संदर्भ:
पश्चिम एशिया में तेजी से हो रहे भू-राजनीतिक परिवर्तनों के कारण भारत को एक संतुलित, लचीली और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की आवश्यकता है। भारत को अपने ऊर्जा, आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों की रक्षा करते हुए इज़राइल, ईरान तथा अरब खाड़ी देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखना होगा।
पश्चिम एशिया का बदलता भू-राजनीतिक परिदृश्य:
- क्षेत्रीय पुनर्गठन: हालिया इज़राइल-ईरान संघर्ष और नए क्षेत्रीय शक्ति-प्रतिस्पर्धा के बाद पश्चिम एशिया एक बड़े भू-राजनीतिक परिवर्तन से गुजर रहा है।
- ईरान की अवस्थिति: सैन्य दबाव और प्रतिबंधों के बावजूद, ईरान पूरे क्षेत्र में पर्याप्त सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव बनाए रखने में सक्षम रहा है।
- रणनीतिक जलमार्ग: हॉर्मुज जलडमरूमध्य एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण चोकपॉइंट (chokepoint) बना हुआ है, जिसमें किसी भी प्रकार का व्यवधान वैश्विक ऊर्जा बाजारों और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित करता है।
- अमेरिका की परिवर्तित भूमिका: संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल के मध्य बढ़ते मतभेद पश्चिम एशिया में बदलती अमेरिकी रणनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं।
भारत-इज़राइल रणनीतिक साझेदारी:
- रक्षा सहयोग: इज़राइल रक्षा उपकरणों, मिसाइल प्रणालियों, निगरानी प्रौद्योगिकियों, आतंकवाद-विरोधी विशेषज्ञता तथा खुफिया सहयोग के एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा है।
- तकनीकी साझेदारी: दोनों देशों के मध्य द्विपक्षीय सहयोग कृषि, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा, नवाचार और उच्च प्रौद्योगिकी तक विस्तृत है।
- रणनीतिक लाभ: इज़राइली रक्षा प्रौद्योगिकियों ने भारत के सैन्य आधुनिकीकरण तथा आंतरिक सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत किया है।
रणनीतिक पुनर्संतुलन की आवश्यकता:
- नीतिगत जड़ता से बचना: इज़राइल के साथ भारत का जुड़ाव हमेशा राष्ट्रीय हितों द्वारा निर्देशित होना चाहिए, न कि यह एक स्वचालित रणनीतिक संरेखण बनना चाहिए।
- रणनीतिक लचीलापन: विदेश नीति में इतनी लचीलापन होना चाहिए, कि वह किसी एक विशेष गुट में शामिल हुए बिना कई क्षेत्रीय शक्तियों के साथ समान रूप से जुड़ सके।
- स्वतंत्र निर्णय: भारत की पश्चिम एशिया नीति भू-राजनीतिक गुटीय राजनीति की बजाय रणनीतिक स्वायत्तता से प्रेरित होनी चाहिए।
भारत के लिए ईरान का महत्त्व:
- ऊर्जा सुरक्षा: भारत के तेल आयात और समग्र ऊर्जा सुरक्षा के लिए ईरान तथा फारस की खाड़ी में स्थिरता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- क्षेत्रीय प्रभाव: इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में ईरान का मजबूत प्रभाव है, जो उसे एक अपरिहार्य क्षेत्रीय अभिकर्ता बनाता है।
- कनेक्टिविटी: ईरान भारत की पश्चिम-की-ओर कनेक्टिविटी पहलों के केंद्र में है, जिसमें चाबहार बंदरगाह तथा अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) शामिल हैं।
- चीन कारक: ईरान के साथ संबंधों का कमजोर होना, तेहरान को चीन-पाकिस्तान रणनीतिक साझेदारी के और करीब धकेल सकता है, जिससे क्षेत्र में भारत का प्रभाव कम हो सकता है।
पश्चिम एशिया में भारत की अवस्थिति:
- ऊर्जा निर्भरता: भारत के कच्चे तेल के आयात का एक बड़ा हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जिससे इस क्षेत्र की स्थिरता भारत के लिए महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
- भारतीय प्रवासी: खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय श्रमिक प्रेषण के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।
- आर्थिक हित: भारत संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के साथ मजबूत व्यापार, निवेश तथा रणनीतिक साझेदारी बनाए रखता है।
- समुद्री सुरक्षा: भारत के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए सुरक्षित समुद्री संचार मार्ग (SLOCs) आवश्यक हैं।
उभरती राजनयिक चुनौतियाँ:
- साझेदारियों में संतुलन: भारत को इज़राइल, ईरान, अरब खाड़ी देशों, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप के साथ एक साथ संबंध बनाए रखने होंगे।
- ग्लोबल साउथ की आकांक्षाएँ: ग्लोबल साउथ (वैश्विक दक्षिण) के प्रतिनिधित्वकर्ता के रूप में भारत की छवि को क्षेत्रीय संघर्षों के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
- यूरोपीय संवेदनशीलता: गाजा में संघर्ष के प्रति यूरोप के भीतर बदलते राजनीतिक दृष्टिकोण भविष्य के व्यापार तथा राजनयिक जुड़ाव को प्रभावित कर सकते हैं।
- आर्थिक जोखिम: क्षेत्रीय अस्थिरता सीधे तौर पर ऊर्जा की कीमतों, शिपिंग लागत, मुद्रास्फीति और भारत के व्यापक आर्थिक स्थायित्व को प्रभावित करती है।
संबंधित चुनौतियाँ:
- क्षेत्रीय ध्रुवीकरण: बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भारत की संतुलनकारी रणनीति को जटिल बनाती है।
- ऊर्जा संवेदनशीलता: खाड़ी देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर निरंतर निर्भरता, भारत को भू-राजनीतिक संघर्षों के प्रति संवेदनशील बनाती हैं।
- चीन का बढ़ता प्रभाव: ईरान और पश्चिम एशिया के साथ चीन का बढ़ता जुड़ाव, भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहा है।
- राजनयिक संकेत: किसी एक क्षेत्रीय अभिकर्ता के साथ अत्यधिक झुकाव का संदेश भारत के राजनयिक अनुकूलन को कम कर सकता है।
आगे की राह:
- रणनीतिक स्वायत्तता: भारत के राष्ट्रीय हितों के आधार पर एक स्वतंत्र, बहु-आयामी विदेश नीति का पालन जारी रखना।
- संतुलित संबंध: इज़राइल, ईरान, अरब खाड़ी देशों, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप के साथ एक साथ मजबूत साझेदारी बनाए रखना।
- ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा: समुद्री सुरक्षा तथा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों को मजबूत करते हुए ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना।
- कनेक्टिविटी को मजबूत करना: क्षेत्रीय संबंधों के विस्तार के लिए चाबहार बंदरगाह और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) जैसी परियोजनाओं में तेजी लाना।
- संवाद का समर्थन: एक उत्तरदायी वैश्विक अभिकर्ता तथा ग्लोबल साउथ के नेता के रूप में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करते हुए कूटनीति, शांतिपूर्ण संघर्ष समाधान तथा क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना।
निष्कर्ष
तेजी से बहुध्रुवीय होते जा रहे पश्चिम एशिया में भारत के दीर्घकालिक हित रणनीतिक स्वायत्तता, संतुलित कूटनीति और लचीले जुड़ाव के माध्यम से ही सर्वोत्तम रूप से पूरे हो सकते हैं, जिससे वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक हितों, क्षेत्रीय साझेदारियों एवं वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षाओं की रक्षा करने में सक्षम हो सके।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्र. पश्चिम एशिया में हाल के भू-राजनीतिक पुनर्गठन के संदर्भ में, मूल्यांकन कीजिए कि क्या इज़राइल के साथ भारत के बेहतर होते संबंध उसके व्यापक रणनीतिक हितों तथा ‘ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्वकर्ता’ के रूप में उसकी स्थिति के लिए जोखिम उत्पन्न करता है।
(15 अंक, 250 शब्द)
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