भारत में आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (Invasive Alien Species): पारिस्थितिक खतरे, प्रणालीगत कारण और समग्र पुनर्स्थापन की आवश्यकता

भारत में आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (Invasive Alien Species): पारिस्थितिक खतरे, प्रणालीगत कारण और समग्र पुनर्स्थापन की आवश्यकता 8 May 2026

संदर्भ:

संपूर्ण भारत में प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा (Prosopis juliflora), लैंटाना कैमारा (Lantana camara) और सेन्ना स्पेक्टैबिलिस (Senna spectabilis) जैसी आक्रामक विदेशी प्रजातियों (IAS) के विरुद्ध अभियान तेज हो रहे हैं, हालाँकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल इन प्रजातियों को हटाने से पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापित नहीं होगा, जब तक उन गहरे पारिस्थितिक अवरोधों को दूर नहीं किया जाता जिन्होंने इनके प्रसार को संभव बनाया।

आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (IAS) के बारे में 

  • परिभाषा: IAS (आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ) वे गैर-स्थानीय प्रजातियाँ होती हैं जो तेजी से फैलती हैं और स्थानीय जैव विविधता को पीछे छोड़ देती हैं, जिससे पारिस्थितिक और आर्थिक नुकसान होता है।
  • अवांछित अतिथि” उपमा: आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (IAS) ऐसे अनबुलाए मेहमान की तरह होती हैं जो धीरे-धीरे घर पर कब्जा कर लेते हैं और मूल मालिक को विस्थापित कर देते हैं।
  • ऐतिहासिक उत्पत्ति: औपनिवेशिक शासन के दौरान कई आक्रामक प्रजातियों को सजावटी या वनीकरण के उद्देश्यों के लिए जानबूझकर लाया गया था।
    • कुछ प्रजातियाँ व्यापार और आयात के माध्यम से अनजाने में आईं, जैसे अमेरिका से PL-480 गेहूँ का आयात।
  • विदेशी (Alien) और आक्रामक विदेशी (Invasive Alien) प्रजातियों में अंतर:
    • विदेशी प्रजातियाँ: वे गैर-स्थानीय प्रजातियाँ जो किसी अन्य क्षेत्र से लाई जाती हैं और सामान्यतः हानिकारक नहीं होतीं, जैसे आलू और टमाटर।
    • आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ: वे विदेशी प्रजातियाँ जो तेजी से फैलती हैं और स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुँचाती हैं, जैसे लैंटाना कैमारा और जलकुंभी (Eichhornia crassipes)।

भारत की प्रमुख आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ

  •  लैंटाना कैमारा (Lantana camara): इसे ब्रिटिश शासन के दौरान एक सजावटी झाड़ी के रूप में लाया गया था।
    • यह Allelopathy (एलीलोपैथी) का उपयोग करती है: ऐसी जैविक प्रक्रिया जिसमें पौधा रसायन छोड़कर आसपास के पौधों की वृद्धि या अंकुरण प्रभावित करता है।
    • काटने के बाद यह तेजी से पुनः उग आता है, जिससे इसे पूरी तरह समाप्त करना कठिन हो जाता है।
    • घने झाड़-झंखाड़ बनाकर यह वन क्षेत्रों, घासभूमियों और वन्यजीवों के आवासों को क्षतिग्रस्त करता है।
  • प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा (Prosopis juliflora): इसे राजस्थान और गुजरात के शुष्क क्षेत्रों में वनीकरण और हरियाली बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया था।
    • यह अत्यधिक भूजल का दोहन करता है, जिससे जल संकट की स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है।
    • यह शुष्क क्षेत्रों में स्थानीय घासों को विस्थापित कर देता है और पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना को परिवर्तित कर देता है।
    • यह जैव विविधता और चराई की क्षमता को कम कर देता है।
  • जलकुंभी (Jal Kumbhi / बंगाल का आतंक): यह झीलों, तालाबों और नदियों में तेजी से फैलता है।
    • सूर्य के प्रकाश के प्रवेश को बाधित करता है और घुलित ऑक्सीजन कम कर देती है (Eutrophication)।
    • मत्स्य पालन और जलीय जैव विविधता को नुकसान पहुँचाता है।
    • यह जल परिवहन को बाधित करता है और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है।
  • पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस (Parthenium hysterophorus) (गाजर घास): आयातित गेहूँ की खेपों के साथ भारत में आया।
    • फसलों को नुकसान पहुँचाता है और कृषि उत्पादकता को घटाता है।
    • अस्थमा, त्वचा एलर्जी और श्वसन रोग उत्पन्न करता है।
    • यह चरागाहों पर कब्जा कर लेता है और चारे की उपलब्धता को कम कर देता है।

आक्रामक प्रजातियों के पारिस्थितिक और प्रणालीगत प्रभाव

  • जैव विविधता की हानि: आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (IAS) स्थानीय पौधों से प्रतिस्पर्धा करके उन्हें पीछे छोड़ देती हैं, जिससे शाकाहारी जीवों की संख्या घटती है, मांसाहारी जीव प्रभावित होते हैं और अंततः पूरा खाद्य श्रृंखला तंत्र बाधित हो जाता है।
  • मृदा रसायन में परिवर्तन: आक्रामक प्रजातियाँ पोषक तत्वों के चक्र और मृदा की स्थिति को बदल देती हैं, जिससे स्थानीय पौधों के जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है।
  • आग लगने का बढ़ा हुआ जोखिम: सूखी आक्रामक वनस्पति वनाग्नि की तीव्रता और आवृत्ति को बढ़ा देती है।
  • जल संकट: घनी आक्रामक प्रजातियाँ वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) को बढ़ा देती हैं, जिससे बड़ी मात्रा में जलवाष्प उत्सर्जित होता है और भूजल तेजी से समाप्त हो जाता है।
  • जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का पतन: जलकुंभी घुले हुए ऑक्सीजन को कम कर देती है, जिससे मत्स्य पालन और जलीय जैव विविधता को खतरा उत्पन्न होता है।

पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता के मूल कारण

  • जलवायु परिवर्तन: बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और सूखे की स्थिति स्थानीय प्रजातियों को कमजोर कर देती है, जबकि आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (IAS) पारिस्थितिक खाली स्थानों का लाभ उठाकर अवसरवादी उपनिवेशी के रूप में फैल जाती हैं।
  • असतत कृषि: अत्यधिक यूरिया और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से मृदा में सूक्ष्मजीवों की विविधता कम हो जाती है और मृदा की उपजाऊ क्षमता कमजोर पड़ जाती है।
  • आवास का विखंडन: सड़कें, खनन और अवसंरचना वन क्षेत्रों को छोटे-छोटे खंडों में बाँट देती हैं, जिससे एज इफ़ेक्ट (Edge Effect) उत्पन्न होते हैं जो लैंटाना कैमारा जैसी आक्रामक प्रजातियों के लिए अनुकूल होते हैं।
  • आर्द्रभूमि और नदियों में परिवर्तन: बाँधों का निर्माण, सीवेज का निर्वहन और पोषक तत्वों से समृद्ध प्रदूषित जल जलकुंभी (Eichhornia crassipes) के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं।

उन्मूलन संबंधी दृष्टिकोण की सीमाएँ

  • मृदा में स्थायी बीज बैंक: लैंटाना कैमारा जैसी आक्रामक प्रजातियाँ मृदा में निष्क्रिय बीज छोड़ देती हैं, जो वर्षों तक जीवित रह सकते हैं और उन्मूलन के बाद भी तेजी से पुनः उग सकते हैं।
  • खाली पारिस्थितिक स्थान: मृदा, जल और जैव विविधता की परिस्थितियों को पुनः बहाल किए बिना आक्रामक प्रजातियों को हटाने से पारिस्थितिक तंत्र पुनः आक्रमण के प्रति संवेदनशील रह जाता है।
  • अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक परिवर्तन: जलवायु, जल-चक्र और पोषक तत्वों के चक्र में आए बदलाव पारिस्थितिक तंत्र को उसकी मूल प्राकृतिक अवस्था में लौटने से रोक सकते हैं।

आगे की राह

  • समग्र पारिस्थितिक पुनर्स्थापन: पुनर्स्थापन प्रक्रिया में एक साथ मृदा स्वास्थ्य, जल-चक्र और स्थानीय जैव विविधता को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए।
  • जलवायु-सहिष्णु वनीकरण: वृक्षारोपण अभियानों में उन देशज प्रजातियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो हीट वेव, सूखा और बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल हों।
  • सामुदायिक भागीदारी: गुजरात के बन्नी घासभूमि क्षेत्र में मालधारी समुदाय ने वन विभाग के साथ मिलकर प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा (Prosopis juliflora) को हटाने और देशी बन्नी घासभूमियों को पुनर्जीवित करने का कार्य किया।

निष्कर्ष

दीर्घकालिक समाधान केवल आक्रामक प्रजातियों को हटाने में नहीं, बल्कि ऐसे सुदृढ़ पारिस्थितिक तंत्रों के निर्माण में है जो भविष्य में होने वाले आक्रमणों का प्रतिरोध कर सकें।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न: 

प्रश्न: आक्रामक विदेशी प्रजातियों (IAS) का उन्मूलन मात्र भारत में पारिस्थितिक क्षरण को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। जलवायु परिवर्तन और असतत मानव गतिविधियों के संयुक्त प्रभाव के संदर्भ में इस कथन पर चर्चा कीजिए। एक व्यापक पारिस्थितिकी-आधारित पुनर्स्थापन दृष्टिकोण सुझाइए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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