संदर्भ
भारत महात्मा ज्योतिराव फुले की 200वीं जयंती (जन्म 1827) मना रहा है, उनकी बौद्धिक विरासत को केवल एक औपचारिक स्मृति के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक सामाजिक असमानता को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण ढाँचे के रूप में पुनर्जीवित किया जा रहा है।
महात्मा ज्योतिराव फुले के बारे में:
- एक सुधारक: महाराष्ट्र के 19वीं सदी के एक सामाजिक क्रांतिकारी, जिन्होंने भारतीय समाज की वैचारिक और आर्थिक नींव को चुनौती दी।
- ‘महात्मा’ की उपाधि: दबे-कुचले लोगों के प्रति उनकी निःस्वार्थ सेवा के सम्मान में 1888 में सामाजिक कार्यकर्ता विट्ठलराव कृष्णजी वांडेकर द्वारा उन्हें यह उपाधि प्रदान की गई थी।
- बौद्धिक स्पष्टता: फुले उन आरंभिक लोगों में से थे, जिन्होंने तर्क दिया कि सामाजिक सुधार राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए एक पूर्व शर्त है। उनका प्रसिद्ध कथन था, कि शिक्षा ही मुक्ति का प्राथमिक उपकरण है।
अंतर-विभाजकता और सामाजिक संरचना का सिद्धांत:
- असमानता का एकीकृत सिद्धांत: फुले ने प्रस्तावित किया, कि भारतीय असमानता कोई एक अकेला मुद्दा नहीं है बल्कि यह तीन परस्पर जुड़े स्तंभों पर बनी है: जाति पदानुक्रम, वर्ग शोषण और पितृसत्ता।
- परस्पर अंतरसंबंधित प्रणालियाँ: उन्होंने तर्क दिया कि ये प्रणालियाँ अलग नहीं हैं; वे एक-दूसरे को सहारा देती हैं। उदाहरण के लिए, एक गरीब दलित महिला को अपने लिंग, आर्थिक स्थिति और जातिगत पहचान के कारण एक साथ कई असमानताओं का सामना करना पड़ता है।
- जातिगत मिथकों का विखंडन: उन्होंने इस विचार को खारिज कर दिया, कि जाति “ईश्वरीय रूप से निर्धारित” थी। इसके बजाय, उन्होंने इसे ज्ञान और शक्ति के एकाधिकार की एक ऐतिहासिक संरचना के रूप में पहचाना, जहाँ एक अल्पसंख्यक ने संसाधनों पर रणनीतिक नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए बहुसंख्यक का दमन किया।
प्रमुख साहित्यिक और सक्रियता संबंधी उदाहरण:
- गुलामगिरी (दासता, 1873): इस मौलिक कार्य में, फुले ने भारतीय शूद्रों और अति-शूद्रों की स्थिति की तुलना अमेरिका के गुलामों से की। इसने उनकी वैश्विक बौद्धिक जागरूकता और अमेरिकी उन्मूलनवादी आंदोलन के साथ एकजुटता को प्रदर्शित किया।
- शेतकऱ्याचा आसूड (किसान का कोड़ा): कृषि संकट का एक आर्थिक विश्लेषण, जिसमें उजागर किया गया कि कैसे किसानों का शोषण “ब्राह्मणवादी व्यवस्था, साहूकारों और ब्रिटिश प्रशासन की तीन-धारी तलवार” द्वारा किया गया था।
- सत्यशोधक समाज (1873): हाशिए पर रहने वाले लोगों को धार्मिक और सामाजिक शोषण के खिलाफ संगठित होने के लिए एक मंच प्रदान करने हेतु “सत्य की खोज करने वालों के समाज” की स्थापना की।
- लैंगिक न्याय: अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर उन्होंने 1848 में पुणे के भिड़ेवाडा में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला, जिससे महिलाओं की स्वायत्तता के लिए शिक्षा को “मुख्य जीवन कौशल” के रूप में स्थापित किया गया।
समकालीन युग में चुनौतियाँ:
- “अपनाने का विरोधाभास” (Adoption Paradox): हालाँकि फुले की मूर्तियों का व्यापक रूप से सम्मान किया जाता है, लेकिन पारंपरिक मूल्यों की उनकी मूल आलोचना को अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है। सांस्कृतिक गौरव की आड़ में रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्थाओं को पुनः थोपने का एक दृश्य प्रयास दिखाई देता है।
- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम सामाजिक न्याय: आधुनिक विमर्श में पहचान के समरूपीकरण का जोखिम है, जो संभावित रूप से शोषित जातियों के विशिष्ट अधिकारों और उनके अनुभवों को शामिल करने की आवश्यकता को ओझल कर सकता है।
- संस्थागत पितृसत्ता: कानूनी प्रगति के बावजूद, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और स्वायत्तता पर प्रतिबंधों को अक्सर ‘संस्कृति’ की दुहाई देकर उचित ठहराया जाता है, जो लैंगिक समानता के फुले के दृष्टिकोण का सीधा खंडन करता है।
- आर्थिक हाशियाकरण: आज भी पूरे समुदाय अपमानजनक व्यवसायों में फंसे हुए हैं, जो यह सिद्ध करता है कि जाति और आर्थिक वर्ग के बीच की कड़ी एक निरंतर संरचनात्मक चुनौती बनी हुई है।
आगे की राह:
- ‘कौशल-प्रथम’ सशक्तीकरण: आधुनिक तकनीक और डिजिटल साक्षरता तक समावेशी पहुँच सुनिश्चित करके शिक्षा पर फुले के लक्ष्यों को पुनः प्राप्त करना, ताकि एक नया ‘डिजिटल जातिगत विभाजन’ उत्पन्न न हो।
- सामाजिक न्याय की पुनर्कल्पना: केवल औपचारिक यादों से आगे बढ़कर कार्यस्थलों, भूमि स्वामित्व और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में समानता को संस्थागत बनाना।
- बहुलवादी परंपराओं को मुख्यधारा में लाना: यह सुनिश्चित करना, कि “भारतीय ज्ञान प्रणाली” समावेशी रूप से लागू की जाए जो किसी एक वैचारिक पूर्वाग्रह की बजाय दलित-बहुजन विचारकों के विविध बौद्धिक योगदान को दर्शाती हो।
- संवैधानिक नैतिकता को मजबूत करना: समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को बनाए रखना, जैसा कि फुले और उनके बौद्धिक उत्तराधिकारी डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने परिकल्पना की थी, ताकि असहमति और सामाजिक आलोचना के अधिकार की रक्षा की जा सके।
निष्कर्ष
फुले के विचार सांत्वना नहीं देते बल्कि वे माँग करते हैं, कि हम समाज को वैसा ही देखें जैसा वह है, न कि वैसा जैसा हम कल्पना करते हैं। फुले द्वारा प्रदान किए गए सामाजिक न्यायिक ढाँचे के बिना एक सच्चा “विकसित भारत” असंभव है, जहाँ वास्तव में एक न्यायसंगत समाज बनाने के लिए वर्ग, जाति और लिंग संबंधी बाधाओं को समाप्त किया जाता है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. चर्चा कीजिए, कि ‘सामाजिक न्याय’ से ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की ओर वैचारिक संक्रमण भारतीय समाज के हाशिए के वर्गों को किस प्रकार प्रभावित करता है। संवैधानिक नैतिकता के संरक्षण में फुले का विजन हमारा मार्गदर्शन कैसे कर सकता है?
(15 अंक, 250 शब्द)
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