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पुलिस व्यवस्था तथा जन-विश्वास में सुधार लाने वाले नए आपराधिक कानून

पुलिस व्यवस्था तथा जन-विश्वास में सुधार लाने वाले नए आपराधिक कानून 1 Jul 2026

संदर्भ:

भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) के कार्यान्वयन के दो वर्ष पश्चात, अब ध्यान विधायी सुधारों से हटकर पुलिस क्षमता, संस्थागत तैयारी और जन-विश्वास पर केंद्रित हो रहा है। भारत के नए आपराधिक न्यायिक ढाँचे की सफलता केवल विधायी परिवर्तनों पर नहीं, बल्कि इसके प्रभावी कार्यान्वयन पर निर्भर करती है।

नए आपराधिक कानून

  • भारतीय न्याय संहिता (BNS): यह भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 का स्थान लेती है। यह फौजदारी अपराधों, सजा तथा संगठित अपराध, आतंकवाद, मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या), साइबर अपराध और  महिलाओं एवं बच्चों के खिलाफ अपराधों जैसे उभरते अपराधों से संबंधित प्रावधानों को परिभाषित करती है।
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS): यह दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 का स्थान लेती है। यह आपराधिक जाँच, गिरफ्तारी, जमानत, मुकदमे की प्रक्रियाओं और प्रवर्तन तंत्र को संचालित करती है, जबकि समयबद्ध जाँच, डिजिटल पुलिसिंग और तकनीक-सक्षम न्याय वितरण को बढ़ावा देती है।
  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA): यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 का स्थान लेता है। यह इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, डिजिटल साक्ष्य और वैज्ञानिक जाँच को आपराधिक मुकदमों के केंद्रीय घटकों के रूप में मान्यता देकर साक्ष्य संबंधी नियमों का आधुनिकीकरण करता है।

आपराधिक न्याय सुधारों की आवश्यकता:

  • औपनिवेशिक विरासत: पूर्व आपराधिक कानून औपनिवेशिक काल के दौरान मुख्य रूप से नागरिक-केंद्रित न्याय प्रदान करने की बजाय सार्वजनिक व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखने के लिए बनाए गए थे, जिससे वे समकालीन आपराधिक न्याय की चुनौतियों से निपटने हेतु अपर्याप्त हो गए थे।
  • अपराध की बदलती प्रकृति: साइबर अपराध, संगठित अपराध, डिजिटल धोखाधड़ी, आतंकवाद और भीड़ द्वारा हिंसा जैसे उभरते खतरों के लिए तकनीक तथा वैज्ञानिक जाँच द्वारा समर्थित एक आधुनिक विधिक संरचना की आवश्यकता थी।
  • कार्यान्वयन अंतराल: आपराधिक न्याय सुधार तब तक सफल नहीं हो सकते, जब तक कि नए कानूनों के साथ-साथ पुलिस व्यवस्था, जाँच, अभियोजन (prosecution), फोरेंसिक संस्थानों तथा न्यायपालिका को सुदृढ़ न किया जाए।
  • जन-विश्वास: नागरिक विधि प्रवर्तन एजेंसियों के साथ तब अधिक सहयोग करते हैं, जब पुलिस व्यवस्था निष्पक्ष, पेशेवर, पारदर्शी और जवाबदेह होती है, जिससे अपराधों की रिपोर्टिंग और जाँच में सुधार होता है।
  • न्याय वितरण: नए आपराधिक कानूनों की प्रभावशीलता अंततः जाँच की गुणवत्ता, समय पर साक्ष्य संग्रह, वैज्ञानिक पुलिसिंग तथा पेशेवर पुलिस आचरण पर निर्भर करती है।

नए आपराधिक कानूनों के तहत प्रमुख सुधार:

  • समयबद्ध जाँच: अनावश्यक देरी को कम करने और न्याय वितरण में सुधार के लिए, BNSS निर्दिष्ट अपराधों, विशेष रूप से महिलाओं एवं बच्चों के खिलाफ अपराधों में जाँच के लिए वैधानिक समय-सीमा निर्धारित करता है।
  • समयबद्ध मामले: अदालतों को अनावश्यक स्थगन (adjournments) को कम करने और निर्धारित समय-सीमा के भीतर निर्णय देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे त्वरित न्याय को बढ़ावा मिलता है और लंबित मामलों में कमी आती है।
  • वैधानिक जमानत: निर्धारित अवधि के भीतर जाँच पूरी करने में देरी होने पर आरोपी वैधानिक जमानत का हकदार हो सकता है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए समय पर जाँच को प्रोत्साहित करता है।
  • आधुनिक अपराधों को मान्यता: BNS स्पष्ट रूप से संगठित अपराध, आतंकवाद, मॉब लिंचिंग, साइबर अपराध से संबंधित अपराधों को संबोधित करता है, तथा महिलाओं और बच्चों के लिए विधिक सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।
  • सामुदायिक सेवा: निर्दिष्ट छोटे अपराधों के लिए सजा के रूप में सामुदायिक सेवा की शुरुआत सुधारात्मक न्याय को बढ़ावा देती है, जेलों में भीड़भाड़ में कमी तथा पहली बार अपराध करने वालों के पुनर्वास की सुविधा प्रदान करती है।

तकनीक-संचालित पुलिस व्यवस्था:

  • डिजिटल आपराधिक न्याय: नए आपराधिक कानून पारदर्शिता और दक्षता में सुधार के लिए ई-FIR, जीरो FIR, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, डिजिटल चार्जशीट, वीडियोग्राफी और तकनीक-सक्षम जाँच के अधिक उपयोग को बढ़ावा देते हैं।
  • ई-साक्ष्य प्लेटफॉर्म: ई-साक्ष्य (e-Sakshya) पोर्टल जियो-टैग्ड तस्वीरों, टाइम-स्टैम्पड साक्ष्यों और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के माध्यम से अपराध स्थलों के डिजिटल दस्तावेजीकरण को सक्षम बनाता है, जिससे साक्ष्य की अखंडता एवं स्वीकार्यता मजबूत होती है।
  • वैज्ञानिक जाँच: फोरेंसिक विज्ञान, डीएनए (DNA) विश्लेषण, फिंगरप्रिंट, सीसीटीवी (CCTV) फुटेज, साइबर फोरेंसिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पर अधिक निर्भरता आपराधिक जाँच को गवाह-निर्भर पुलिसिंग से साक्ष्य-आधारित पुलिसिंग की ओर स्थानांतरित करती है।
  • एकीकृत आपराधिक न्याय प्रणाली: प्रभावी कार्यान्वयन के लिए इंटरऑपरेबल डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे ‘एकीकृत आपराधिक न्याय प्रणाली’ (ICJS) के माध्यम से पुलिस, फोरेंसिक प्रयोगशालाओं, अभियोजन एजेंसियों, जेलों और अदालतों के मध्य निर्बाध समन्वय की आवश्यकता होती है।

जन-विश्वास का निर्माण:

  • नागरिक-केंद्रित पुलिसिंग: पुलिस को केवल कानूनों को लागू करने की बजाय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध एक सार्वजनिक सेवा संस्थान के रूप में कार्य करना चाहिए।
  • जीरो FIR: पीड़ित क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार की चिंता किए बिना किसी भी पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज करा सकते हैं, जिससे न्याय तक त्वरित पहुँच सुनिश्चित होती है और प्रक्रियात्मक देरी से बचा जा सकता है।
  • ई-FIR: शिकायतों का इलेक्ट्रॉनिक पंजीकरण पहुँच में सुधार करता है, पुलिस स्टेशनों के चक्कर काटने में कमी तथा डिजिटल शासन को सुदृढ़ करता है।
  • पारदर्शिता: निष्पक्ष प्रक्रियाएँ, समय पर संचार और नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार विधि प्रवर्तन संस्थाओं में विश्वास को बढ़ावा देते हैं।
  • सामुदायिक भागीदारी: सामुदायिक पुलिसिंग और निरंतर सार्वजनिक जुड़ाव खुफिया जानकारी एकत्रण को मजबूत करते हैं, अपराध की रोकथाम में सुधार तथा सहकारी पुलिसिंग को बढ़ावा देते हैं।
  • जवाबदेही: पुलिस शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मजबूत आंतरिक पर्यवेक्षण, स्वतंत्र निरीक्षण और संस्थागत जवाबदेही आवश्यक है।

विचाराधीन कैदियों के अधिकारों का संरक्षण:

  • विचाराधीन हिरासत को कम करना: यह नया ढाँचा समयबद्ध जाँच, त्वरित जमानत निर्णयों और शीघ्र मुकदमों को बढ़ावा देकर लंबे समय तक कारावास की सज़ा को कम करने का प्रयास करता है, यह स्वीकार करते हुए कि विलंबित न्याय व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
  • वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग: वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अभियुक्तों की पेशी से देरी कम होती है, प्रशासनिक दक्षता में सुधार तथा रसद (logistical) लागत कम होने के साथ-साथ सुरक्षा बढ़ती है।
  • संवैधानिक सुरक्षा उपाय: ये सुधार प्रभावी आपराधिक जाँच के साथ जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी के मध्य संतुलन बनाकर अनुच्छेद 21 को सुदृढ़ करते हैं।

कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ:

  • सीखने की प्रक्रिया: पुलिस कर्मियों, अभियोजकों और न्यायिक अधिकारियों को नए कानूनी प्रावधानों, पुनर्गठित धाराओं और संशोधित आपराधिक प्रक्रियाओं के साथ शीघ्र सामंजस्य स्थापित करना पड़ा, जिसके लिए व्यापक क्षमता निर्माण की आवश्यकता है।
  • रिक्त पद: राज्य पुलिस बलों में बड़े पैमाने पर रिक्तियाँ परिचालन प्रभावशीलता को कम करती हैं, तथा  जाँच अधिकारियों के कार्यभार को बढ़ाती हैं।
  • प्रशिक्षण की कमी: कई पुलिस कर्मियों को फोरेंसिक, साइबर अपराध जाँच, डिजिटल साक्ष्य, वैज्ञानिक जाँच और नए आपराधिक कानूनों के प्रावधानों में निरंतर प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
  • फोरेंसिक बुनियादी ढाँचा: फोरेंसिक प्रयोगशालाओं, आधुनिक उपकरणों और प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी वैज्ञानिक जाँच में देरी और दोषसिद्धि दर को प्रभावित कर सकती है।
  • राजनीतिक हस्तक्षेप: बार-बार होने वाले तबादले और बाह्य प्रभाव पेशेवर स्वायत्तता, परिचालन स्वतंत्रता और संस्थागत विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं।
  • अवसंरचनात्मक कमी: कई पुलिस स्टेशन अभी भी तकनीकी बुनियादी ढाँचे, डिजिटल कनेक्टिविटी, मानव संसाधनों और आधुनिक खोजी उपकरणों की कमी का सामना कर रहे हैं।
  • संस्थागत समन्वय: सफल कार्यान्वयन के लिए केंद्र सरकार, राज्यों, पुलिस संगठनों, अभियोजन एजेंसियों, फोरेंसिक प्रयोगशालाओं और न्यायपालिका के बीच प्रभावी समन्वय की आवश्यकता होती है।

केस स्टडी – हरियाणा का कार्यान्वयन मॉडल

  • प्रशासनिक सुधार: हरियाणा संस्थागत सुधारों और डिजिटल शासन के माध्यम से नए आपराधिक कानूनों को लागू करने में अग्रणी राज्यों में से एक बनकर उभरा है।
  • ICT एकीकरण: जाँच अधिकारी मोबाइल एप्लिकेशन, डिजिटल केस मैनेजमेंट सिस्टम और पुलिस, न्यायालयों तथा जेलों को जोड़ने वाले इंटरऑपरेबल प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं।
  • परिचालन दक्षता: ई-समन, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, डिजिटल चालान और इलेक्ट्रॉनिक वर्कफ़्लो के अधिक उपयोग ने कागजी कार्रवाई तथा प्रशासनिक देरी को कम करते हुए दक्षता में सुधार किया है।
  • पर्यावरणीय लाभ: बढ़ते डिजिटलीकरण ने भौतिक आवाजाही को कम कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक व्यय में बचत तथा कार्बन उत्सर्जन कम हुआ है।

आगे की राह:

  • पुलिस क्षमता का सुदृढ़ीकरण: रिक्त पदों को भरना, पुलिस बुनियादी ढाँचे का आधुनिकीकरण और वैज्ञानिक जाँच तथा डिजिटल पुलिसिंग में निरंतर पेशेवर प्रशिक्षण को संस्थागत बनाना।
  • वैज्ञानिक पुलिसिंग को बढ़ावा देना: राज्यों में फोरेंसिक प्रयोगशालाओं, साइबर अपराध इकाइयों, डिजिटल जाँच, एआई (AI)-सक्षम पुलिसिंग और फोरेंसिक क्षमता में निवेश का विस्तार करना।
  • पुलिस जवाबदेही सुनिश्चित करना: निरीक्षण, पारदर्शिता, नागरिक शिकायत निवारण और नागरिक स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए संस्थागत तंत्र को मजबूत करना।
  • सामुदायिक पुलिसिंग का विस्तार: अधिक सार्वजनिक जुड़ाव, संवेदनशीलता और नागरिक-उन्मुख पुलिस प्रथाओं के माध्यम से विश्वास का निर्माण करना।
  • संस्थागत समन्वय में सुधार: एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से पुलिस, फोरेंसिक प्रयोगशालाओं, अभियोजन, जेलों और न्यायालय के बीच इंटरऑपरेबिलिटी को मजबूत करना।
  • कार्यान्वयन की निगरानी करना: जाँच की गुणवत्ता, दोषसिद्धि दर, लंबित मामलों में कमी, फोरेंसिक उपयोग और नागरिक संतुष्टि जैसे मापन योग्य संकेतकों का उपयोग करके नियमित रूप से कार्यान्वयन का मूल्यांकन करना।

निष्कर्ष

नए आपराधिक कानून औपनिवेशिक आपराधिक नन्यायिक ढाँचे से नागरिक-केंद्रित, तकनीक-संचालित और साक्ष्य-आधारित न्याय प्रणाली की ओर एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालाँकि, उनकी दीर्घकालिक सफलता केवल विधायी परिवर्तनों पर नहीं, बल्कि पेशेवर पुलिसिंग, वैज्ञानिक जाँच, संस्थागत जवाबदेही, न्यायिक दक्षता और आपराधिक न्याय प्रणाली में जन-विश्वास के निर्माण के निरंतर प्रयासों पर निर्भर करेगी।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्र. “भारतीय दंड संहिता (IPC) से भारतीय न्याय संहिता (BNS) में परिवर्तन केवल नामकरण में बदलाव नहीं, बल्कि दंड देने से न्याय प्रदान करने की ओर एक दार्शनिक परिवर्तन है।” विश्लेषण कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

पुलिस व्यवस्था तथा जन-विश्वास में सुधार लाने वाले नए आपराधिक कानून

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