संदर्भ:
भारतीय नौसेना की तीसरी अरिहंत-श्रेणी की परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN), INS अरिधमन के चालू होने के बारे में हालिया अटकलें भारत के समुद्र-आधारित परमाणु प्रतिरोध और ‘परमाणु त्रय’ क्षमता को मजबूत करने के प्रयासों को उजागर करती हैं।
पनडुब्बियों का वर्गीकरण:
- SSK (डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी): डीजल इंजन और बैटरी द्वारा संचालित पारंपरिक पनडुब्बियाँ। इन्हें रिचार्ज करने के लिए समय-समय पर सतह पर आना पड़ता है, जिससे इनके पकड़े जाने का खतरा बढ़ जाता है।
- SSN (परमाणु-संचालित हमलावर पनडुब्बी): परमाणु रिएक्टर द्वारा संचालित, जो लंबे समय तक पानी के नीचे रहने की क्षमता प्रदान करता है। इनका उपयोग मुख्य रूप से दुश्मन की पनडुब्बियों और जहाजों के शिकार के लिए किया जाता है।
- SSBN (परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी): परमाणु हथियारों से लैस बैलिस्टिक मिसाइलों से सुसज्जित परमाणु-संचालित पनडुब्बियाँ, जिन्हें रणनीतिक प्रतिरोध (deterrence) और ‘सेकंड-स्ट्राइक’ क्षमता के लिए डिज़ाइन किया गया है।
परमाणु त्रय और वैश्विक स्थिति:
- परमाणु त्रय : इसका तात्पर्य भूमि-आधारित मिसाइलों, हवा से मार करने वाली प्रणालियों और समुद्र-आधारित प्लेटफार्मों से परमाणु हथियार लॉन्च करने की क्षमता से है, जिसमें SSBN ‘समुद्र चरण’ (sea leg) के रूप में जीवित रहने योग्य प्रतिरोध सुनिश्चित करते हैं।
- विशिष्ट क्षमता: भारत उन देशों के छोटे समूह में शामिल है जिनके पास परमाणु त्रय है, जिनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य (P5) भी शामिल हैं।
- INS अरिधमन: भारत की तीसरी SSBN, INS अरिधमन का शामिल होना, इसके समुद्र-आधारित परमाणु प्रतिरोध की विश्वसनीयता को महत्त्वपूर्ण रूप से मजबूत करता है।
भारत के SSBN कार्यक्रम का विकास:
- नींव: कार्यक्रम की शुरुआत 1980 के दशक में स्वदेशी परमाणु-संचालित पनडुब्बियों को विकसित करने के उद्देश्य से ‘एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल’ (ATV) परियोजना के तहत हुई थी।
- 2009: भारत की पहली SSBN, INS अरिहंत का निर्माण शुरू हुआ।
- 2016: INS अरिहंत को सेवा में शामिल किया गया, जिसने भारत के परमाणु त्रय क्लब में प्रवेश को चिह्नित किया।
- 2024: दूसरी SSBN, INS अरिघात को शामिल किया गया।
- वर्तमान: तीसरी SSBN, INS अरिधमन को सेवा में शामिल किया जा रहा है, जबकि चौथी अरिहंत-श्रेणी की पनडुब्बी विकास के अधीन है।
INS अरिधमन की तकनीकी प्रगति:
- उन्नत क्षमता: बेहतर डिजाइन और परिचालन क्षमता के साथ पिछली अरिहंत-श्रेणी की पनडुब्बियों की तुलना में एक प्रमुख तकनीकी उन्नयन का प्रतिनिधित्व करती है।
- मिसाइल प्रणालियाँ: उन्नत K-4 और K-5 पनडुब्बी-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइलों (SLBMs) से सुसज्जित।
- विस्तारित मारक क्षमता: इन मिसाइलों की मारक क्षमता 3,500 किमी से अधिक है, जो भारत के रणनीतिक समुद्र-आधारित प्रतिरोध को काफी मजबूत करती है।
क्षेत्रीय खतरों का मुकाबला:
- चीनी उपस्थिति: हिंद महासागर में चीनी अनुसंधान और सर्वेक्षण जहाजों की बढ़ती तैनाती संभावित ‘दोहरे उपयोग’ खुफिया जानकारी एकत्र करने और नौसैनिक मार्गों की मैपिंग के बारे में चिंता पैदा करती है।
- रणनीतिक प्रतिस्पर्धा: पनडुब्बी क्षमता को मजबूत करना चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है।
- सामुद्रिक प्रतिरोध: INS अरिधमन हिंद महासागर में हितों की रक्षा करने की भारत की क्षमता का समर्थन करता है।
आधुनिक युद्ध और आत्मनिर्भरता:
- क्रॉस-डोमेन वारफेयर: आधुनिक संघर्ष तेजी से कई डोमेन—भूमि, वायु, समुद्र, साइबर और अंतरिक्ष में फैल रहे हैं, जो एकीकृत प्रतिरोध की आवश्यकता को उजागर करते हैं।
- आत्मनिर्भर रक्षा: भारत का SSBN कार्यक्रम रक्षा उत्पादन में बढ़ती आत्मनिर्भरता को दर्शाता है, जिसमें स्वदेशी डिजाइन विदेशी सैन्य तकनीक पर निर्भरता को कम करती है।
भविष्य का रोडमैप:
- लक्ष्य-2036: भारत का लक्ष्य अपनी पहली पूरी तरह से स्वदेशी परमाणु-संचालित हमलावर पनडुब्बी (SSN) को सेवा में शामिल करना है।
- लक्ष्य-2038: दूसरी स्वदेशी SSN।
चुनौतियाँ और रणनीतिक दुविधाएँ:
- उच्च वित्तीय लागत: परमाणु पनडुब्बी विकास के लिए भारी निवेश की आवश्यकता होती है, जिससे ‘विकास बनाम रक्षा खर्च’ की दुविधा पैदा होती है।
- तकनीकी एकीकरण: पनडुब्बी संचालन में AI, उन्नत सेंसर और स्वायत्त अंडरवाटर व्हीकल (AUVs) को शामिल करना एक प्रमुख चुनौती है।
- क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा: चीन द्वारा अपने पनडुब्बी बेड़े का तेजी से विस्तार भारत के लिए समुद्री संतुलन बनाए रखने में एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक चुनौती है।
निष्कर्ष
तेजी से विवादित होते हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विश्वसनीय समुद्र-आधारित प्रतिरोध, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए भारत की परमाणु पनडुब्बी क्षमता को मजबूत करना महत्त्वपूर्ण है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति, जो ‘क्रॉस-डोमेन स्पिलओवर’ द्वारा चिह्नित है, भारत के लिए एक मजबूत समुद्र-आधारित परमाणु प्रतिरोध को अनिवार्य बनाती है। INS अरिधमन के सेवा में शामिल होने और हिंद महासागर क्षेत्र में बदलती भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के आलोक में इस कथन का विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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