संदर्भ:
किनारा कैपिटल MSME इनसाइट्स-2024 रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के नेतृत्व वाले व्यवसाय 11% अधिक महिला कर्मचारियों को नियुक्त करते हैं, जो प्रभावी रूप से एक ऐसा चक्र बनाते हैं जहाँ “एक महिला दूसरी महिला को आगे बढ़ने में मदद करती है” (रोजगार गुणक प्रभाव)।
महिला उद्यमिता में ऐतिहासिक संदर्भ और आधुनिक परिवर्तन:
- पारंपरिक भूमिकाएँ: ऐतिहासिक रूप से, भारत में महिला उद्यमिता व्यापक सीमा तक छोटे पैमाने के कुटीर उद्योगों तक सीमित थी, जैसे- अचार, पापड़ बनाना या सिलाई मशीन चलाना।
- वर्तमान दृष्टिकोण: आज महिलाएँ प्रौद्योगिकी, सेवाओं, विनिर्माण और स्टार्टअप जैसे विविध क्षेत्रों में विस्तार कर रही हैं, तथा पारंपरिक घरेलू उद्यमों से आगे बढ़ रही हैं।
- परिवर्तन के कारक: यह परिवर्तन अधिक जागरूकता, शिक्षा और वित्त तक बेहतर पहुँच, सहायक सरकारी नीतियों और सामाजिक तथा विनियामक बाधाओं में क्रमिक कमी से प्रेरित है।
महिला उद्यमियों के लिए सरकारी सहायता और योजनाएँ:
- स्टैंड अप इंडिया: ग्रीनफील्ड उद्यम स्थापित करने के लिए बैंक ऋण प्रदान करके SC, ST और महिलाओं के बीच उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए डिज़ाइन किया गया।
- प्रधानमंत्री मुद्रा योजना: सूक्ष्म और लघु व्यवसायों को बिना गारंटी के ऋण प्रदान करती है, जिससे महिलाएँ उद्यम शुरू या उनका विस्तार कर सकें।
- गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM): सरकार ने महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों के उत्पादों के लिए 3% खरीद कोटा शुरू किया है, जिससे सार्वजनिक खरीद में उनकी भागीदारी को प्रोत्साहन मिला है।
महिला उद्यमिता संबंधी आँकड़ें तथा आर्थिक प्रभाव:
- परिचालन उत्कृष्टता: महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यम कई पुरुष-नेतृत्व वाली फर्मों की तुलना में लागत अनुकूलन तथा वित्तीय अनुशासन पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं।
- वित्तीय विश्वसनीयता: ऐसे व्यवसाय बेहतर आय वृद्धि और उच्च ऋण पुनर्भुगतान दर दिखाते हैं, जिससे वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी साख मजबूत होती है।
- वैश्विक विकास में योगदान: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) महिलाओं में निवेश को वैश्विक GDP को बढ़ावा देने के लिए एक “उच्च-उपज वाली रणनीति” मानता है, क्योंकि महिलाएँ बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और परिवार कल्याण पर व्यय को प्राथमिकता देती हैं।
- वर्तमान वैश्विक स्थिति: मास्टरकार्ड महिला उद्यमी सूचकांक-2021 के अनुसार, भारत 65 देशों में से 57वें स्थान पर था।
महिला उद्यमियों के लिए विस्तार संबंधी चुनौतियाँ:
- प्रवेश आसान लेकिन विस्तार कठिन: जबकि महिलाएँ तेजी से उद्यमिता में प्रवेश कर रही हैं, छोटे उद्यमों को राष्ट्रीय या वैश्विक ब्रांडों में बदलना एक बड़ी चुनौती है।
- क्रेडिट अंतराल: हालाँकि छोटे ऋण (₹50,000–₹1 लाख) अपेक्षाकृत सुलभ हैं, विस्तार के लिए आवश्यक बड़े पैमाने पर वित्तपोषण (₹5–₹10 करोड़) प्राप्त करना कठिन बना हुआ है।
- नेटवर्क और परामर्श की कमी: वैश्विक नेटवर्क, उद्योग संबंधों और संरचित परामर्श तक सीमित पहुँच महिला उद्यमियों को बड़े बाजारों में विस्तार करने से रोकती है।
- विनियामक जटिलता: कई औद्योगिक और विनियामक नीतियाँ स्वरूप में लिंग-तटस्थ हैं, लेकिन प्रभाव में लैंगिक रूप से प्रभावी हैं, जो अक्सर महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों की विशिष्ट बाधाओं को दूर करने में विफल रहती हैं।
आगे की राह:
- वित्तपोषण से आगे: केवल वित्तीय सहायता पर्याप्त नहीं है। महिला उद्यमियों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने के लिए डिजिटल टूल, निर्यात प्रक्रियाओं और वैश्विक गुणवत्ता मानकों में क्षमता निर्माण की आवश्यकता है।
- वैश्विक एकीकरण: महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं और निर्यात नेटवर्क में एकीकृत किया जाना चाहिए, जिससे केवल घरेलू खरीद पर निर्भरता कम हो सके।
- विनिर्माण की ओर बदलाव: महिलाओं को खंडित सेवा-आधारित गतिविधियों से विनिर्माण की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना, जिससे बड़े पैमाने पर उत्पादकता और मूल्यवर्धन संभव हो सके।
- ऋण तक बेहतर पहुँच: बड़े पैमाने के संस्थागत वित्त तक अधिक पहुँच को बढ़ावा देना, क्योंकि भूमि और मशीनरी जैसी ठोस संपत्ति वाले विनिर्माण उद्यम ऋण योग्यता में सुधार करते हैं।
निष्कर्ष
महिला-केंद्रित नीतिगत सुधार और अधिक संस्थागत समर्थन महिला उद्यमी भागीदारी को महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ा सकते हैं, जिससे भारत में समावेशी आर्थिक विकास के एक प्रमुख चालक का मार्ग प्रशस्त होगा।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. उन संरचनात्मक बाधाओं का विश्लेषण कीजिए, जो भारतीय महिला उद्यमियों को अपने व्यवसायों को स्थानीय से वैश्विक स्तर तक ले जाने से रोकती हैं। ऋण अंतराल को कम करने के उपाय सुझाइए।
(10 अंक, 150 शब्द)
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