संदर्भ:
हाल ही में केंद्र सरकार ने घोषणा की, कि भारत ‘नक्सल-मुक्त’ स्थिति के समीप है। सरकार ने निरंतर सुरक्षा अभियानों और विकासात्मक हस्तक्षेपों के कारण पूर्ववर्ती ‘रेड कॉरिडोर’ में माओवादी विद्रोह में आई महत्त्वपूर्ण कमी को उजागर दिया है।
नक्सलवादी आंदोलन की उत्पत्ति तथा विकास:
- रेड कॉरिडोर: यह उस क्षेत्र को संदर्भित करता है, जो कभी मजबूत नक्सलवादी प्रभाव का गवाह था, जो नेपाल सीमा से बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा से होते हुए आंध्र प्रदेश तक विस्तृत था।
- संगठनात्मक संरचना:
- पोलित ब्यूरो (Politburo): नक्सल आंदोलन की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था। इसके अधिकांश शीर्ष नेता मारे गए हैं या जेल में हैं, जिससे यह संरचना व्यापक सीमा तक कमजोर हो गई है।
- पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA): नक्सलियों की सशस्त्र शाखा, जो कभी अत्यधिक सक्रिय थी, लेकिन अब मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के अबूझमाड़ जंगलों तक सीमित है।
- ऐतिहासिक उदय (1967): इस आंदोलन की शुरुआत नक्सलबाड़ी गाँव में जमींदारी प्रथा, अर्द्ध-सामंती कृषि संबंधों और संथाल आदिवासी समुदायों की उपेक्षा के खिलाफ एक किसान विद्रोह के रूप में हुई थी।
- उत्पत्ति पर मुख्य विचार: इस आंदोलन को “नाजायज उपेक्षा की जायज संतान” (legitimate child of illegitimate neglect) के रूप में वर्णित किया गया है, जो इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे राज्य की उपेक्षा और सामाजिक अन्याय ने विद्रोह के लिए उपजाऊ भूमि तैयार की।
- नेतृत्व: चारू मजूमदार ने ‘आठ दस्तावेज’ लिखे, जिन्होंने अन्याय के खिलाफ क्रांतिकारी ढाँचे को स्पष्ट किया।
- जबकि शिकायतों की ‘आग’ पहले से ही मौजूद थी, मजूमदार ने प्रभावी रूप से “माचिस की तीली” जलाने का कार्य किया।
- दीर्घकालिक जनयुद्ध: राज्य को धीरे-धीरे कमजोर करने के उद्देश्य से एक लंबा सशस्त्र संघर्ष, जो माओवादी विद्रोह की विचारधारा का मूल है।
अत्यधिक खतरे:
- राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम: पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद को भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए शीर्ष तीन खतरों में से एक के रूप में वर्गीकृत किया था।
- प्रमुख घटनाएँ: भारत में नक्सली-माओवादी विद्रोह को IED विस्फोटों, जिला मजिस्ट्रेटों (DMs) के अपहरण और बड़े घात लगाकर किए गए हमलों द्वारा पहचाना जाता था।
- दंतेवाड़ा हमला (2010): सबसे घातक घटनाओं में से एक 2010 में दंतेवाड़ा में हुई थी, जहाँ माओवादी विद्रोहियों ने सुरक्षाकर्मियों पर घात लगाकर हमला किया था, जिसके परिणामस्वरूप 76 CRPF जवान शहीद हुए थे।
नक्सलवाद की सैन्य पराजय के लिए रणनीति:
- कठोर दृष्टिकोण: सरकार ने वामपंथी उग्रवाद (LWE) के प्रति “जीरो टॉलरेंस” की नीति अपनाई और ऐसी किसी भी वार्ता से इनकार कर दिया, जो भारत की क्षेत्रीय अखंडता से समझौता करती हो।
- विशेष बल :
- कोबरा (CoBRA – Commando Battalion for Resolute Action): सीआरपीएफ की एक विशेष इकाई, जिसे जंगल युद्ध और गुरिल्ला विरोधी अभियानों के लिए प्रशिक्षित किया गया है।
- डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (DRG): एक स्थानीय बल, जिसमें मुख्य रूप से आत्मसमर्पण करने वाले नक्सल कैडर और आदिवासी युवा शामिल हैं, जो गहन स्थानीय खुफिया और इलाके की जानकारी प्रदान करते हैं।
- परिचालन समन्वय: यह संयोजन अत्यधिक प्रभावी सिद्ध हुआ—DRG इकाइयों ने स्थानीय खुफिया जानकारी और मार्गदर्शन प्रदान किया, जबकि कोबरा कमांडो ने सघन वन क्षेत्रों में विशेष उग्रवाद विरोधी अभियान चलाए।
- समाधान (SAMADHAN) सिद्धांत:
- S – स्मार्ट नेतृत्व: उग्रवाद-विरोधी अभियानों के सभी स्तरों पर प्रभावी और समन्वित नेतृत्व।
- A – आक्रामक रणनीति: वामपंथी उग्रवादी समूहों के विरुद्ध सक्रिय और आक्रामक अभियान।
- M – प्रेरणा और प्रशिक्षण: सुरक्षा बलों की निरंतर क्षमता-निर्माण और विशेष प्रशिक्षण।
- A – कार्रवाई-योग्य खुफिया जानकारी: सटीक जमीनी सूचनाओं पर आधारित खुफिया-संचालित अभियान।
- D – विकास और प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों (KPI) के लिए डैशबोर्ड: मापने योग्य संकेतकों के माध्यम से विकास पहलों और सुरक्षा प्रदर्शन की निगरानी।
- H – प्रौद्योगिकी का उपयोग: ड्रोन, संचार प्रणालियों और निगरानी उपकरणों जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग।
- A – प्रत्येक क्षेत्र के लिए कार्य योजना: स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित क्षेत्र-विशिष्ट रणनीतियाँ।
- N – वित्तपोषण तक पहुँच पर रोक: उग्रवादी समूहों के वित्तीय नेटवर्क और धन स्रोतों को बाधित करना।

नक्सलवादी आंदोलन की आंतरिक समस्या और गिरावट:
- आंतरिक समस्या: नक्सलवादी आंदोलन का कमजोर होना, न केवल सुरक्षा अभियानों के कारण बल्कि संगठन के भीतर आंतरिक भ्रष्टाचार तथा वैचारिक क्षरण के कारण भी था।
- कॉमरेड पूंजीपति: समय के साथ, कई माओवादी नेता क्रांतिकारी विचारधारा से दूर हो गए और कोयला ट्रकों, ठेकेदारों और स्थानीय व्यवसायों से वसूली (‘लेवी) पर निर्भर हो गए, जिससे उन्होंने व्यक्तिगत संपत्ति जमा की।
- विकास विरोधी प्रयास: नक्सली समूहों ने दूरदराज के क्षेत्रों को अलग-थलग रखने और राज्य की पहुँच को रोकने के लिए स्कूलों, सड़कों तथा सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे को ध्वस्त करना शुरू कर दिया, जिससे स्थानीय समुदाय उनसे दूर हो गए।
- नागरिक थकान: समय के साथ, ग्रामीणों ने स्वयं को राज्य के दबाव और विद्रोही हिंसा के बीच फँसा हुआ महसूस किया, जिससे स्थानीय समर्थन में गिरावट आई।
संघर्ष के उभरते शहरी आयाम:
- शहरों में एक नया ‘रेड कॉरिडोर’: बढ़ती शहरी असमानता और सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार महानगरीय क्षेत्रों में संभावित अशांति की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं।
- अत्यधिक असमानता: स्लम निवासियों और अत्यधिक-धनी अभिजात वर्ग के बीच का गहरा अंतर बढ़ती संपत्ति की असमानता और सामाजिक असंतोष को दर्शाता है।
- शिक्षित लेकिन बेरोजगार युवा: बड़ी संख्या में शिक्षित लेकिन बेरोजगार युवा इस बारे में चिंता उत्पन्न करते हैं, कि क्या भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश एक जनसांख्यिकीय चुनौती में बदल सकता है।
- स्थायी संरचनात्मक समस्याएँ: खनन के कारण आदिवासी समुदायों को विस्थापन, कमजोर भूमि अधिकार संरक्षण और भ्रष्टाचार के माध्यम से कल्याणकारी धन का दुरुपयोग जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिससे राज्य के खिलाफ असंतोष बना रहता है।
- राज्य और समाज के बीच भरोसे की कमी: भूमि अधिग्रहण जैसी प्रशासनिक कार्रवाइयों को आदिवासी अक्सर शोषणकारी मानते हैं—जो औपनिवेशिक काल में राजस्व वसूली के प्रयासों जैसी लगती हैं—और इससे उनमें अलगाव की भावना और भी गहरी हो जाती है।
विद्रोह / सामाजिक संघर्ष के उभरते रूप:
- भाषाई कट्टरता: भाषा-आधारित पहचान की राजनीति, जिसके कारण क्षेत्रीय वैमनस्य और हिंसा उत्पन्न होती है।
- धार्मिक उग्रवाद: सामाजिक शिकायतों और पहचान-संबंधी विभाजनों का लाभ उठाकर की जाने वाली सांप्रदायिक लामबंदी।
- जातिगत गौरव और हिंसा: जातिगत पहचानों पर बल देना, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक ध्रुवीकरण और संघर्ष उत्पन्न होते हैं।
- शहरी आक्रोश और नशीले पदार्थ: हाशिए पर पड़े युवाओं में व्याप्त हताशा, जो अपराध, नशीले पदार्थों के सेवन और हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के रूप में सामने आती है।
निष्कर्ष
हालाँकि सुरक्षा अभियानों ने नक्सली विद्रोह को कमजोर कर दिया है, लेकिन स्थायी शांति के लिए अंतर्निहित सामाजिक-आर्थिक शिकायतों को दूर करना और राज्य-समाज के विश्वास को मजबूत करना आवश्यक बना हुआ है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. नक्सलवाद की सैन्य पराजय निकट हो सकती है, लेकिन प्रणालीगत अलगाव और शहरी असमानता की निरंतरता विद्रोह को नए रूपों में पुनर्जीवित करने की धमकी देती है। वामपंथी उग्रवाद के अंतर्निहित कारणों का विश्लेषण कीजिए तथा इसके पुनरुत्थान को रोकने के लिए सामाजिक-आर्थिक उपायों के सुझाव दीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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