संदर्भ:
भारतीय शहरों में जलवायु लचीलेपन और अनुकूलन के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य, श्रम कल्याण तथा शहरी शासन को एकीकृत करने की आवश्यकता है। इसमें स्वच्छता कर्मचारियों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, जो बढ़ते तापमान, अपर्याप्त आवास एवं सीमित सामाजिक सुरक्षा के कारण अत्यधिक जलवायु जोखिमों का सामना करते हैं।
शहरी शासन चुनौती के रूप में जलवायु परिवर्तन:
- पर्यावरणीय प्रभावों से परे: जलवायु परिवर्तन केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह शहरी शासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक समानता की भी एक बड़ी चुनौती है।
- असामान संवेदनशीलता: जलवायु प्रभाव आवास की गुणवत्ता, रोजगार स्थिति, स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच, सामाजिक सुरक्षा तथा शहरी अवसंरचना से प्रभावित होते हैं, जिससे कमजोर वर्गों पर असमान प्रभाव पड़ता है।
- मानव-केंद्रित विकास: शहरी लचीलेपन का मूल्यांकन इस बात से किया जाना चाहिए, कि शहर आवश्यक सेवाओं से जुड़े श्रमिकों के स्वास्थ्य, कल्याण तथा आजीविका की रक्षा कितनी प्रभावी ढंग से करते हैं।
स्वच्छता कर्मचारी एवं जलवायु संवेदनशीलता:
- अनिवार्य कार्यबल: सड़कों की सफाई करने वाले, कचरा बीनने वाले और नालों की सफाई करने वाले स्वच्छता कर्मचारी ऐसी महत्त्वपूर्ण सेवाएँ प्रदान करते हैं, जो शहरी जीवन को बनाए रखती हैं।
- कार्यस्थल पर अत्यधिक तापमान का सामना: बढ़ती हीटवेव (लू) ने अत्यधिक गर्मी को एक आकस्मिक खतरे से बदलकर एक नियमित व्यावसायिक जोखिम बना दिया है।
- स्वास्थ्य जोखिम: लंबे समय तक गर्मी के संपर्क में रहने से निर्जलीकरण, हीट स्ट्रोक, गुर्दे के विकार, हृदय संबंधी बीमारियाँ तथा कार्य उत्पादकता में कमी आ सकती है।
- दुहरा बोझ: कई स्वच्छता कर्मचारियों को कार्यस्थल और घर (विशेष रूप से अनियोजित बस्तियों) दोनों स्थानों पर जलवायु जोखिमों का सामना करना पड़ता है।
शहरी असमानताएँ एवं जलवायु जोखिम:
- अनौपचारिक बस्तियाँ: स्वच्छता कर्मचारियों का एक बड़ा हिस्सा अपर्याप्त आवास, पानी की आपूर्ति, वेंटिलेशन, जल निकासी और हरित क्षेत्रों की कमी वाली अनौपचारिक बस्तियों (झुग्गी-झोपड़ियों) में रहता है।
- जल असुरक्षा: सुरक्षित पेयजल तक सीमित पहुँच हीटवेव के दौरान उनकी संवेदनशीलता को और बढ़ा देती है।
- बाढ़ के प्रति संवेदनशीलता: खराब जल निकासी अवसंरचना के कारण शहरी बाढ़, जल जनित बीमारियों तथा पर्यावरणीय स्वास्थ्य जोखिमों का खतरा बढ़ जाता है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य परिप्रेक्ष्य:
- पारंपरिक संकेतकों की सीमाएँ: मृत्यु दर, बीमारी के प्रसार और सेवा कवरेज जैसे पारंपरिक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकेतक अक्सर शहरी प्रणालियों की वास्तविक कार्यप्रणाली को दर्शाने में विफल रहते हैं।
- प्रणाली प्रदर्शन संकेतक: स्वच्छता कर्मचारियों के जमीनी अनुभव नगरपालिका शासन, श्रम नीतियों, आवास, स्वास्थ्य सेवा तथा सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों की प्रभावशीलता को दर्शाते हैं।
- व्यावसायिक स्वास्थ्य: शहरी स्वास्थ्य प्रणालियों को अत्यधिक तापमान से संबंधित बीमारियों और अन्य जलवायु-संवेदनशील व्यावसायिक स्वास्थ्य जोखिमों के समाधान के लिए पर्याप्त रूप से तैयार होना चाहिए।
शासन में विद्यमान चुनौतियाँ:
- स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच: शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs) व्यावसायिक तापमान से संबंधित स्थितियों से पीड़ित श्रमिकों के इलाज के लिए पर्याप्त रूप से सुसज्जित या सुलभ नहीं हो सकते हैं।
- सामाजिक सुरक्षा अंतराल: प्रशासनिक बाधाएँ, जागरूकता की कमी और अत्यधिक दस्तावेज़ीकरण आवश्यकताओं के कारण प्रायः श्रमिक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते हैं।
- खंडित शासन : जलवायु कार्रवाई, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरी नियोजन और श्रम कल्याण जैसी संस्थाएँ अभी भी अलग-अलग खानों में कार्य करती हैं।
- आँकड़ों का अभाव: श्रमिकों पर व्यावसायिक तापमान के प्रभाव, स्वास्थ्य परिणामों, स्वास्थ्य देखभाल की लागत और दीर्घकालिक जलवायु प्रभावों पर सीमित डेटा उपलब्ध है।
एकीकृत जलवायु कार्रवाई की आवश्यकता:
- जलवायु-संवेदनशील व्यावसायिक स्वास्थ्य: हीट एक्शन प्लान में नगरपालिका तथा अनुबंध (contract) पर काम करने वाले स्वच्छता कर्मचारियों के लिए सुरक्षा उपायों को शामिल किया जाना चाहिए।
- श्रमिक सुरक्षा उपाय: अत्यधिक तापमान के दौरान पीने के पानी, छायादार विश्राम स्थलों तक पहुँच, संशोधित कार्य समय तथा नियमित स्वास्थ्य निगरानी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- अनौपचारिक बस्तियों को सुदृढ़ करना: जलवायु संवेदनशीलता को कम करने के लिए आवास, पानी की आपूर्ति, जल निकासी, स्वच्छता तथा शहरी हरित अवसंरचना में सुधार किया जाना चाहिए।
- जलवायु-उत्तरदायी स्वास्थ्य सेवा: गर्मी से संबंधित बीमारियों और अन्य जलवायु-संवेदनशील बीमारियों के निदान एवं प्रबंधन के लिए शहरी स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करना आवश्यक है।
नीतिगत प्राथमिकताएँ:
- एकीकृत शहरी शासन: एक समन्वित शासन ढाँचे के तहत जलवायु अनुकूलन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, श्रम कल्याण तथा शहरी नियोजन को एक साथ लाना।
- बेहतर डेटा प्रणालियाँ: व्यावसायिक जलवायु जोखिमों, स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार और दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों पर व्यापक डेटा विकसित करना।
- स्वास्थ्य का मुख्यधारा में समावेशन: आवास, शहरी विकास, श्रम नीतियों और जलवायु नियोजन में स्वास्थ्य को एक क्रॉस-सेक्टरल (अंतर्विभागीय) उद्देश्य के रूप में मानना।
- समावेशी जलवायु नियोजन: यह सुनिश्चित करना, कि कमजोर व्यावसायिक समूहों को शहरी जलवायु कार्य योजनाओं में स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए।
संबंधित चुनौतियाँ:
- बढ़ता हीट स्ट्रेस: हीटवेव की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता व्यावसायिक स्वास्थ्य जोखिमों को बढ़ा रही है।
- कमजोर शहरी अवसंरचना: जल आपूर्ति, आवास, जल निकासी और हरित आवरण में कमियाँ जलवायु संवेदनशीलता को बढ़ा देती हैं।
- संस्थागत विखंडन: कई सरकारी विभागों के मध्य समन्वय की कमी नीतिगत प्रभावशीलता को कम करती है।
- सामाजिक असमानताएँ: अनौपचारिक रोजगार और कमजोर सामाजिक सुरक्षा स्वच्छता कर्मचारियों की संवेदनशीलता को और बढ़ा देती है।
आगे की राह
- हीट एक्शन प्लान को मजबूत करना: सभी शहरी हीट एक्शन प्लान में स्वच्छता कर्मचारियों के लिए व्यापक व्यावसायिक सुरक्षा उपायों को एकीकृत करना।
- शहरी बुनियादी ढांचे में सुधार: जलवायु-अनुकूल आवास, जल सुरक्षा, जल निकासी और हरित बुनियादी ढाँचे में निवेश करना।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों का विस्तार: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) को विशेष प्रशिक्षण और सेवाओं के माध्यम से जलवायु-संवेदनशील व्यावसायिक बीमारियों के प्रबंधन के लिए सुसज्जित करना।
- सामाजिक सुरक्षा का विस्तार: कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच को सरल बनाना, और स्वच्छता कर्मचारियों के लिए वित्तीय तथा स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करना।
- एकीकृत शासन को बढ़ावा देना: शहरी विकास, स्वास्थ्य, श्रम, पर्यावरण और स्थानीय सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय को संस्थागत बनाना।
निष्कर्ष
समावेशी शहरी जलवायु कार्रवाई के लिए जलवायु अनुकूलन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, श्रम कल्याण और शहरी शासन को एकीकृत करने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए, कि आवश्यक कार्यकर्ताओं—विशेष रूप से स्वच्छता कर्मचारियों—की रक्षा मजबूत संस्थानों, लचीले बुनियादी ढाँचे और न्यायसंगत सार्वजनिक नीतियों के माध्यम से की जाए।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्र. “भारतीय शहरों में जलवायु परिवर्तन केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि शहरी शासन और सामाजिक समानता का एक गहरा संकट है।” अनौपचारिक क्षेत्र और स्वच्छता कर्मचारियों के विशेष संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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