित एवं स्वैच्छिक प्रजनन विकल्प सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है।
  • रोजगार:  जनसांख्यिकीय संक्रमण के लिए आवश्यक है कि शिक्षा को बदलती आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप समन्वित किया जाए तथा एक उत्पादक, भविष्य के लिए कार्यबल तैयार करने हेतु कौशलों को उन्नत किया जाए।
  • जेंडर लाभांश:  महिला श्रम बल में अधिक भागीदारी श्रम आपूर्ति को स्थिर करने में मदद कर सकती है और घटती कार्यशील आयु जनसंख्या के आर्थिक प्रभाव को कम कर सकती है।
  • वृद्धावस्था एवं सामाजिक सुरक्षा: बढ़ती वृद्ध जनसंख्या के लिए मजबूत पेंशन प्रणाली और सामाजिक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है, साथ ही बढ़ते निर्भरता अनुपात को संभालने के लिए वित्तीय तैयारी भी आवश्यक है।
  • सिल्वर इकोनॉमी:  जनसंख्या का वृद्ध होना बुजुर्गों-केंद्रित वस्तुओं और सेवाओं की नई मांग उत्पन्न कर रहा है, जिससे आर्थिक विकास के नए अवसर निर्मित हो रहे हैं तथा संभावित रूप से द्वितीय जनसांख्यिकीय लाभांश संभव हो रहा है।

निष्कर्ष

भारत का धीमी जनसंख्या वृद्धि और वृद्धावस्था की ओर संक्रमण समय पर नीति निर्माण की माँग करता है, ताकि चुनौतियों और अवसरों के बीच संतुलन बनाकर सतत विकास सुनिश्चित किया जा सके।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारत जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) से जनसांख्यिकीय चुनौती की ओर बढ़ रहा है। उभरते जनसांख्यिकीय रुझानों और उनके आर्थिक विकास पर प्रभावों की चर्चा कीजिए।

(10 अंक, 150 शब्द)

भारत की भविष्य की जनसांख्यिकीय चुनौतियाँ

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