जन विश्वास: न्यायिक बोझ से व्यापार आधारित अर्थव्यवस्था तक

जन विश्वास: न्यायिक बोझ से व्यापार आधारित अर्थव्यवस्था तक 6 Apr 2026

संदर्भ:

भारत ने जन विश्वास पहल के माध्यम से मामूली अनुपालन अपराधों के बड़े पैमाने पर वि-अपराधीकरण की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य दंडात्मक विनियमन को विश्वास-आधारित शासन से परिवर्तित करना है।

मुख्य दर्शन:

  • जन विश्वास दर्शन के बारे में: यह जेल-आधारित प्रवर्तन (डंडा) से हटकर डेटा-संचालित और पारदर्शी अनुपालन प्रणालियों की ओर बढ़ता है।
    • यह अत्यधिक अपराधीकरण के स्थान पर आनुपातिक, सुविधाजनक और पारदर्शी विनियमन लाकर विश्वास-आधारित शासन को बढ़ावा देता है, जो नागरिक गरिमा का सम्मान करता है।
  • केंद्र में नागरिक गरिमा: यह जन विश्वास (विश्वास-आधारित शासन) पर बल देता है, जिसमें नागरिकों को जनता की बजाय भागीदार माना जाता है।
  • विनियामक कोलेस्ट्रॉल को हटाना: उन अत्यधिक और तर्कहीन अनुपालन बोझ को कम करता है, जो छोटी-मोटी गलतियों का अपराधीकरण करते हैं।
  • व्यवसाय करने में सुगमता में सुधार: सरलीकृत अनुपालन ढाँचा औपचारीकरण और उद्यमिता को प्रोत्साहित करता है।

संबंधित मुद्दे:

  • मामूली अपराधों का वि-अपराधीकरण: लगभग 12,500 मामूली विनियामक अपराधों को वि-अपराधीकृत किया गया, जिसमें कारावास की जगह मौद्रिक दंड (जुर्माना) लगाया गया।
  • तर्कहीन आपराधिक प्रावधान: पहले, बिना टिकट यात्रा, खेतों में आवारा पशुओं का घुसना, या कारखाने के मामूली अनुपालन में चूक जैसे कार्यों के लिए जेल के प्रावधान हो सकते थे।
  • न्यायिक बोझ को कम करना: वि-अपराधीकरण से 5 करोड़ से अधिक लंबित मामलों का सामना कर रहे न्यायालयों पर दबाव कम करने में मदद मिलती है।
    • लंबित मामलों में से 43 लाख मामले चेक-बाउंस से संबंधित हैं, जिससे न्यायपालिका पर ऐसे विवादों का बोझ पड़ता है, जो प्रकृति में मुख्य रूप से वित्तीय या प्रक्रियात्मक हैं।

मूल कारण- प्रत्यायोजित विधान और नौकरशाही अतिरेक:

  • व्यापक विधायी ढाँचा: संसद व्यापक मूल कानून बनाती है, जो उद्देश्यों और बुनियादी प्रावधानों को रेखांकित करते हैं, जबकि परिचालन विवरणों को बाद में निर्दिष्ट करने के लिए छोड़ दिया जाता है।
  • प्रत्यायोजित नियम-निर्माण: कार्यपालिका/नौकशाही को मूल कानून को लागू करने के लिए विस्तृत नियम, विनियम तथा प्रक्रियाएँ बनाने के लिए अधिकृत किया जाता है।
  • अपराध प्रावधानों का विस्तार: प्रत्यायोजित विधान के माध्यम से, कभी-कभी विस्तृत संसदीय जाँच के बिना अतिरिक्त अपराध या दंड लगाए जा सकते हैं।
  • उपकरणों की बहुलता: बड़ी संख्या में विनियामक उपकरण (अधिसूचनाएँ, परिपत्र, एसओपी, आदेश आदि) असंख्य नियम उत्पन्न करते हैं, जिससे अनुपालन बोझ और जटिलता बढ़ जाती है।
  • उदाहरण: केंद्रीय कारखाना अधिनियम में एक एकल जेल प्रावधान नियमों के माध्यम से लगभग 8,500 अनुपालन आवश्यकताओं में विस्तारित हो गया, जिसमें कारावास संबंधी धाराएँ संभावित थी।
    • वार्षिक 741 करोड़ यात्रियों के बावजूद, विगत वर्ष बिना टिकट यात्रा के लिए केवल 8 लोगों को जेल भेजा गया था, फिर भी अधिकारियों द्वारा रिश्वत माँगने के लिए अक्सर जेल की “धमकी” का उपयोग किया जाता है।

आर्थिक और व्यावसायिक प्रभाव:

  • व्यवसाय में उच्च अनौपचारिकता: भारत में 7 करोड़ उद्यमों में से केवल 10 लाख ही सामाजिक सुरक्षा (जैसे- पीएफ) में योगदान करते हैं, जो व्यापक अनौपचारिकता का संकेत देता है।
  • विनियामक बोझ: अत्यधिक नियम और आपराधिक प्रावधान “विनियामक कोलेस्ट्रॉल” उत्पन्न करते हैं, जो व्यवसायों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में प्रवेश करने से हतोत्साहित करते हैं।
  • भय-आधारित अनुपालन: ‘इंस्पेक्टर राज’ प्रणाली व्यवसायों को नियंत्रित करने और अनौपचारिक भुगतान (रिश्वत) वसूलने के लिए सजा के डर का उपयोग करती है।
  • उत्पीड़न की संभावना: छोटी प्रक्रियात्मक चूक (जैसे- कारखाने की कैंटीन का शौचालय के निर्धारित मानकों से थोड़ा समीप होना) का उपयोग विधिक कार्रवाई की धमकी देने के लिए किया जा सकता है।
  • आर्थिक परिणाम: इस तरह का विनियामक भय उद्यमिता, औपचारिकीकरण और व्यापार में सुगमता को हतोत्साहित करता है।

वि-अपराधीकरण के तीन चरण:

सरकार ने विधिक ढाँचे को सुव्यवस्थित करने के लिए तीन चरणों वाला दृष्टिकोण लागू किया:

  1. चरण 1 – सिद्धांत: प्रक्रियात्मक अनुपालन चूक को जानबूझकर किए गए, या हानिकारक अपराधों से अलग करने के लिए मानदंड विकसित किए गए।
  2. चरण 2 – सूची : विनियामक उल्लंघनों के लिए आपराधिक प्रावधानों वाले कानूनों की एक व्यापक सूची तैयार की गई।
  3. चरण 3 – अनुप्रयोग: सिद्धांतों का उपयोग जेल प्रावधानों को संशोधित करने या हटाने, उन्हें नागरिक दंड से बदलने तथा विधिक ढाँचे को तर्कसंगत बनाने के लिए किया गया।

भविष्य की दृष्टि- जन विश्वास संशोधन विधेयक, 2026

  • डिजिटलीकरण: प्रक्रियाओं को सरल बनाने, पारदर्शिता विस्तार और नौकरशाही के विवेक को कम करने के लिए, विनियामक आवश्यकताओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित करना।
  • सत्य का एकल स्रोत : सुलभता, स्पष्टता और विनियामक निश्चितता में सुधार के लिए कानूनों, नियमों और अनुपालन दायित्वों के लिए एक एकीकृत पोर्टल स्थापित करना।
  • विनियमन मुक्ति : सरकार की भूमिका को नियंत्रण-उन्मुख नियामक से बदलकर एक सहायक भागीदार के रूप में परिवर्तित करना।
  • उचित प्रक्रिया (Due Process) को मजबूत करना: यह सुनिश्चित करना, कि कानून निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और उचित हों, जो विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया से आगे बढ़कर वास्तविक न्याय की ओर बढ़ें।

निष्कर्ष

नीतिगत नियंत्रण (नीति) के ऊपर न्याय को प्राथमिकता देकर, जन विश्वास सुधार संयमित और विश्वास-आधारित शासन की ओर संकेत करते हैं, जो डिजिटलीकरण, विनियमन मुक्ति और राज्यों में व्यापक रूप से इसे अपनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न 

प्रश्न. व्यवसाय में सुगमता का सही अर्थ केवल लालफीताशाही कम करने में नहीं, बल्कि हिंसा के एकाधिकार को नागरिकों में विश्वास के साथ बदलने में है। भारत की आर्थिक क्षमता पर अनावश्यक और अत्यधिक अपराधीकृत प्रशासनिक नियमों के प्रभाव का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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