भूमि क्षरण तथा मरुस्थलीकरण

भूमि क्षरण तथा मरुस्थलीकरण 18 Jun 2026

संदर्भ:

भूमि क्षरण एक प्रमुख पर्यावरणीय चुनौती के रूप में उभरा है, जो मृदा की उर्वरता, कृषि उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा एवं आजीविका को प्रभावित कर रहा है।

  • भारत के मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एटलस (ISRO) के अनुसार, भारत के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 30% भाग भूमि क्षरण के अंतर्गत है, जो लगभग 97.85 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र को प्रभावित करता है।
  • मरुस्थलीकरण केवल रेगिस्तानों तक सीमित नहीं है; यह जलवायु और मानव-प्रेरित कारकों के कारण शुष्क भूमि (drylands) की जैविक उत्पादकता में कमी को संदर्भित करता है।

अर्थ तथा अंतर

  • भूमि क्षरण
    • भूमि की गुणवत्ता, उत्पादकता और उर्वरता में गिरावट को संदर्भित करता है।
    • यह मिट्टी के पोषक तत्त्वों, वनस्पति आवरण और मृदा की गुणवत्ता में कमी के कारण होता है।
  • मरुस्थलीकरण 
    • यह भूमि क्षरण का एक रूप है, जो मुख्य रूप से शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में होता है।
    • इसके परिणामस्वरूप जैविक उत्पादकता में गंभीर गिरावट आती है, जिससे भूमि मरुस्थल जैसी हो जाती है।

भूमि क्षरण के संकेतक

  • वन बायोमास की हानि : वन आवरण और वनस्पति में कमी से मृदा सुरक्षा कम हो जाती है, तथा क्षरण (erosion) बढ़ जाता है।
  • लवणीकरण : शुष्क क्षेत्रों में अत्यधिक सिंचाई से मिट्टी में लवण का संचय बढ़ जाता है, जिससे कृषि उत्पादकता कम हो जाती है।
  • मिट्टी में पोषक तत्त्वों की कमी: मृदा अपरदन पादपों की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्त्वों को कम कर देता है।

भूमि क्षरण के कारण

  • मानव-जनित कारण
    • वनों की कटाई : वृक्षों के कटाव से मिट्टी की जड़ों को पकड़ने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे मृदा अपरदन बढ़ जाता है।
    • अतिचारण (Overgrazing): अत्यधिक चराई वनस्पति आवरण को नष्ट कर देती है, तथा मृदा की उर्वरता को कम करती है।
    • असतत कृषि : एक ही फसल को बार-बार लगाना, मिट्टी के पोषक तत्त्वों को कम करता है।
    • जलभराव (Waterlogging): खराब सिंचाई प्रबंधन के कारण पानी का संचय होता है, जिससे भूमि का क्षरण होता है।
    • अनियोजित शहरीकरण: कृषि भूमि का कंक्रीट क्षेत्रों में परिवर्तन उत्पादक भूमि की उपलब्धता को कम करता है।
  • प्राकृतिक कारण
    • अनियमित मानसून
    • सूखा
    • हीट वेव्स
    • जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

ये कारक आर्द्रता की कमी को बढ़ाते हैं तथा भूमि क्षरण को तीव्र करते हैं।

भूमि क्षरण के प्रभाव

  • खाद्य सुरक्षा को खतरा: घटती मिट्टी की उर्वरता कृषि उत्पादन को कम करती है, जिससे किसानों की आय और भोजन उपलब्धता दोनों प्रभावित होती है।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता: क्षरित भूमि में सूखे और बाढ़ का सामना करने की कम क्षमता होती है।
  • प्रवसन और सामाजिक प्रभाव: कृषि उत्पादकता की हानि ग्रामीण आबादी को शहरों की ओर पलायन करने हेतु बाध्य करता है, जिससे शहरी दबाव बढ़ता है।

सरकारी पहलें

  • भूमि बहाली पर राष्ट्रीय कार्य योजना
    • भारत का लक्ष्य 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षरित भूमि को बहाल करना है।
    • यह मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD) के उद्देश्यों के अनुरूप है।
  • ग्रीन इंडिया मिशन: वनीकरण तथा पारितंत्र की बहाली पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • कैम्पा (CAMPA) फंड: वन भूमि को परिवर्तित किए जाने पर प्रतिपूरक वनीकरण को बढ़ावा देता है।
  • नगर वन योजना: शहरी पारिस्थितिक तंत्र में सुधार के लिए शहरी वानिकी को बढ़ावा देती है।

आगे की राह

  • भूमि बहाली को महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा मानना: भूमि बहाली को सड़कों और रेलवे की तरह प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
  • सामुदायिक भागीदारी: सामुदायिक आधारित संरक्षण के माध्यम से स्थानीय समुदायों तथा पंचायतों को शामिल किया जाना चाहिए।
  • सतत कृषि: वृद्धि करना –
    • टपक सिंचाई (Drip irrigation)
    • फसल चक्रण (Crop rotation)
    • पुनर्योजी खेती (Regenerative farming)
  • प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी: भूमि बहाली के वास्तविक समय के मूल्यांकन के लिए जीआईएस (GIS) आधारित निगरानी प्रणालियों का उपयोग करें।

केस स्टडी : अलवर, राजस्थान

  • 1980 के दशक में, अलवर जिले को भूजल की कमी, अवैध खनन तथा भूमि क्षरण का सामना करना पड़ा।
  • राजेंद्र सिंह और उनके संगठन ‘तरुण भारत संघ’ ने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर कार्य किया।
  • जोहड़ कहलाने वाली पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनरुद्धार ने नदियों तथा क्षरित भूमि को पुनर्जीवित करने में सहायता की।

निष्कर्ष

भूमि क्षरण केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है बल्कि आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा तथा ग्रामीण आजीविका को प्रभावित करने वाली एक चुनौती है। एक लचीले और सतत भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सामुदायिक भागीदारी, प्रौद्योगिकी तथा पारिस्थितिक बहाली के माध्यम से सतत भूमि प्रबंधन आवश्यक है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण न केवल भारत की पारिस्थितिकी के लिए, बल्कि उसकी व्यापक आर्थिक आकांक्षाओं के लिए भी एक बहुत बड़ा जोखिम उत्पन्न करते हैं। इस संकट के चालकों की चर्चा कीजिए, तथा सरकार द्वारा किए गए संस्थागत उपायों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिए। आगे की राह भी सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

भूमि क्षरण तथा मरुस्थलीकरण

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